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अटल के नाम पर दिल्ली में अग्रिवेश, बिहार में प्रोफेसर की लिंचिंग, यही तो अटल संस्कृति का सरमाया है?

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तारेन्द्र किशोर

मोतिहारी मेरा गृह ज़िला है. जब यहां महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना हो रही थी तो मैं बहुत खुश हुआ था. मुझे लगा था कि मेरे ज़िले के बच्चों को पढ़ने के लिए अब उस तदाद में बाहर नहीं जाना पड़ेगा और उसे अच्छी सुविधाओं से युक्त एक विश्वविद्यालय में पढ़ने का मौका भी मिलेगा. इसके बाद कई बार वहां से अनियमिताओं और प्रशासनिक भेदभाव की शिकायतें आती रहीं.

जब जेएनयू से पीएचडी किए संजय जी की वहां समाजशास्त्र के असिस्टेंट प्रोफेसर की रूप में नियुक्ति हुई तो बड़ा अच्छा लगा कि कोई जेएनयू का जानने वाला हमारे ज़िले के केंद्रीय विश्वविद्यालय में पढ़ाने गया है. मैंने उन्हें फोन कर कहा कि कोई असुविधा होगी तो बताइएगा. उन्हें उस वक्त किराए पर अच्छा घर मिलने में मुश्किल हो रही थी. मैंने उन्हें कहा कि मैं देखता हूँ कि किसी जानने वाले का अच्छा घर आपको किराए पर मिल जाए. लेकिन तब तक तो उन्हें कोई अच्छी जगह मिल गई.

इसके बाद विश्वविद्यालय में होने वाली तमाम गड़बड़ियों के खिलाफ वो काफी मुखर हो चुके थे और वीसी के खिलाफ उन्होंने मोर्चा खोल दिया था. उनके ऊपर कार्रवाई भी हुई. लेकिन वो अपनी लड़ाई के साथ जमे हुए थे. टूट नहीं रहे थे. भेड़चाल में शामिल ना होते हुए अटल जी को लेकर सच और तर्कपूर्ण टिप्पणी करने की वजह से उनके ऊपर अटल जी द्वारा पैदा की गई राजनीतिक संस्कृति के गुर्गों ने जानलेवा हमला किया. घर से निकालकर मॉब लिंचिंग करने की कोशिश की गई. कल ही उन्हें पीएमसीएच रेफर कर दिया गया था जहां उनका इलाज चल रहा है.

ऐसा ही कुछ कुकर्म अटल संस्कृति के पैदावारों ने बीजेपी दफ़्तर में भी कल स्वामी अग्निवेश के साथ किया. श्रद्धांजली के नाम पर और फैलाइए उन्माद. बाकी तो हम सब भले मानुष है ही जिनकी लोकतंत्र के राजनीतिक और सामाजिक शिष्टाचार में बहुत गहरी आस्था है और जो एक खास तरह के लोगों के लिए विशेष तौर पर कुलबुलाती है.

भारतीय जनमानस की समझ

एक सॉफ्ट टाइप संघी भारतीय जनमानस को बहुत भाता है या यूं कहे कि भारतीय मध्यमवर्गीय जनचेतना को. भारतीय मध्यमवर्ग की यही वो मनोदशा है जहां से संघ अपने लिए पहले जगह बनाता है फिर विकराल होता जाता है. उसके बाद इसी जनसमूह के दूसरे कथित उदारवादी जो येनकेन प्रकारेण अलग-अलग राजनीतिक पक्षधरता रखते हैं, छाती पीटते हुए चिल्लाते हैं कि संघ इस देश को बर्बाद कर रहा है. इस देश की मूल संस्कृति से खिलवाड़ कर रहा है. संघी मानसिकता के उदारवादी और कट्टरवादी खेमों का यह खेल इंदिरा गांधी के दूसरे कार्यकाल के वक्त से भारत की राजनीति का मूल है.

अगर आप शालीन हैं, वाकपटु हैं, मृदुभाषी हैं और इत्तेफाक से कवि हृदय भी हैं (भले ही तुकबंदी वाले ही सही), तो आप बड़े आराम से इन गुणों के आड़ में कोई भी जघन्य अपराध कर सकते हैं. आपके सम्मान पर आंच नहीं आएगी. उल्टे इजाफा ही होगा. और तब आपके जाने के बाद दुनिया कुछ यूँ याद करेगी आपको, ‘बड़े प्रखर-ओजस्वी वक्ता थे साहब’. ऐसे भी इस समाज में शराफत की चादर ओढ कर दुराचारी होने का पुराना रिवाज है. वाकपटुता के दम पर अपने दोहरे चरित्र को छुपाने और न्यायसंगत ठहराने में इस समाज को महारथ हासिल है. और हिंदी समाज तो बड़ा भावुक है. हिंदी की शब्दावली के चतुर और लच्छेदार प्रयोग से ही बह जाता है.

