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नज़रियाः राहुल गांधी को नेहरू, इंदिरा की परंपरा पर कायम रहा कर आक्रमक रुख अपनाना होगा

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नज़ीर मलिक

शशि थरूर के भाजपा संबंधी बयान से कांग्रेस ने पल्ला झाड़ लिया। कांग्रेस मणिशंकर अय्यर, दिग्विजय आदि के बयानों पर पूर्व में ऐसा पहले भी कर चुकी है। आखिर क्या गलत कहा थरूर ने? क्या या सच नही की भाजपा तालिबानों की तर्ज़ पर इस देश को कट्टरता की तरफ ले जा रही है। क्या गलत कहा था अय्यर ने, अगर कोई आदमी प्रधानमंत्री के पद पर बैठ कर विपक्षी नेता के बयान को तोड़ मरोड़ कर पेश करे तो क्या उसे नीच हरकत नही कहा जायेगा? फिर भी कांग्रेस का ऐसे बयानों से खुद को अलग करना क्या साबित करता है। क्या वो बेहद डर नही गई है?

राहुल की कांग्रेस फिलहाल बहुत डरी हुई है। खौफ इतना बढ़ गया है कि वो भाजपा के उग्र हिन्दुत्व से डर कर स्वयं नरम हिंदुत्व पर उतर आई है। यही कारण है कि कांग्रेस का वोट दिन ब दिन घटता जा रहा है। राहुल को सोचना चाहिये कि वो नरम हिंदुत्व अपना कर कांग्रेस का भला नही कर सकते। उन्हें नेहरू, इंदिरा की परंपरा पर कायम रहा कर आक्रमक रुख अपनाने चाहिए और कट्टरपंथ पर पूरी शिद्दत से हमला करना चाहिये। आक्रमण ही बचाव है। यही वक्त की ज़रूरत भी है।

कांग्रेस शायद ये सोच रही है कि आक्रामक हो कर शायद वो चुनाव हार जाएगी, तो वह नरम हिंदुत्व के चलते भी लगातार हार ही रही है। आक्रामकता की नीति अपनाते हुए भी अगर वो एक चुनाव हारेगी तो भी उसका यह स्टैंड भविष्य में उसे विजेता बनाएगा।

बहुसंस्कृतियों वाले इस देश की राजनीति में कट्टर राजनीति स्थाई नही हो सकती। यहां वही टिकेगा जो दलितों, पिछड़ों, अलपसख्यको की जायज़ आवाज़ उठाएगा। जो बेरोजगारों, केलिए लड़ेगा, सबके लिए विकास के समान अवसर गढ़ेगा। जो सेकुलरिज़्म के लिए लड़ने को सदा तैयार रहेगा।

राहुल आज बेहद डरे हुए हैं। वो लिंचिंग जैसे मुद्दे पर खामोश है। वो निर्बल पर अत्याचार, लगातार बढ़ते बलात्कार, शिक्षा के व्यवसायीकरण जैसे मुद्दों पर बोलने का साहस नही कर पा रहे। उल्टे अपने नेताओं की आवाज़ से कांग्रेस को अलग करते जा रहे हैं। ये तो एक तरह से सियासी हाराकीरी (आत्महत्या) है। याद रखिये राहुल जी, मरियल कभी विजेता नही होते। वो हमेशा नो रिस्क नो गेम की नीति पर चल कर जीत हासिल करते हैं।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, ये उनके निजी विचार हैं)