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विशेषः पढ़ें वे पांच कारण जिनकी वजह से भाजपा ने हारा कैराना और नूरपुर का उपचुनाव

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अमरेश मिश्रा

विपक्षी एकता के सूचक के अतिरिक्त, कैराना लोकसभा और नूरपुर विधानसभा उपचुनाव मे भाजपा की करारी हार के त्वरित विष्लेषण से निम्न 5 पहलू सामने आते हैं:

  1. जो मुस्लिम विरोधी, गैर-यादव, गैर-जाटव गठबंधन भाजपा ने 2014 मे बनाया था वो बिखर चुका है। कैराना ‘दंगा बेल्ट’ का हिस्सा है। यहाँ, 2014 और 2017 मे, सभी उम्मीदो के खिलाफ, जाटो ने बड़ी संख्या मे भाजपा को वोट दिया था। इससे पूर्व, यहाँ तक कि जनसंघ के दिनो मे भी, जाट या तो कांग्रेस समर्थक थे या गैर-भाजपा विपक्ष का हिस्सा। 1857 की जन-क्रांती के दौरान स्थापित जाट/मुस्लिम एकता–जिसे आज़ादी के पूर्व जाट लीडर सर छोटूराम और उनके पश्चात चौधरी चरण सिंह के द्वारा मजबूती मिली–ने 1947 के साम्प्रदायिक लहर का भी सफलतापूर्वक सामना किया था। जाटों की सुरक्षा और भाईचारा की शपथ के कारण ही मुज़फ्फरनगर के मुसलमान तबकों का पाकिस्तान पलायन रुक गया था।

 

मुज़फ्फरनगर दंगों के बाद ही जाट भाजपा की तरफ झुके। 2014-17 मे जाट पश्चिमी यूपी मे भाजपा की धुरी बन गये। परंतु कैराना उपचुनाव मे 70% से अधिक जाटों ने राष्ट्रीय लोकदल कैंडीडेट के पक्ष मे वोट डाले। ये सच है कि जाटों के मन मे RLD के लिये प्रेम है। परंतु अजीत सिंह, चौधरी चरण सिंह के पुत्र, के अनुरोध के बावजूद, जाटो ने पिछले 2 चुनावों मे भाजपा  को वोट दिया। जाटों का भाजपा विरोध मे सीधे उतर कर,

मुस्लिमो को वोट देने मे मदद करने का एक बड़ा अर्थ है। इसका सीधा मतलब है  कि भाजपा ने एक प्रभावशाली ताक़त, जो पश्चिम यूपी मे लहर पैदा करती है, को खो दिया। जाट समर्थन के बिना 2019 मे भाजपा के लिये पश्चिम यूपी मे 5 सीट भी जीत पाना बेहद कठिन होगा।

 

  1. 2014-17 पश्चिम यूपी मे भाजपा गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलितो के एक बड़े भाग को अपनी तरफ लाई थी। जाटों से भिन्न, अतीत मे भी ये जातियां जनसंघ/भाजपा से सहानुभूति/समर्थन रखती थीं। राम मंदिर आन्दोलन के पहले भी शाक्य और कश्यप, जो पश्चिमी यूपी मे सर्वाधिक पिछड़ी जातियां (MBC) हैं, जनसंघ और भाजपा के लिये छिटपुट वोट करते थे। यही स्थिति बाल्मीकि वर्ग, जो कि महत्वपूर्ण गैरजाटव दलित हैं, की भी थी। ये दोनो वर्ग 1990s और 2000s मे बड़े पैमाने पर भाजपा के समर्थन मे आये। 2014 और 2017 मे ये समर्थन अपने चरम पर पहुंचा। पर 2018 उपचुनाव मे 25-35% पश्चिमी यूपी के MBC या तो RLD को वोट किये या घर पर रहे। यही हाल वाल्मीकि वर्ग का भी था।

MBC भाजपा से दूर जाने लगे हैं यह पूर्वी यूपी के फूलपुर और गोरखपुर उपचुनावो मे भी दिखा। MBC निषादों ने भी 2014 और 2017 मे भाजपा को वोट दिया था।  परंतु गोरखपुर उपचुनाव मे समाजवादी पार्टी ने एक निषाद कैंडीडेट खड़ा किया।  जिसने भाजपा को उसके मौजूदा मुख्यमंत्री के गढ़ मे पराजित कर दिया।

 

  1. पूर्वी यूपी उपचुनाव मे यह भी दिखा कि ब्राम्हण और क्षत्रिय मे से क्षत्रिय अधिकांशतः भाजपा के साथ ही रहे। परंतु ब्राम्हणो ने भाजपा की हार सुनिश्चित की। उन्होने सपा को वोट नही दिया। पर अपनी नाराजगी वोट ना देकर जाहिर की।

इस कारण फूलपुर और गोरखपुर मे वोटिंग प्रतिशत बेहद कम रहा जिसका सपा की जीत मे बड़ा रोल रहा। पूर्वी यूपी कि तुलना मे प्रदेश के पश्चिमी हिस्से मे ब्राम्हण काफी कम हैं, फिर भी 2014 और 2017 के भाजपा लहर मे उनका रोल महत्वपूर्ण था। परंतु इस बार, कैराना और नूरपुर मे, ब्राम्हण भाजपा के पक्ष मे माहौल बनाने के लिये गलियों मे नही निकले। चुनाव के दिन ब्राम्हण ज्यादातर घरो मे रहे। कैराना मे चुनाव प्रतिशत करीब 10% कम रहा।

  1. 2014 और 2017 मे जाटव समाज के छोटे भाग ने भाजपा के लिये वोट किया था। परंतु ज़्यादातर बसपा के साथ रहे। मायावतीजी ने फूलपुर और गोरखपुर मे सपा को सपोर्ट किया। उन्होने कैराना और नूरपुर मे भी सपा-आरएलडी को समर्थन का सिग्नल दिया। परंतु कैराना मे, चंद्रशेखर रावण का आरएलडी के पक्ष मे अपील भी महत्वपूर्ण योगदान रहा। जिससे जाटवो ने भाजपा के खिलाफ जमकर वोटिंग की। वास्त्व मे एक ढीला- ढाला दलित-मुस्लिम गठजोड़ पश्चिम यूपी मे उभर रहा है।
  2. यूपी की 22% आबादी मे 18% मुस्लिम हैं। फिर भी 2014 के संसदीय चुनाव मे जिसमे भाजपा 72 सीट जीती, उसमे पूरे 80 सीटो पर एक भी मुस्लिम कैंडीडेट नही जीता। अब सभी गैर भाजपा पार्टियो के विशाल गठबंधन, जिसमे सपा-बसपा और कांग्रेस हैं, के समर्थन से आर.एल.डी की तबस्सुम हसन की जीत के साथ यूपी से एक मुस्लिम एमपी संसद मे पहुंच गया है।