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जब पूर्व PM चंद्रशेखर ने वीएचपी के नेताओ से कहा था कि ‘अगर आपने बाबरी मस्जिद को छुआ तो मैं खुद फायरिंग का ऑर्डर का दुंगा’

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नई दिल्ली – उत्तर प्रदेश के इब्राहीमपट्टी बलिया में जन्मे एक जुलाई 1927 को जन्मे चंद्रेशखर ने दस नवंबर 1990 को भारत के आठवें प्रधानमंत्री के तौर पर शपथ लेकर पदभार ग्रहण किया था। चंद्रशेखर बहुत कम समय के लिये ही भारते के प्रधानमंत्री रहे लेकिन इतने कम वक्त में ही उन्होंने अपनी शख्सियत का लोहा मनवा लिया। फिर चाहे वह कश्मीर का मसअला हो या फिर बाबरी मस्जिद और अयोध्या विवाद, ये ऐसे विवादित मुद्दे थे कि अगर चंद्रशेखर कुछ और समय के लिये भारत के प्रधानमंत्री रह लिये होते तो ये मुद्दे आज देश में जीवित नहीं होते।

बीती आठ जुलाई पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की पुण्यतिथी थी, ऐसे में चंद्रशेखर को याद किया गया, चंद्रशेखर को याद करने की वजह उनके द्वारा किये गये वे काम भी हैं जिन्होंने चंद्रशेखर को एक अलग ही पहचान दी थी। चंद्रशेखर यारों के यार कहे जाते थे।

जब वीएचपी को दिया था झटका

चंद्रशेखर के करीबी माने जाने वाले और तत्कालीन प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री रहे कमल मोरारका बताते हैं, “मुझे लगता है कि ये जो बाबरी मस्जिद का फ़ैसला कराने की जो कोशिश चंद्रेशखर ने की थी, उसकी वजह से ही उनकी सरकार गई। एक बार जब विश्व हिंदू परिषद के लोग प्रधानमंत्री चंद्रशेखर से मिलने आए तो उस बैठक में कमल मोरारका भी थे। और बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के जावेद हबीब भी आए थे। उन्होंने हिंदुओं से कहा कि मैं किसी मुख्यमंत्री के कंधे पर रख कर गोली नहीं चलाउंगा। मैं खुद आर्डर दूँगा फ़ायरिंग का अगर आप लोगों ने उस ढ़ाँचे को छुआ।

विश्व हिन्दू परिषद के लोगों को लगा कि कोई अजीब आदमी आ गया है प्रधानमंत्री के रूप में जो कमरे के अंदर धमकी दे रहा है। चंद्रशेखर ने मुसलमानों से भी कहा कि दंगा फ़साद करने से देश कैसे चलेगा। उनकी बातों का दोनों समुदायों के ‘ठेकेदारों’ पर ऐसा असर हुआ चार पांच दिन बाद दोनों आ गए कि हम बातचीत करने के लिए तैयार हैं। और पंद्रह बीस दिन में तो वो समाधान के लिए भी तैयार हो गए।

मुसलमानों ने चंद्रशेखर की बात मान ली कि ये जगह हम हिंदुओं को दे देंगे, मुसलमानों की दो मांगे थीं, एक तो इसके बदले में दूसरी ज़मीन मिल जाए मस्जिद बनाने के लिए और दूसरी मांग थी कि एक क़ानून पास हो जाए कि काशी और मथुरा आदी में इस तरह की मांग नहीं उठेगी, 15 अगस्त, 1947 को जो मंदिर था, वो मंदिर रहेगा और जो मस्जिद थी, वो मस्जिद रहेगी।”

(नोट – पूरी रिपोर्ट आप बीबीसी पर पढ़ सकते हैं, पढ़ने के लिये यहां क्लिक करें)