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कभी देश के लिये जीते थे मैडल लेकिन आज अपनी ग़रीबी और बेबसी पर आंसू बहा रहा है यह खिलाड़ी, रहने को घर भी नहीं

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नई दिल्ली –  संजय कभी कभी हरियाणा की शान हुआ करते थे, साल 2005 से लेकर 2013 तक लगातार वे अपने गृह राज्य की झोली में मेडलों डालते रहे, उन्होंने हर एक राष्ट्रीय चैम्पियनशिप जीता, संजय के नाम गोल्ड मेडल की हैट्रिक भी है। एक वक्त था कि राज्य के नेता उनके साथ साथ फोटों खिंचवाने में फख्र महसूस किया  करते थे।

संजय सिंह हर एक प्रतियोगिता में तिरंगे के साथ पोडियम पर नजर आते थे, लेकिन अब उसी संजय सिंह की हालत ऐसी हो गई है कि लोग उन्हें पहचान भी नहीं पा रहे हैं, कभी जिन हाथों में तिरंगा और होठों पर मुस्कान होती थी, आज उन हाथों में फावड़ा है होठों पर दर्द है, और आंखों में आंसू हैं। यह खिलाड़ी अब अपनी बेबसी पर आंसूम बहा रहा है। उनके आर्थिक हालात इस कदर खराब हो गये हैं कि उन्हें अपना परिवार पालने के लिये राजमिस्त्री के साथ मजदूरी करनी पड़ रही है।

अपना परिवार चलाने के लिये और दो जून की रोटी अर्जित करने के लिये संजय सिंह कायत राजमिस्त्री के साथ मजदूरी करते हैं। कभी उन्हें काम मिल जाता है तो कभी घर मेंही  खाली बैठना पड़ता है। किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि जो खिलाड़ी इस देश का सर्वश्रेष्ठ वुशु खिलाडी हुआ करता, जो 2004 से 2009 तक जूनियर खिलाड़ी के तौर पर राष्ट्रीय चैम्पिय़न रहे और 2010, 2011, 2013 में लगातार सीनियर नैशनल में भी चैम्पियन बने,  और 2012 में जिनको रजत पदक मिला। उनकी ऐसी हालत हो जायेगी।

जब पिता को वेंटिलेटर पर छोड़ देश के लिये खेलने गये थे संजय

बात 2013 की है, तब संजय मलेशिया में आयोजित वर्ल्ड चैम्पियनशिप में खेलने गए थे, लेकिन जिस भारी मन से घर से विदा हुए थे उस दर्द को सिर्फ संजय ही समझ सकते हैं, जब संजय मलेशिया गये तो उनके पिता बीमार चल रहे थे वैंटिलेटर पर थे और उसी दौरान उनकी मौत हो गई थी। संजय के सर के ऊपर देश केलिये मैडल जीतने का जूनून सवार था और इसी जूनून के चलते वे अपने पिता को कांधा तक नहीं दे पाये।


हरियाणा का यह वूशू प्लेयर संजय नैशनल चैम्पियन होने के साथ-साथ स्नातक भी हैं। हरियाणा की हुड्डा सरकार में उन्होंने खेल नीति के तहत नौकरी की मांग की थी, लेकिन आश्वासन के अलावा उन्हें कुछ नहीं मिला, हां फोटो खिंचवाने के लिए सभी पार्टियों के नेता इनके घर आते रहे। लेकिन जब से संजय की आर्थिक हालत खराब हुई है तब से उन लोगों ने भी संजय से मुंह मोड़ लिया जो कभी संजय के साथ फोटो खिंचवाने में गर्व महसूस किया करते थे

रहने को घर तक नहीं

संजय की आर्थिक हालत इतनी ज्यादा खराब हो चुकी है कि उनके पास अब रहने के लिये घर तक नहीं है। वे गांव से बाहर खेतों में 1000 रूपए किराए के मकान में वे रह रहे हैं।  उनकी पत्नी सोनू का कहना है कि हमारे लिए तो इनके मेडल रद्दी के ढ़ेर के अलावा कुछ नहीं हैं। इन मैडलों से पेट तो नहीं भर सकता, पेट तो नौकरी से आने वाले पैसे से ही भरेगी, लेकिन वो मिली नहीं, इसलिए अब पेट पालने के लिये मजदूरी करनी पड़ रही है। उनकी पत्नि कहती हैं कि सरकार को बताना चाहिए कि हमारे साथ अन्याय क्यों किया जा रहा है।

(सभार न्यूज़18 हरियाणा के सौज्य से, पूरी रिपोर्ट आप यहां क्लिक करके पढ़ सकते हैं)