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जानिय क्या है? भारत के नाटो में (NATO) ‘शामिल‘ होने के पीछे का घिनौना सच!

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अमरेश मिश्रा

लखनऊ पासपोर्ट मामले में सोशल मीडिया पर सुषमा स्वराज को ट्रोल किसने किया था?  आज इंदिरा गांधी की आत्मा निश्चय ही बेचैन होगी और उस दिन को कोस रही होगी जब 1971 में उन्होंने अमेरिका की इच्छा के विरुद्ध जाकर पाकिस्तान के दो टुकड़े कर दिए थे।  इंदिराजी की इस ‘ गुस्ताख़ी’ के लिए CIA ने उन्हें कभी माफ़ नहीं किया और 1984 में उन्हीं के सुरक्षाकर्मियों के हाथों उनकी हत्या करवा दी।  CIA और मोसाद ने मिलकर राजीव गांधी की हत्या की।

राजीव गांधी की हत्या के तुरंत बाद भारत ने अमेरिका के हित में आर्थिक-सुधार किए और अपनी विदेश नीति को अमेरिका-इज़रायल उन्मुख बनाया।  आज भारत तेजी से अमेरिका का ताबेदार बनता जा रहा है।  क्या आपको जानकारी है कि लखनऊ पासपोर्ट केस में सुषमा स्वराज को ट्रोल क्यों किया गया था ?  आपको क्या लगता है कि भाजपाई ट्रोल मात्र इस वजह से सुषमा जी को ट्रोल कर रहे थे कि वह एक ‘मुस्लिम’ की मदद कर रही थीं?

नहीं! मामला इतना सीधा नहीं था!

आपको याद होगा कि कुछ हफ़्तों पहले सुषमा स्वराज  को बुरी तरह ट्रोल किया गया था। ऊपर से देखने में लग रहा था कि एक अंतरजातीय-दंपत्ति को परेशान करने वाले पासपोर्ट अफसर के खिलाफ कार्यवाही करने के कारण उन्हें भाजपा द्वारा ट्रोल किया गया जा रहा है।  मगर परदे  के पीछे कुछ और ही  खेल चल रहा था।  उस पासपोर्ट अफसर और दम्पत्ति को इस बात का ज़रा भी इल्म नहीं था कि ‘कोई एक बड़ी ताकत’ इस सारे मामले को तूल दे रही थी।

अमरेश मिश्रा (वरिष्ठ पत्रकार)

सुषमाजी पर हमला करने वालों के सर पर ‘बाहरी ताकतों’ का हाथ था। संभवतया, फेसबुक की एक सीक्रेट इकाई ‘फेसबुक ग्लोबल गवर्नमेंट एंड पॉलिटिक्स टीम’ इसकी सूत्रधार थी। मक़सद था भारत की विदेश नीति को प्रभावित करना!  ध्यान रहे कि अमेरिका के मना करने के बावजूद भारत द्वारा ईरान से तेल ख़रीदे जाने पर अमेरिका की आर्थिक प्रतिबंधों की धमकी का सुषमा स्वराज ने जमकर विरोध किया था।

जब सुषमा स्वराज को साधने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ में अमेरिका की राजदूत निक्की हेली को विशेष तौर पर भारत भेजा गया, तब अमेरिकी दबाव को दरकिनार करते हुए विदेश मंत्री ने जवाब दिया था: “हम दूसरे  देशों के दबाव में अपनी विदेश नीति निर्धारित नहीं करते. हम यूएन द्वारा लगाए प्रतिबंधों से बाध्य हो सकते हैं , यूएस के प्रतिबंधों से नहीं”

रुपया बनाम डॉलर

ईरान भारत को रूपए के बदले तेल बेचने के लिए राजी था जिसका मतलब है  भारत को  तेल का भुगतान डॉलर में करने की जरुरत नहीं थी। भारत और ईरान के बीच हुए इस सौदे के परिणामस्वरूप रूपया मज़बूत होता। जिससे सरकार को डीज़ल और पेट्रोल के दाम घटाने में मदद मिलती।

भारत पर अमेरिकी कोप की वजह

अमेरिका चाहता है कि तेल के सौदों का भुगतान केवल डॉलर्स में होना चाहिए।  इराक पर हमला और लीबिया के विध्वंस के पीछे यही कारण था कि ये दोनों देश यूरो में तेल का भुगतान चाहते थे। भारत ईरान से रुपए में तेल खरीदे यह बात यूएस को रास नहीं आ रही थी। भारत से अमेरिकी नाराज़गी की दूसरी वजह थी भारत की रूस से एंटी-एयरक्राफ्ट मिसाइल खरीदने की मंशा।

यूएस का तेल और भारत

अक्टूबर 2017 में ओडिशा में 1.6 मिलियन बैरल अमेरिकी कच्चे तेल की पहली खेप उतारी गई। मगर अमेरिकी तेल के लिए ईरान को दगा देने के बदले में हमें क्या मिला? हमें मिला दोयम दरजे का वह रद्दी तेल जिसे अमेरिका ठिकाने लगाने की फिराक़ में था। अमेरिका खुद एक फ्रेंच कंपनी द्वारा सप्लाई की जा रही रूसी गैस खरीद रहा है तो भारत के नीति निर्माताओं को अमेरिका की सलाह पर ईरान को दगा देने की क्या जरुरत थी?

