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ये हैं राफेल घोटाले से जुड़े वे सवाल जिन्हें न तो गोदी मीडिया उठाएगा, और ना ही मोदी सरकार जवाब दे पाएगी

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कृष्णकांत

बोफोर्स घोटाले के बाद जो पारदर्शी प्रक्रिया और नियम बनाये गए उनका पालन क्यों नहीं किया गया? सरकार ने अब तक यह क्यों नहीं बताया कि पूरा सौदा कितने का है? अगर वायुसेना ने 126 मांगे तो मात्र 36 विमान क्यों खरीदे जा रहे हैं? अगर सरकार या पीएम ने अपने स्तर पर यह बदलाव किया तो उसे कैटेगराइजेशन कमेटी के पास अप्रूवल के लिए क्यों नहीं भेजा? उक्त कमेटी, डिफेंस एक्यूजिशन कॉउंसिल, रक्षा मंत्री, सेनाओं के प्रमुख, वित्त मंत्रालय आदि की सहमति के बिना यह फैसला कैसे लिया गया कि 124 की जगह 36 विमान आएंगे? अगर सौदे में बदलाव हुआ तो दोबारा टेंडर की प्रक्रिया क्यों नहीं अपनाई गई?

राफेल कॉम्बैट एयरक्राफ्ट के साथ ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी भी होना था जिससे आगे चलकर हम राफेल के निर्माण मे आत्मनिर्भर होते। जो सरकार मेक इन इंडिया का नारा दे रही हो, वह ट्रान्सफर ऑफ टेक्नोलॉजी की शर्त सौदे से क्यों हटा देती है? समझौते के ठीक पहले मार्च, 2015 में डसाल्ट के सीईओ एलेक्ट्रैपियर कहते हैं कि हम हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) के साथ मैन्युफैक्चरिंग का काम करने जा रहे हैं। अचानक इसमे अम्बानी का प्रवेश कैसे हुआ? जब मोदी जी फ्रांस जा रहे होते हैं तो उसके पहले विदेश सचिव अपने बयान में कहते हैं कि मोदी जी फ्रांस जा रहे हैं, वे वहां पर 126 राफेल विमान खरीद की वार्ता को आगे बढ़ाएंगे। जिस दिन मोदी जी वहां पहुंचते हैं उस दिन फ्रांस के राष्ट्रपति हॉलैंड कहते हैं कि 126 राफेल की डील पर हमारी बात आगे बढ़ेगी। फिर उसी दिन 36 विमानों पर डील कैसे साइन हो गई?

क्या नई डील के बारे में फ्रांस के राष्ट्रपति, भारत के रक्षा मंत्री और वायुसेना व भारतीय रक्षा समितियों को पता था? अगर पता था तो समझौते के ठीक पहले कुछ और बयान क्यों दिये गए? अगर आने वाले विमानों की कॉन्फ़िगरेशन वही होगी जो पुराने समझौते में थी तो 670 करोड़ का विमान 1600 करोड़ से ज़्यादा का कैसे हो गया? जिन प्रधानमंत्री को खुद रक्षा समझौते में कोई फैसला लेने का अधिकार ही नहीं है, उन्होंने अपने स्तर से फैसला क्यों लिया जिसके तहत भारत सरकार की अनुभवी कंपनी को नुकसान पहुंचाकर अम्बानी को फायदा पहुंचाया गया? यह कौन सा मेक इन इंडिया अभियान है जो भारत को रक्षा मामले में आत्मनिर्भर होने से ही रोक रहा है?

यह कौन सी चौकीदारी है जो भारत सरकार की अपनी कंपनी को ही बाहर करके देश को नुकसान पहुंचाती है? 78 साल पुरानी HAL को हटाकर अम्बानी की दस दिन पहले बनी बोगस कंपनी को इतनी महत्वपूर्ण डील में क्यों शामिल किया गया, क्या इसकी कोई आपात या अहम वजह पैदा हुई? जब 126 की जगह 36 ही विमान आएंगे और रेडी टू फ्लाई कंडीशन में आएंगे तो अम्बानी का क्या काम है? और रक्षा क्षेत्र में कौन सा काम उन्होंने किया है जो वो इन विमानों में सुरखाब के पर लगा देंगे? नवंबर 2016 में संसद में सरकार कहती है कि प्रति विमान 670 करोड़ में खरीदा जाएगा, तो फिर प्रति विमान का दाम 1600 करोड़ से ज़्यादा कैसे पहुंच गया? रिलायंस इस डील में ऑफसेट के नाम पर शामिल हुई।

इस डील में ऑफसेट है 30 हज़ार करोड़, जिसका बड़ा हिस्सा रिलायंस को मिलेगा। यह बात सरकार ने क्यों छुपाई? यह बात सरकार की जगह डसाल्ट और रिलायंस ने क्यों बताई? सरकार ने आज की तारीख तक देश की जनता से यह क्यों नहीं बताया कि वह कितने में डील कर रही है? सरकार इस डील में प्रक्रिया, दाम आदि को लेकर पारदर्शी क्यों नहीं है? प्रधानमंत्री ने समझौते के बाद कहा था कि विमान ठीक उसी कॉन्फ़िगरेशन में आएंगे। फिर जेटली जी इंडिया स्फेसिफिक ऐड ऑन की बात बताकर जनता से झूठ क्यों बोल रहे हैं? वे पर्रिकर के बयान से अलग दाम बढ़ने घटने की जलेबी क्यों बना रहे हैं? अगर इंडिया स्पेसिफिक ऐड ऑन के तहत विमानों में 500 करोड़ के हेलमेट लगाने की बात जोड़ी गई, तो इसकी अनुमति या सहमति किससे ली गई? क्या वायुसेना ने कहा था कि हमे 500 करोड़ वाला हेलमेट भी चाहिए? क्या बाकी कमेटियों से इसपर सहमति ली गई? अगर यह दाम इसलिए बढ़े कि आप इंडिया स्पेसिफिक ऐड ऑन करना चाह रहे तो उसकी अप्रूवल किससे ली?

अगर सरकार ने गलती नहीं की तो रक्षा मंत्री इस पर बयान क्यों नहीं दे रहे? दूसरे मंत्री क्यों बयानबाजी कर रहे हैं? डील से ठीक पहले हॉलैंड की प्रेमिका की फ़िल्म में अम्बानी की कंपनी द्वारा 200 करोड़ के निवेश का क्या राज है?  सरकार सीक्रेसी एग्रीमेंट के कारण अगर जवाब नहीं दे रही है तो इतनी बयानबाजी क्यों की जा रही है? फ्रांस के राष्ट्रपति हाल ही में कह चुके हैं कि अगर भारत सरकार चाहे तो विपक्ष को ज़रूरी सूचनाएं दे सकती है, फिर मोदी सरकार किस समझौते का हवाला दे रही है? और जब सेक्रेसी एग्रीमेंट है तो पर्रिकर, जेटली, मोदी और अम्बानी आदि ने इतने बयान क्यों दे डाले? क्या आरएसएस और मोदी जी की देशभक्ति उन्हें इसकी जिम्मेदारी लेने को प्रेरित करेगी? सबसे बड़ा और आखिरी सवाल है कि मोदी सरकार, जो साढ़े तीन लोगों की है, और भारतीय जनता पार्टी जो डेढ़ लोग मिलकर चला रहे हैं, क्या वे 140 करोड़ जनता को सनातन मूर्ख समझते हैं?

(लेखक युवा पत्रकार एंव कहानीकार हैं)