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विशेषः 1857 की क्रांति का गुमनाम नायक अज़ीमुल्ला खाँ, जिन्होंने पहला ‘क़ौमी तराना’ लिखा जिसके बदले में शहादत मिली

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पंकज श्रीवास्तव

ऊपर की मुख्य तस्वीर में बाएँ एक पोट्रेट है। यह रेखाचित्र अज़ीमुल्ला ख़ान का है। माना जाता है कि यह शरलॉक होम्स जैसे जासूसी किरदार के रचयिता सर ऑर्थर कानन डायल के चाचा रिचर्ड डायल ने बनाया था। अज़ीमुल्ला के इसी रेखाचित्र से उनकी शक्लो-सरत और कद-काठी के बारे में अंदाज़ा लगता है। रिचर्ड डायल ने इसे तब बनाया था जब अज़ीमुल्ला ख़ान, बतौर नाना साहेब पेशवा के दीवान, लंदन गए थे ताकि उनकी रुकी हुई पेंशन शुरू करने के लिए पैरवी कर सकें।

अज़ीमुल्ला नाना साहेब की पेंशन तो नहीं शुरू करवा पाए, लेकिन यूरोप की इस यात्रा ने उनमें आज़ादी की ऐसी जंग शुरू करने का खवाब भर दिया जो अंग्रेज़ों को भारत से मार भगाती। अज़ीमुल्ला आज एक ग़ुमनाम क़िस्सा हैं, लेकिन उनकी योजना परवान चढ़ी होती तो भारत का नक्शा कुछ और होता। उनका रचा कौमी तराना, ऐसा लगता है कि इकबाल के सारे जहाँ से अच्छा की पृष्ठभूमि है।

अज़ीमुल्ला खाँ का जन्म सन 1820 में कानपुर शहर से सटी अंग्रेज़ी छावनी के परेड मैदान के समीप पटकापुर में हुआ था। उनके पिता नजीब मिस्त्री बड़ी मेहनत और परिश्रम करने वाले इंसान थे। घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी और परिवार गरीबी का जीवन व्यतीत कर रहा था। अज़ीमुल्लाह ख़ाँ की माँ का नाम करीमन था। सैन्य छावनी व परेड मैदान से एकदम नजदीक होने के कारण अज़ीमुल्लाह खाँ का परिवार अंग्रेज़ सैनिकों द्वारा हिन्दुस्तानियों के प्रति किए जाने वाले दुर्व्यवहारों का चश्मदीद गवाह और भुक्त भोगी भी था।

एक बार एक अंग्रेज़ अधिकारी ने अज़ीमुल्लाह के पिता नजीब मिस्त्री को घोड़ों का अस्तबल साफ़ करने को कहा। उनके इंकार करने पर उसने नजीब को छत से नीचे गिरा दिया और फिर ऊपर से ईंट फेंककर मारी। इसके परिणाम स्वरूप नजीब छह महीने तक बिस्तर पर पड़े रहे, फिर उनका निधन हो गया। माँ-बेटे पर भीषण विपदा आन पड़ी और आठ साल के अज़ीमुल्ला को दूसरों के घर काम करने के लिए मजबूर होना पड़ा।

उनके एक पड़ोसी मानिक चंद ने बालक अज़ीमुल्लाह को एक अंग्रेज़ अधिकारी हीलर्सडन के घर की सफाई का काम दिलवा दिया। दो वर्ष बाद ही उनकी माँ का भी इन्तकाल हो गया । अब अज़ीमुल्लाह ख़ाँ अंग्रेज़ अधिकारी हीलर्सडन के यहाँ रहने लगे। हीलर्सडन और उनकी पत्नी सहृदय लोग थे। उनके यहाँ अज़ीमुल्लाह ख़ाँ नौकर की तरह नहीं बल्कि परिवार के एक सदस्य के रूप में रह रहे थे। घर का काम करते हुए उन्होंने हीलर्सडन के बच्चों के साथ अंग्रेज़ी और फ्रेंच भाषा भी सीख ली।

इसके बाद हीलर्सडन की मदद से उन्होंने स्कूल में दाखिला भी ले लिया। स्कूल की पढ़ाई समाप्त होने के पश्चात हीलर्सडन की सिफारिश से उसी स्कूल में उन्हें अध्यापक की नौकरी भी मिल गयी। स्कूल में अध्यापकों के साथ अज़ीमुल्लाह ख़ाँ मौलवी निसार अहमद और पंडित गजानन मिश्र से उर्दू, फ़ारसी, हिन्दी और संस्कृत भी सीखने में लगे रहे। इसी के साथ अब वे देश की राजनितिक, आर्थिक तथा धार्मिक, सामाजिक स्थितियों में तथा देश के इतिहास में भी रुचि लेने लगे। उसके विषय में अधिकाधिक जानकारियाँ लेने और उसका अध्ययन करने में जुट गये।

 

अज़ीमुल्लाह ख़ाँ कानपुर में उस समय के विद्वान समाज का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा बन गये। उनकी प्रसिद्धि एक ऐसे विद्वान के रूप में होने लगी, जो अंग्रेज़ी रंग में रँगा होने के वावजूद अंग्रेज़ी हुकूमत का हिमायती नहीं था। अज़ीमुल्लाह ख़ाँ की यह प्रसिद्धि कानपुर के पास बिठूर रह रहे नाना साहब तक भी पहुँच गई। अंग्रेज़ गवर्नर-जनरल लॉर्ड डलहौज़ी की हुकूमत ने बाजीराव  द्वितीय का दत्तक पुत्र होने के कारण नाना साहेब की आठ लाख रुपये सालाना की वार्षिक पेंशन बंद कर दी थी। नाना साहब ने अजीमुल्ला खाँ को बिठूर बुलाया और अपना प्रधान सलाहकार नियुक्त कर लिया। उन्होंने वहाँ रहकर घुडसवारी, तलवारबाजी एवं युद्ध कला भी सीखी।