नया तेल युद्ध और भारत

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 4 नवम्बर से नए तेल युद्ध के आगाज़ की तारीख मुक़र्रर कर दी है। सुषमा स्वराज ने  ईरान, रूस , चीन और टर्की के खिलाफ इस एंग्लो-अमेरिकन युद्ध को लड़ने से मना कर दिया था जिसके लिए उन्हें ट्रोल किया गया था!  स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया ने अमेरिकी प्रतिबंधों के खौफ़ के चलते रिफाइनरों को साफ़ मना कर दिया कि वह ईरान से आयातित तेल का भुगतान नहीं करेगा।  अब उन्हें ईरान को भुगतान करने के लिए दूसरे बैंकों का रास्ता देखना पड़ेगा।

इतना ही नहीं , शिपिंग कारपोरेशन ऑफ़ इंडिया ने भी अमेरिकी नाराज़गी के डर से ईरान को अपने मालवाहक जहाज भेजने बंद कर दिए हैं। इसके बावजूद ईरान अपने तेलवाहक जहाज़ों की सेवाएं मुहैया करवा रहा है। भारतीय तेलशोधक कम्पनियां  ईरान से तेल खरीदती रहें इसके लिए ईरान उन्हें इंश्योरेंस सुविधा भी दे रहा है।  दूसरे देशों पर आर्थिक प्रतिबन्ध डॉलर को ताक़तवर बनाने का एक ज़रिया है।

COMCASA और 2+2 डायलाग

यह सब यूएस डिफेंस सेक्रेटरी जिम मैटिस और सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट माइकल पोम्पेई की 6 सितम्बर को सुषमा स्वराज और निर्मला सीतारामन के साथ बातचीत के लिए भारत यात्रा की भूमिका तैयार करने के लिए था।  लगातार कमज़ोर होते रूपए और बढ़ती हुई तेल की कीमतों के माहौल में  संपन्न हुए इस डायलाग का नतीज़ा आ चुका है।

ऐसा लगता है कि आसन्न तेल युद्ध में अमेरिका का साथ देने के लिए भारत पर ज़बरदस्त दबाव डाला गया है। यद्यपि यूएस ने  रूस के साथ एंटी-एयरक्राफ्ट मिसाइल सौदे पर नरमी दिखाई है। मगर ईरान पर शिकंजा ढीला नहीं किया है।

भारत को मज़बूर किया गया है कि वह  COMMUNICATION COMPATIBILITY AND SECURITY AGREEMENT (COMCASA) पर दस्तख़त करे। COMCASA उन चार आवश्यक समझौतों में से एक है जो अमेरिका अपने ‘ पालतू ‘ देशों के साथ करता है।  COMCASA के प्रावधानों के  तहत अमेरिका भारत द्वारा भविष्य में खरीदे जाने वाले जेट विमानों में अपने  खुफिया संचार उपकरण लगा सकता है, पहले ख़रीदे गए जेट विमानों में ऐसा नहीं था।

भारत उन्नत किस्म के खुफिया उपकरण और सशस्त्र ड्रोन खरीद सकता है। भारत की पहुँच अब Link 16 नामक यूएस सैन्य संचार लिंक तक होगी। यह लिंक मूलतः नाटो देशों के लिए बनाया गया था।  इस संधि का प्रचार इस प्रकार किया जा रहा है जैसे भारत  नाटो में  ‘लगभग’  शामिल हो गया है!

क्या है लिंक 16?

यह एक ऐसा संचार सिस्टम है जिसके माध्यम से इसका इस्तेमाल करने वाले देश की सेनाएं सामरिक रूप  से महत्वपूर्ण डेटा का अमेरिका से आदान-प्रदान कर सकती हैं।  कहने का अभिप्राय यह है कि भारत का सामरिक खुफिया डेटा अमेरिका को थाली में परोसकर दे दिया गया है।

विडम्बना यह है कि भारत एक ऐसे समय पर इस लिंक से जुड़ रहा है जबकि  ट्रंप के साथ यूरोप के सम्बन्ध तनावपूर्ण चल रहे हैं। फ़्रांस के राष्ट्रपति मेक्रों ने हाल ही में ‘यूरोपियन नाटो’ बनाने का सुझाव दिया है और जर्मनी में परमाणु हथियारों का घोर विरोध किया जा रहा है।

(GGI और TOI से प्राप्त इनपुट्स के आधार पर, लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)