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विशेषः देवबंद के उस ‘फतवे’ पर क्या कहते हैं सुन्नी मुसलमान जिसमें शिया मुसलमानों की इफ्तार पार्टी से परहेज करना बताया गया

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वसीम अकरम त्यागी

नई दिल्ली – हाल ही में आये देवबंद के उस फतवे से बवाल मचा हुआ है जिसमें शिया मुसलमानों की इफ्तार पार्टी में जाने को लेकर सुन्नी मुसलमानों से परहेज करने को गया है। इसी को लेकर सोशल मीडिया पर बहस छिड़ी हुई है। ऐसे में सोशल मीडिया पर मुस्लिम बुद्धीजीवी इस फतवे को ‘फूट’ डालने वाला करार दे रहे हैं। हमने कुछ मुस्लिम बुद्धीजीवियों को फेसबुक पोस्ट को इस रिपोर्ट में जगह दी है, ये वो पोस्ट हैं जिसमें इस तरह के फतवे को गैरजरूरी करार दिया गया है।

वरिष्ठ पत्रकार और सहरानपुर के निवासी रियाज़ हाशमी कहते हैं कि अल्लामा इक़बाल ने कहा था, “ख़ुदा ने आज तक उस क़ौम की हालत नहीं बदली, ना हुआ अहसास जिसे खुद अपनी हालत को बदलने का।”
लिहाज़ा अब मुस्लिम क़ौम को बेदार होना ही पड़ेगा। ऐसे मुफ़्तियों, मौलवियों और प्रवक्ताओं से परहेज़ करना होगा जो अपने बारे में कम और दूसरों पर टीका टिप्पणी ज्यादा करते हैं। यही विवाद की असल वजह भी है। आप अपने मसलक, विचारधारा का सुधार करें, उसे जाग्रत करें इससे किसी को कोई ऐतराज़ नहीं। लेकिन जब आप दूसरे के मसलक पर टिप्पणी करते हैं तो वह विरोध की वजह बन जाती है।

रियाज़ कहते हैं कि ऐसे फतवों का हर हाल में विरोध करना चाहिए जो समाज को बांटने के संदेश देते हैं। हालांकि फतवा दो पक्ष के बीच का मामला है, जिसमें एक फतवा मांगने वाला और दूसरा देने वाला। फतवा बाध्यकारी भी नहीं, बल्कि एक राय भर है। लेकिन अब इसमें सबसे प्रभावी तीसरा पक्ष मीडिया का है जिसका स्रोत पहले दो पक्षों में से ही कोई एक है। जरूरी दीनी मसलों पर फतवा हो तो समझ में आता है लेकिन गैर जरूरी मसलों पर फतवा समझ से परे है। डॉ. राहत इंदौरी ने ठीक ही कहा था-

सबको रुसवा बारी बारी किया करो

हर मौसम में फतवे जारी किया करो।

नींदों से आंखों का रिश्ता टूट चुका

अपने घर की पहरेदारी किया करो।

वहीं समाजिक कार्यकर्ता और हर ज्वलंत मुद्दे पर अपनी राय देने वाले सैय्यद फैजान जैदी दो टूक कहते हैं कि में एक हनफी हूँ। उत्तर भारत में मुझे देवबंदी भी कहा जाता है। वही देवबंद जिसने शिया हज़रात के यहाँ खाने पीने से परहेज़ का फ़तवा दिया है। मेरी लिस्ट में मोजूद कोई शिया हज़रात है जो आज शाम की दावत दें। में दावत खा कर मसलक़ ए देवबंद के दुकानदारो के मुँह पर लानत भेजना चाहता हूं।

उठने लगे फतवे पर सवाल

वरिष्ठ पत्रकार सलीम अख़्तर सिद्दीकी सवाल उठाते हुए कहते हैं कि देवबंद से शिया हज़रात के मुताल्लिक आया फतवा साजिश लग रहा है। क्या दारुल उलूम रजिस्टर के सादे कागज पर लिखकर फतवा देता है? उसका कोई लेटरहेड नहीं होता क्या? इसकी जांच होना जरूरी है। सबसे बड़ी बात यह कि दारुल उलूम देवबंद को सामने आकर सफाई देनी चाहिए।

बिहार के मुंगेर जिले के रहने वाले समाजिक कार्यकर्ता फर्राह शकेब कहते हैं कि फ़तवा प्रकरण पर इतना हड़बडाइये मत, क़लम मत तोड़िए. रंजिशों को हवा न दीजिये, सवाल ये है की रमज़ान न तो आज से है न अफ़्तार में एक दूसरे के घर जाने का रिवाज. फिर अचानक जब देवबंद का इफ़्ता सेंटर रमज़ान में बंद रहता है तो इस ख़बर का उग्र हिन्दू अख़बारों के फ्रंट पेज पर छापा जाना ही संदिग्ध है. कोबरा पोस्ट का स्टिंग ऑपरेशन याद रखिये, चुनावी साल है. ऐसी खबरें उस उग्र ख़ूनी हिंदुत्व की भट्टी का ईंधन हैं जिस पर फासिस्टों की सत्ता की राजनीतिक रोटियां सिंका करती हैं.

फर्राह शकेब की बात को स्वतंत्र टिप्पणीकार भी समर्थन करते हैं और सवाल उठाते हुए कहते हैं कि देवबंद ने अधिकारिक रूप से फतवा देने की बात को नाकारा| कहा शरारती तत्वों नें इसको फैलाया देवबंद का इस फतवे से कोई लेना देना नहीं … बता दें पिछले दिनों कैराना की सांसद तब्बुसुम हसन का भी एक फर्जी पिक सोशल मीडिया पर वायरल हुयी थी जिसका बाद में उन्होंने खंडन करते हुए पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करायी थी।

फैसल मोहम्मद इस फतवे पर ही सवाल उठाते हैं और कहते हैं कि दारुल उलूम देवबंद के नाम से जो फ़तवे वाली बात सामने आ रही है ,अब तक हुई जानकारी के मुताबिक़ वो झूठा नज़र आ रहा है। जो फ़तवा वायरल हो रहा है वो किसी सिकंदर अली के नाम से पूछा गया है वो फ़तवा दारुल ईफ़तह की मुहर के साथ नही है। फ़तवे पर लिखा नम्बर बंद है। दारुल उलूम की ऑनलाइन फ़तवा सेवा में शियाओ से मुताल्लिक़ सवाल में पूछा गया था उसमें ऐसी कोई बात निकल कर सामने नहीं आ रही है।

सोशल मीडिया एक्टिविस्ट इस्लाहुद्दीन अंसारी कहते हैं कि हम सिर्फ़ मुसलमान है साहेब, फिरका विरका हमें ना पल्ले पड़ा कभी। जो नमाज़ी और परहेज़गार दिखा उसी से एहतेराम से सलाम कर लिया। जो टोपी दाढ़ी वाला बुज़ुर्ग कभी मिला उसका हाथ चूम लिया। जिसने दीन की अच्छी बात बताई हाथ बांध कर सुन लिया। कभी किसी मस्जिद से परहेज़ नहीं किया और ना ही कभी किसी मसलक़ के नमाज़ी में फ़र्क किया। किसी शहर गया तो वहाँ की प्रसिद्ध दरगाह में भी हाजरी लगा ली। जिस भी फिरके की मस्जिद मिली वहीं नमाज़ पढ़ ली। कभी किसी दोस्त या रिश्तेदार से मसलक़ नहीं पूछा। ना ही किसी से सुन्नी और वहाबी, बरेलवी और देवबंदी को लेकर किसी किस्म की कोई बहस की।