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रवीश का लेखः इतना याद रखिए कि जिस लाइन को खींचने में आप योगदान दे रहे हैं वो एक दिन खाई बन जाएगी।

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कुलदीप कुमार

हमारे देश के विश्वविद्यालयों में चल रहा एक घोटाला बता देता हूँ जहाँ एक हस्ताक्षर की कीमत 500 रुपए हैजब भी कोई छात्र भारत से बाहर कहीं भी पढ़ाई के लिए दाखिले की अर्ज़ी भरता है तो उसे अन्य दस्तावेजों के साथ “official transcript” की जरुरत पड़ती है।Official transcript असली मार्कशीट/डीएमसी की फोटोकॉपी होती है जिसे यूनिवर्सिटी रजिस्ट्रार ने हस्ताक्षर करके सत्यापित किया होता है।

पंजाब यूनिवर्सिटी, चंडीगढ़ में पढ़ाई के हर दस्तावेज की ट्रांसक्रिप्ट लेने की फीस 500 रुपए है। दो साल की मास्टर डिग्री के चार सेमेस्टर की परीक्षाओं के रिजल्ट और एक पेज डिग्री को मिलाकर पांच दस्तावेज बनते हैं, और ट्रांस्क्रिप्ट लेने की कुल फीस 2500 रुपए बनती है। और 500 से 1000 रुपए तक डाक सेवा के अलग देने होते हैं। तो एक डिग्री के हुए 3000 रुपए।

अक्सर छात्र मास्टर और बैचलर दोनों डिग्रीओं की ट्रांसक्रिप्ट लेते हैं, तो कुल राशि हुई कम से कम 6000 रुपए। जब भी विदेश में दाखिला लेने की कोशिश करते हैं तो अक्सर 4-5 अर्जियां भरते हैं। तो कुल मिलाकर हुए 25000-30000 रुपए, हस्ताक्षर करने के। एक छात्र के। “U.S. government’s Student and Exchange Visitor Information System (SEVIS) database” के मुताबिक अमेरिका में साल 2018 में 211703 छात्र भारत से आकर पढ़ रहे हैं।

तो 25000 रुपए एक छात्र के हिसाब से मोटा-मोटी राशि 500 करोड़ रुपए बनती है, सिर्फ अमेरिका में दाखिला लेने की, बाकी देशों को अभी छोड़ देते हैं। ध्यान रखिए कि 500 करोड़ रुपए वो सालाना राशि है जो दाखिला लेने में कामयाब होने वाले छात्रों से आती है, जिनको दाखिला नहीं मिलता वो इसमें शामिल नहीं है, और वो भी सिर्फ अमेरिका में। एक बात यह भी है कि भारत के सभी विश्वविद्यालयों में ट्रांसक्रिप्ट लेने की फीस अलग-अलग है, तो यह राशि कम-ज्यादा हो सकती है।

जब मैंने 2013 में अमेरिका में पीएचडी के लिए अर्जियां भरी तो इतने पैसे नहीं थे।पंजाब यूनिवर्सिटी के वीसी तक गुहार लगाई थी लेकिन एक रुपया तक कम नहीं हुआ। जब कोई रास्ता नहीं निकला तो मेरी बैचलर डिग्री की ट्रांस्क्रिप्ट के पैसे एक दोस्त के पिताजी ने गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी अमृतसर में दिए, और मास्टर डिग्री के पैसे पंजाब यूनिवर्सिटी के ही एक नेक दिल अधिकारी ने दिए। बाकी खर्चे बड़े भाई और दोस्तों ने मिलकर पूरे किए, जिसकी वजह से मैं आज अमेरिका में पीएचडी कर रहा हूँ। इसी लिए क़स्बा के लिए लिखे अपने लेख में लिखा था का हार्वर्ड जैसे संस्थानों में पहुँचने के लिए सिर्फ हार्डवर्क काफी नहीं।

इसके इलावा डाक सेवा का घोटाला अलग से। पंजाब यूनिवर्सिटी चंडीगढ़ के नियमों मुताबिक ट्रांसक्रिप्ट भारतीय डाक सेवा से भेजी जाएगी। लेकिन यूनिवर्सिटी की सर्टिफिकेट शाखा में, जहाँ ट्रांस्क्रिप्ट बनती है, DHL कूरियर का कर्मचारी परमानेंट बैठा है, जो सभी छात्रों के दस्तावेज पोस्ट करता है। अगर कोई छात्र कहे कि मुझे दस्तावेज भारतीय डाक सेवा से ही भेजने हैं तो पंजाब यूनिवर्सिटी के अधिकारी उसे डरा देते हैं कि रजिस्टर्ड पोस्ट कभी पहुँचती नहीं है और तुम्हारा नुक्सान हो जायेगा। छात्र 500 रुपए की बजाए DHL को 1500 रुपए तक देता है।भारतीय डाक की स्पीड पोस्ट का तो कोई नाम ही नहीं लेता।

कुछ लोग कहेंगे कि विदेश में पढ़ाई करने वाले तो अमीर घरानों से होते हैं, उन्हें 25-30 हजार से क्या फ़र्क़ पड़ता है। उन्हें बस यही कहना है कि बेशक आप मेरी परिस्थिति से इस मसले को मत समझिए, लेकिन यह तो सोचिए कि क्या एक हस्ताक्षर के 500 रुपए जायज हैं, वो भी उस दस्तावेज के जिसके लिए हमने ही सालों तक फीस दी है। अगर यह समझने के कोशिश करेंगे कि कैसे हमारा सिस्टम कुछ चुनिंदा मौके समाज के किसी ख़ास तबके के लिए ही सुरक्षित रखता है और पहले से ही हाशिए पर रखे गए वंचित लोगों की पहुँच से बाहर कर देता है, तो यह सवाल बड़ा हो जाता है, क्योंकि समाज का वही ख़ास तबका कुछ समय बाद राष्ट्र निर्माण का ठेका लेता है और असमानता ख़त्म करने के भाषण देता है।

यकीन नहीं आता तो हमारे देश के सर्वोच्च शिक्षा संस्थानों में बचे हुए शिक्षकों और मुख्य नीति निर्माताओं (“थिंक टैंक”) की शैक्षणिक पृष्ठभूमि को जांचिए, और उनकी शिक्षा का उनके पदों से तुलनात्मक मूल्यांकन करिए। फिर भी समझ नहीं आए तो कृपया मुझे माफ़ कर दीजिए। लेकिन इतना याद रखिए कि जिस लाइन को खींचने में आप योगदान दे रहे हैं वो एक दिन खाई बन जाएगी।

(नोट – कुलदीप कुमार का यह लेख मशहूर पत्रकार रवीश कुमार ने अपने फेसबुक पेज पर पोस्ट किया है, इस लेख को उनके फेसबुक पेज से ही लिया गया है)