इस तरह पहुंचे थे इंग्लैंड

बाद में अज़ीमुल्लाह ख़ाँ नाना साहब की पेंशन की अर्जी लेकर इंग्लैण्ड गये। इंग्लैण्ड में उनकी मुलाक़ात सतारा राज्य के प्रतिनिधि रंगोली बापू से हुई। रंगोली बापू सतारा के राजा के राज्य का दावा पेश करने के लिए लंदन गये हुए थे। सतारा के राजा के दावे को ‘ईस्ट इंडिया कम्पनी’ के ‘बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर’ ने खारिज कर दिया। अज़ीमुल्लाह ख़ाँ को भी अपने पेंशन के दावे का अंदाजा पहले ही हो गया था। आखिरकार वही हुआ भी। बताया जाता है कि रंगोली बापू के साथ बातचीत के दौरान अजीमुल्ला खाँ ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह की अनिवार्यता जाहिर की। फिर दोनों इसी निश्चय के साथ भारत लौटे।

अजीमुल्ला खाँ, भारत वापसी से पहले यूरोप के देशों में घूमकर राजनीति का व्यावहारिक अध्ययन कर लेना चाहते थे।  इसी उद्देश्य से वह माल्टा जा पहुँचे। वहाँ देखा की क्रीमिया के युद्ध में रूस के मुकाबले इंग्लैंड और फ्रांस की संयुक्त फौज हार गई है। ब्रिटिश वीरता का खोखलापन उसके सामने प्रकट हो गया । वह सोचने लगे अगर भारत की देशी रियासते संयुक्त होकर अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध का बिगुल बजा दें तो अंग्रेजों को भगाया जा सकता है । इस घटना ने उनके मन में क्रांति और आशावाद का संदेश भर दिया।

 

1857 की सैनिक क्रांति की संरचना में अजीमुल्ला खां का ही प्रमुख हाथ था । उन दिनों रूस व इंग्लैण्ड में युद्ध जारी था। यह भी कहा जाता है कि अज़ीमुल्लाह ख़ाँ ने अंग्रेज़ों के विरुद्ध रूसियों से मदद लेने का भी प्रयास किया था। अज़ीमुल्लाह ख़ाँ के भारत लौटने के बाद ही 1857 की क्रांति की तैयारियों में तेज़ी आई। उन्होंने तात्या टोपे और रानी लक्ष्मीबाई के साथ मिलकर सैन्य रणनिति बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कहा जाता है कि कानपुर के पास अहिराना नामक स्थान पर युद्ध करते हुए शहीद हुए। एक मान्यता यह भी है कि क्रांति के असफल होने के बाद नाना साहब के साथ वह भी नेपाल चले गए थे। वहीं 1859 में 39 वर्ष की अवस्था में उनकी मृत्यु हुई। अंग्रेज़ों ने अज़ीमुल्ला ख़ाँ को 1857 की क्रांति का सबसे शातिर और क्रूर नेता कहा है।

अज़ीमुल्ला खाँ ने भारत का पहला राष्ट्रगीत लिखा था- ‘हम हैं इसके मालिक, हिंदुस्तान हमारा, पाक वतन है कौम का, जन्नत से भी प्यरा।‘ कौमी तराने- सारे जहाँ से अच्छा में इस गीत की गूँज साफ़ है। यह गीत 1857 की क्रांति के दौरान जगह-जगह गाया गया। इसे क्रांतिकारियों के अख़बार ‘पयामे-आज़ादी’ में सबसे पहले छापा गया था पढ़िए वह कौमी तराना

1857 का राष्ट्रगीत

हम है इसके मालिक, हिन्दुस्तान हमारा,

पाक वतन है कौम का, जन्नत से भी प्यारा।

 

ये है हमारी मिल्कियत, हिन्दुस्तान हमारा,

इसकी रूहानियत से, रौशन है जग सारा;

 

कितना कदीम कितना नईम, सब दुनिया से न्यारा,

करती है जरखेज़ जिसे, गंगो-जमन की धारा।

 

ऊपर बर्फ़ीला पर्वत, पहरेदार हमारा,

नीचे साहिल पर बजता, सागर का नकारा;

 

इसकी खानें उगल रही, सोना, हीरा, पारा,

इसकी शानो शौकत का, दुनिया में जयकारा।

 

आया फ़िरंगी दूर से, ऐसा मन्तर मारा,

लूटा दोनों हाथ से, प्यारा वतन हमारा;

 

आज शहीदों ने है तुमको, अहले वतन पुकारा,

तोड़ो गुलामी की जंजीरें, बरसाओ अंगारा।

 

हिन्दू, मुसलमां, सिख हमारा भाई-भाई प्यारा,

ये है आजादी का झन्डा, इसे सलाम हमारा।

(डॉ.पंकज श्रीवास्तव मीडिया विजिल के संस्थापक संपादक और इतिहास के शोधार्थी हैं, यह लेख मीडिया विजिल से सभार लिया गया है)