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मुस्लिम समुदाय पर की जाने वाली अभद्र टिप्पणियों पर जो लोग तालियां बजाते हैं ‘मुल्क’ उनके मुंह बंद करती है।

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अब्दुल रशीद

मुल्क फिल्म की कहानी, उस बनारस की है,जो गंगा जमुनी तहज़ीब के लिए देश दुनियां में जानी जाती है. फिल्म में मुराद अली मोहम्मद मुख्य किरदार है जिसे ऋषि कपूर ने बखूबी निभाया है.यह कहानी है एक मुस्लिम संयुक्त परिवार की है,जो बनारस में ऐसी आबादी में रहता है जहां गंगा जमुनी तहज़ीब रचता बसता है. यह उन मुस्लिम परिवारों में से एक है जिसने बटवारे के वक्त मज़हब और मुल्क में मुल्क को चुना और भारत में रहने का फैसला किया.

फिल्म में दिखाया गया है की,वाराणसी में पले-बढ़े मुराद अली ने अपने लिए एक सामाजिक ताना बाना बुन रखा है, जिसमें उसके परिवार वालों के साथ उनके दोस्त भी शामिल हैं, जो अलग-अलग धर्मों को मानने वाले हैं. वह अपने हिंदू दोस्तों को अपने यहां दावतों में बुलाता है, उनकी दुकानों पर रुकता है, चाय पीता है, उनके साथ बैठ कर गपशप करता हैं,चुटकुले सुनाता है,सुनता है,और साथ मिलकर सभी ठहाके लगाते हैं.

लेकिन यह सब सामाजिक ताना बाना तब बिखर कर बदरंग हो जाता है, जब मुराद का भतीजा शाहिद (प्रतीक बब्बर), जो कि एक बम धमाके का आरोपी है, को पुलिस गोली मार देती है. शाहिद एक आतंकवादी था, इसमें कोई दो राय नहीं है,लेकिन यह भी उतना ही सच है की उसका परिवार उसके गुनाह से किसी भी तरह से इत्तेफाक़ या सहानुभूति नहीं रखता है और यहां तक कि उसके शव को भी लेने से इनकार कर देता है.

कहानी आगे बढती है और परिवार के सभी निर्दोष सदस्यों को भी आतंकवादी गतिविधियों में शामिल है,ऐसा मान कर पुरे परिवार को घेरा जाता है. पहले मुराद के भाई पर आरोप लगता है,जिसे वह सह नहीं पता और वह ज़हाने पानी से कूच कर जाता है.फिर मुकदमा मुराद पर कर दिया जाता है,जिससे नर्वस हो कर अपनी बहू [तापसी पन्नू] से मुकदमा लड़ने के लिए कहता है।

इस फिल्म के मुख्य किरदार को दो मुद्दों पर जूझते देखेंगे,पहला अपने उपर लगे बदनुमा दाग़ से जो उसके जिंदगी भर की कमाई सामाजिक सौहार्द के ताने बाने को एक पल में तितरबितर कर दिया है,दूसरा उस सोंच से जो उसे अपने मुल्क का गद्दार मानता है,और जो कहता है तुम अपना मुल्क छोड़ दो.

फिल्म का असल मकसद सरकारी वकील के साम्प्रदायिक कहानी को आधार बना कर आरोप साबित करने की कोशीश और उसके ज़वाब में मुराद के बहू द्वारा दिए गए तर्क में छुपा है.

अनुभव सिन्हा द्वारा लिखित,निर्देशित और प्रस्तुत फिल्म मुल्क के किरदार की बात करें तो, इस फिल्म में ऋषि कपूर ने अपने किरदार को बखूबी निभाया है,उन्होंने अपनी भूमिका में गुस्सा- गम,निराशा-हताशा और हास्य-सयंम का बेहतरीन मिश्रण किया है.बाकी किरदार पाहवा, पन्नू और राणा जैसे अदाकारों ने भी फ़िल्म में अच्छा काम किया है.

आतंकवाद की परिभाषा फिल्म के अनुसार राजनीतिक मकसदों को पूरा करने के लिए हिंसा और आतंक का गैरकानूनी इस्तेमाल, खासतौर पर नागरिकों के खिलाफ, आतंकवाद है. हालांकि सियासत में यह परिभाषा अस्वीकार्य है. और अंत में जज द्वरा फैसला सुनाते वक्त कही गई बाते फ़िल्म ख़त्म होने के बाद आपको सोंचने पर विवश करता है,यही फिल्म की सबसे बड़ी कामयाबी है.

इस फिल्म को आप जब वसुधेव कुटुम्बकम की धारणा और अनेकता में एकता के मूल भावना के साथ देखेंगे,तो न केवल आपको इस फ़िल्म को देखने में मजा आएगा बल्कि इस फिल्म के उद्देश्य को भी बखूबी समझ पाएंगे. फिल्म गंगा आरती से शुरू हो कर क़व्वाली पे ख़त्म होती है,भजन और कव्वाली के दरमियान समाज की कड़वी सच्चाई और अफ़वाहों के प्रभाव से प्रभावित तंत्र द्वारा अर्ध सच के सहारे हम वो में बाटने की नाकाम कोशिश और अंत में सच्चाई बयान करते जज के फैसले को सुनने और जानने के लिए यह फिल्म हर भारतीय को एक बार जरुर देखनी चाहिए.