Home विशेष रिपोर्ट विशेषः नेतन्याहू का भ्रष्टाचार छिपाने के लिए इस्राइल की कुरबानी

विशेषः नेतन्याहू का भ्रष्टाचार छिपाने के लिए इस्राइल की कुरबानी

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अख़लाक़ अहमद उस्मानी

इस्राइल की संसद नेसेट ने एक प्रस्ताव पारित कर इस्राइल को यहूदी देश मान लिया है। इसका मतलब समझने से पहले यह समझना ज़रूरी है कि प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की क्या राजनीतिक मजबूरी है कि उन्होंने देश को धर्म निरपेक्ष से धार्मिक देश चुनना पसंद किया।

क्या हैं आरोप

बेंजामिन नेतन्याहू पर आरोप हैं कि उन्होंने अपने पक्ष में कवरेज करवाने के लिए इस्राइल के एक अख़बार के सम्पादक एडिएत अहरोनोट को ऑफर दिया कि यदि वह ऐसा करते हैं तो उनके विरोधी अखबारों को लगाम लगाई जाएगी। इस्राइल की पुलिस का दूसरा आरोप है कि बेंजामिन नेतन्याहू ने अमेरिकी फिल्म प्रोड्यूसर कारणों मिलशन से क़रीब तीन लाख अमेरिकी डॉलर की रिश्वत तोहफे के रूप में ली है।

पुलिस के इन आरोपों के बाद से ही बेंजामिन परेशान हैं और देश में उनकी लोकप्रियता में भारी कमी आई है। अपने घोर दक्षिणपंथी ज़ायोनिस्ट एजेंडे के लिए जाने जाने वाले बेंजामिन नेतन्याहू ने देश के कथित धर्म निरपेक्ष ढांचे को ढहाकर अपने पाप को ढकने और धर्म को एक राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की कोशिश की है।

जब पेश हुआ था अनोखा बिल

इस 19 जुलाई को इस्राइल की संसद में पेश एक अनोखे बिल में लिखा गया है कि यहूदियों को ‘स्वनिर्धारण’ में विशेष दर्जा होगा और अरब की बजाय हिब्रू देश की आधिकारिक भाषा होगी। हालांकि स्वनिर्धारण की पूरी परिभाषा के बारे में जानकारी कम है लेकिन कयास है कि क्या देश के 18 फीसदी अरबी अल्पसंख्यक यानी मुसलमानों को क्या वोट देने का अधिकार नहीं रह जाएगा?

अगर ऐसा होता है तो देश में चुने जाने वाले करीब 15 अरब मूल के सांसदों का संसद तक पहुँचने का मार्ग भी बंद हो जाएगा। धर्म के आधार पर देश की राजनीति को यहूदी मूल का बनाने के बाद तेल अवीव के सामने संकट है कि क्या इससे देश विघटन की ओर चला जाएगा क्योंकि जिन अरबों के पास इस्राइल का पासपोर्ट है, वह खुलकर इस्राइल का विरोध, स्वतंत्र फिलस्तीन की माँग और टू स्टेट सिद्धान्त का विरोध करेंगे।

इजरायल पर जो प्रभाव पढ़ेंगे

अरबों को चुनाव लड़ने, अरबी भाषा पर हिब्रू का प्रभाव, अरबी मुसलमानों को वोट देने में भेदभाव और यरूशलम को जबरदस्ती राजधानी बनाए रखने की ज़िद के बाद इस्राइल की अन्तरराष्ट्रीय बिरादरी में मकबूलियत और कम होगी। देश की 88 लाख की आबादी में यहूदियों की तादाद करीब 75 प्रतिशत है, मुसलमान 18%, ईसाई 2%, द्रूज़ 1.61% हैं।

यह कह सकते हैं कि अल्पसंख्यक अरबी मुसलमान देश में इस्राइली पहचान के साथ दूसरी सबसे बड़ी आबादी और तीसरी सबसे बड़ी राजनीतिक शक्ति हैं। इन मुसलमानों को आमतौर पर आज़ाद फ़िलस्तीन का हामी माना जाता है यानी इस्राइल के हित के ख़िलाफ। अगर नेसेट में पास प्रस्ताव मुसलमानों के साथ ईसाइयों और द्रूज़ को भी वोटिंग और चुनाव लड़ने से वंचित कर देगा तो इस्राइल की धार्मिक पहचान पाकिस्तान से भी बुरी हो जाएगी जो कम से कम अल्पसंख्यकों को चुनाव लड़ने और वोट की शक्ति देता है। नेतन्याहू के पाप छिपाने की कीमत एक देश अपना चरित्र खोकर देगा, यह नेतान्याहू के समर्थकों ने भी नहीं सोचा होगा।


(लेखक कूटनीतिक मामलों के जानकार हैं)