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नज़रियाः दिल्ली में शानदार जीत दर्ज करने वाली AAP का जनाधार दिल्ली से बाहर क्यों नहीं बढ़ पा रहा है?

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उर्मिलेश

कर्नाटक में आम आदमी पार्टी और स्वराज इंडिया पार्टी ने भी चुनाव लड़ा। केजरीवाल की पार्टी के सभी उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई। योगेन्द्र यादव की पार्टी के एक उम्मीदवार को छोड़कर किसी की जमानत नहीं बची! चुनाव आयोग के आंकड़ों के जंजाल में फंसकर एकाध तथ्य ग़लत हों तो मित्र गण सुधार सकते हैं! ग़लत तथ्य परोसने की मेरी कोई मंशा नहीं!

योगेन्द्र की पार्टी के जिस उम्मीदवार की जमानत बची और वह दूसरे नंबर पर रहा लेकिन इसमें पार्टी का कोई खास योगदान नजर नहीं आता। उक्त युवा उम्मीदवार के पिता विधायक थे। एक प्रतिष्ठित सामाजिक राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में प्रतिष्ठित थे। उनके निधन के बाद उक्त सीट पर योगेन्द्र की पार्टी ने उनके बेटे को चुनाव लड़ाया। कांग्रेस ने उसके लिए यहां से उम्मीदवार नहीं उतारा था। यानी वह कांग्रेस समर्थित प्रत्याशी भी था। वह दूसरे नंबर पर रहा पर जीत नहीं सका।

यहां कुछ सवाल उभर रहे हैं:

  • क्या वैकल्पिक राजनीति के दावे करने वालों को अवाम समझ नहीं पा रही है या ये पार्टियां ही अवाम को समझ नहीं पा रही हैं?

 

  • दिल्ली में शानदार जीत और फिर सरकार बनाने के बावजूद आम आदमी पार्टी व्यापक जनाधार की तरफ क्यों नहीं बढ़ पा रही है! किसी भी अन्य प्रदेश में उसे कोई उल्लेखनीय सफलता नहीं मिलती नजर आ रही है! ऐसा क्यों?

 

 

  • पार्टी ने दिल्ली में कुछ मामलों में अच्छे कदम उठाए, खासतौर पर शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में। फिर भी इसका बाहर के सूबों में कोई खास असर क्यों नहीं दिखता?

 

  • सत्ता में आने के साथ ही इसके बड़े नेताओं ने एरोगेंस के मामले में अनेक कांग्रेसियों(जो दशकों सत्ता में रहे हैं) और कई भाजपाइयों(ये भी कई वर्ष सत्ता के स्वाद चखे हैं) को भी पीछे छोड़ दिया! इनमें संकीर्णता तो ‘संघियों’ जैसी है! क्या आंदोलन के बजाय एरोगेंस की तरफ झुकने के चलते ये फिसड्डी साबित हो रहे हैं?

 

 

  • योगेन्द्र की पार्टी तो अभी नयी है और सत्ता का स्वाद कहीं नहीं चखा! पर ऐसा लगता है कि यह पार्टी जन-आंदोलन के बजाय सिर्फ कुछ प्रखर विमर्श, अपनी वि-भ्रमित वैचारिकी और थोड़े बहुत जोड़-तोड़ पर ज्यादा भरोसा जताती नजर आ रही है।

 

  • मुझे लगता है, भाजपा-संघ जैसी संगठित शक्ति के मौजूदा उभार को सिर्फ जोड़-तोड़, कुछ एरोगेंट राजनीतिक-समूहों या प्रखर विमर्शों के बल पर निर्णायक तौर पर नहीं रोका जा सकता!

 

  • इसके लिए नये अवामी विचार और संगठित अवामी आंदोलन की जरूरत है।

 

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)