इमेज बिल्डिंग में मोदी से भी आगे थे अटल

इमेज बिल्डिंग और ब्रांडिंग के मामले में अटल जी मौजूदा प्रधानमंत्री मोदी जी से बहुत आगे साबित हुये. कम से कम मोदी जी को इसतरह तो याद नहीं ही किया जायेगा. ऐसी उम्मीद है. जबकि लोक व्यवहार छोड़ दे तो कर्म के स्तर पर दोनों एक जैसी ही पर्सनालिटी हैं. मुझे लगता है कि मोदी जी की रुखसती के वक़्त शायद इसतरह उनकी बुजुर्गियत और मरने के दिन का हवाला न दिया जायेगा या उस वक़्त भी बाज नहीं आएंगे हम सब. चलिये ये तो देखने वाली बात होगी. फिलहाल जो दिख रहा है उस पर बात करते हैं. अटल जी के कार्यकाल के कामों पर एक नज़र डालें:-

 

  1. आजाद भारत में पहली बार इनके प्रधानमंत्री रहने के दौरान सरकारी कंपनियों को बेचने के लिए अलग से एक मंत्रालय बना और धड़ाधड़ कंपनियां बेची गई. कंपनी बिकते ही रिजर्वेशन खत्म.

 

  1. इनके समय संविधान बदलने के लिए पहली बार संविधान समीक्षा आयोग बना. लेकिन बदल नहीं पाए। विरोध हो गया.

 

  1. इनके समय में भारत ने पाकिस्तान से पहली बार भारत भूमि में लड़ाई लड़ी. पाकिस्तानी पुरानी स्थिति में लौट गए तो उसे जीत बताया गया. सैकड़ों सैनिक शहीद हो गए.

 

  1. प्रमोशन में आरक्षण खत्म होने की शुरूआत इनके समय हुई.

 

  1. भारत का एक भीषणतम दंगा हुआ, कई दिनों तक चला. कोई कार्रवाई नहीं की. दुखी थे.

 

  1. बाबरी मस्जिद गिरने पर चुप रहे. दुखी थे. कुछ बोल नहीं पाए.

 

  1. इनके समय में खूंखार आतंकवादियों को रिहा करने के लिए केंद्रीय मंत्री कंधार तक गए थे.

 

  1. पुरानी पेंशन स्कीम इनके समय खत्म की गई.

 

  1. जाति जनगणना कराने के एच. डी. देवेगौड़ा सरकार के फैसले को बदल दिया. आडवाणी तब गृह मंत्री थे.

 

इन सब महान कार्यों के बावजूद वो अपनी सौम्य और सर्वस्वीकार्य छवि गढ़ने में कामयाब रहे. मोदी काल की वजह से उन्हें उदार भी माना जाने लगा. बहुत बड़ी गुरु दक्षिणा दे दी है मोदी ने अटल जी को.

विदेश नीति और अटल

अटल जी के कार्यकाल में पाकिस्तान के साथ अच्छे संबंधों की बहुत कोशिशें की गईं. फिर चाहे लौहार बस यात्रा हो या समझौता एक्सप्रेस शुरू करना. अटल जी ने पाकिस्तान के साथ खूब दोस्ती की पींगें बढ़ाई. परिणाम में हमें मिला कारगिल का युद्ध. जिसमें भारत अपनी ज़मीन से देश के कई जवानों के शाहदत के बाद पाकिस्तानियों को हटाने में कामयाब रहा.

इसके बावजूद वो परम सम्मानीय है और कोई उन्हें पाकिस्तान परस्त नहीं कहता. इमेज बिल्डिंग के मामले में इतना बड़ा खिलाड़ी नेता भारत के राजनीतिक इतिहास में शायद ही कोई मिले. पाकिस्तान से नफ़रत करने वालों के लिये भी वो श्रधेय बने रहे. जबकि पाकिस्तान के साथ इस तरह के ही या इससे कम दोस्ताना संबंध रखने वाले राजनेताओं को विलेन के तौर पर यही जमात देखती है और खूब दुष्प्रचार करती है उन्हें लेकर. भारतीय जनमानस के इस दोहरे चरित्र के लिये कोई शब्द ढूंढ़ना मुश्किल है.

(लेखक जाने माने पत्रकार हैं, ये उनके निजी विचार हैं)