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जन्मदिन विशेषः फारूख शेख़ सिने जगत का वह सितारा जिसकी आवाज़ की दुनिया दीवानी थी

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नितिन ठाकुर

मुझे फारुख शेख़ का चेहरा बहुत पसंद था। उनकी कितनी ही फिल्में एक के बाद एक देखीं। संयोग ही था कि जिन गानों में वो दिखे वो सभी मेरे दिल को छूने वाले रहे। फारुख कोई शहंशाह या बादशाह नहीं थे इसलिए उनकी कोई खास अदा भी नहीं थी। एक्टिंग ऐसे करते जाते मानो बस यूं ही झील में पानी बह रहा हो। फारुख ने अदाकारी का कोई माध्यम नहीं छोड़ा, सभी में हाथ आज़माए। यूं भी ज़मींदार खानदान के थे और पिता मुंबई के नामी वकील के तौर पर मशहूर थे।

पढ़ाई के ऐसे कीड़े कि शॉट खत्म होते ही किताब लेकर पढ़ने बैठ जाते। इंडस्ट्री में जितने लोगों को जानते थे उनके जन्मदिन और एनिवर्सरी याद रखना सबको हैरान करता था। फारुख को देख दीप्ति नवल और दीप्ति को देख फारुख को ज़माना याद करता है। खुद फारुख शेख ने दीप्ति के साथ अपने रिश्ते को एक दफा डिवाइन कहा था। शबाना आज़मी तो कॉलेज में उनकी जूनियर ही थीं और शुरूआती दिनों से ही दोनों ने मिलकर कई नाटक खेले।

रेडियो पर फारुख शेख की आवाज़ खूब पहचानी जाती थी। मखमली और साफ उच्चारण वाली स्वर्गिक आवाज़। कौन बता सकता था कि फारुख ने वकालत पढ़ी थी लेकिन उसमें करियर बनाने की जगह बलराज साहनी की आखिरी फिल्म गरम हवा को अपनी पहली फिल्म बना लिया। इसके बाद आई गमन में वो टैक्सी ड्राइवर बने तो उमराव जान में नवाब। हर भूमिका में रचबस जाने का शानदार हुनर अब छिपा कहां था। बाज़ार और किसी से ना कहना दोनों एक दूसरे से एकदम अलग फिल्म थीं मगर फारुख शेख ने दोनों में काम किया और क्या जम कर काम किया।

उनका शो जीना इसी का नाम है ऐसा शो था कि कोई भी उसे स्किप नहीं कर सकता था। शंघाई फिल्म में तो मैं खुद उनको देखकर चौंका था और उनका ये जादू आखिरी फिल्म क्लब 60 तक बरकरार रहा। अभी तो उन्होंने चमक बिखेरनी ही शुरू की थी कि 27 दिसंबर 2013 को दुबई में दिल का दौरा पड़ने से वो गुज़र गए। आज उनका जन्मदिन है। 1948 में उनका जन्म हुआ था। गूगल ने डूडल बनाया इसके लिए शुक्रिया.

(लेखक युवा पत्रकार हैं)