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नई दिल्लीः एक शाम अदब के नाम शाम-ए-सुखनगोई, नौजवान शायरों ने लूटी महफिल

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नई दिल्ली – साहित्यिक संस्था सुखनगोई द्वारा नई दिल्ली के ‘मुशावरत बिल्डिंग “में शायरी, कविता, और ग़ज़ल का आयोजन किया गया। शायरी से महकती शनिवार की इस दिलकश शाम का नाम ‘शाम-ए-सुखनगोई’ रखा गया। अनेकों ग़ज़ल प्रेमियों की उपस्थिति में कार्यक्रम का आगाज़ संस्था के संस्थापक,शायरा सलीमा आरिफ और शायर मोनिस रहमान के द्वारा सभी मेहमानों के स्वागत एंव सक्षिप्त में संस्था के बारे में बता कर किया गया। सलीमा आरिफ द्वारा कार्यक्रम के सदर शायर जनाब अदील ताबिश को शॉल से सम्मानित किया गया।

शायरी से महकती इस शाम के मौके पर अदील ताबिश ने कहा कि नए युवा रचनाकारों से अपील है कि वे इस तरह के कार्यक्रम आगे भी करते रहें ताकि समाज में साहित्य की धारा बहती रहे। उन्होंने नौजवानों से कहा कि वो सभी लोग अपनी ग़ज़ल को और बेहतर बनाने के लिए ग़ज़ल के जानकर उस्तादों से अपनी शायरी की इस्लाह करवाएं.

और संस्था को बधाई देते हुए कहा कि उनकी वजह से नए युवा जोशीले रचनाकारों के समक्ष आने का उन्हें मौक़ा मिला। उन्होंने इस तरह के कार्यक्रमों को आम लोगों तक पहुंचाने की बात करते हुए कहा कि समाज में रचनाकार लोगों की बेहद कमी हो गई है। उन्होंने नए युवा शायर और कवियों को अधिक से अधिक लोगों तक इस तरह के रचनात्मक कार्यों को पहुंचाने की बात कहते हुए सुखनगोई और इसके संस्थापकों सलीमा आरिफ़ और मोनिस रहमान को तहे दिल से शुक्रिया कहा।

कार्यक्रम में सबसे पहले शायर ज़ीशान अमजद ने स्टेज पर आकर अपना कलाम पढ़ा । ज़ीशान अमजद ने अपने शेर “ना तो तेरे बस में रही कभी ना तो मेरे बस में रही कभी , ये जो ज़िन्दगी की किताब है इसे बंद करके रही अजल“ से मेहमानों की ख़ूब वाहवाही लूटी।

लोगों के चहेते शायर नाज़िर वहीद ने इस महफिल में और भी चार-चाँद लगा दिया। उनके स्टेज पर आते ही बज़्म में थिरकन सी आ गई। “जो कुछ भी हमने यहाँ तीरगी में देखा है, हमारे बाद वो तुम रौशनी में देखोगे” ग़ज़ल के जरिए नाज़िर वहीद ने समा बाँध दिया। बिहार से तशरीफ़ लाये फ़र्रह शकेब ने निज़ामत का ज़िम्मा संभाला.

इस महफिल में और भी कई नए शायरों ने अपनी प्रस्तुति दी। नए युवा शायरों में अज़हर हाशमी, गायत्री मेहता, सुगंधा राज, गौरी चुघ, उसामा जुनैद, शारुख और अनस फैजी ने   ‘शाम-ए-सुखनगोई’ की इस महफ़िल को आख़िर तक शायरी और ग़ज़ल में डुबोए रखा। महफ़िल के आख़िर में मोनिस रहमान ने सभी महमानों को धन्यवाद करते हुए अपनी संस्था के भविष्य की योजनाओं के बारे में बताया।

क्या है सुख़नगोई ?

आज के युग में जहाँ सब कुछ बहुत तेज़ी से बदल रहा है, बहुत कुछ पीछे छुट रहा है। डिजिटल के दौर में हमें चीज़ों को भूलने की आदत पड़ती जा रही है।हम बहुत कुछ वो खो रहे हैं जिसको सेहजना,सवंरना हमारी ज़िम्मदारी है। इसी में एक है उर्दू ग़ज़ल शेरों शायरी।

सुखनगोई का जन्म शेरों शायरी की मक़बुलियत, रिवायत को ज़िंदा, तरोताज़ा रखने, उसे एक नई शक्ल, स्फूर्ति दिलाने की नियत से हुआ था। सुखनगोई का मक़सद नई नस्ल के दिमाग़ों से यह ग़लतफ़हमी भी निकालना है कि शायरी ,ग़ज़ल बहुत ‘बोरिंग’ होती है।

सुखनगोई का उद्देश्य नए शायरों, शायराओं के हाथों में एक ऐसा डाइस थमाना है जिस डाइस पर आकर वो किसी रिवायत,किसी बंदिश में बधें नहीं, बल्कि उर्दू ज़ुबाँ की रूह में खोकर शायरी पढ़े।ग़ज़ल की खुबसूरती में मदहोश होकर दूसरों के कलाम को सुने और नज़्मों की तिरछी चाल से क़दम से क़दम मिलाकर शायरी की महफ़िलों का लुत्फ उठाएं। वो एहसास जो ज़िन्दगी के हर पहलू को किसी ने किसे तरह से शायरी से जोड़ते हैं,ऐसे ही एक एहसास का नाम है सुखनगोई।