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डॉक्टर ज़ाकिर हुसैनः जिन्होंने कहा था ‘देश में कोई भी बदलाव केवल राजनीति के जरिए नहीं लाया जा सकता, इसके लिये…’

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अली ज़ाकिर

डॉ ज़ाकिर हुसैन और जामिया मिलिया इस्लामिया एक दूसरे के पर्याय है. दूसरे शब्दों में जामिया की कहानी ही डॉ ज़ाकिर हुसैन की कहानी है. उनका उद्देश्य शिक्षा को आम जन तक पहुंचाना था, विशेष रूप से मुस्लिम समुदाय में. इस संस्थान को चलाने में डॉ ज़ाकिर हुसैन अंग्रेज़ सरकार से कोई आर्थिक मदद नहीं लेना चाहते थे. इसलिए उन्होने अंजुमन-ए-तालीम-मिल्ली (National Education Society) का गठन किया. इसका अध्यक्ष डॉ अंसारी और कोशाध्यक्ष सेठ जमना लाल बजाज को बनाया गया. डॉ ज़ाकिर हुसैन ने एक और संस्था हमदर्द-ए-जामिया की स्थापना भी की.

गाँधी की बुनियादी शिक्षा और वर्धा विश्वविद्यालय के वैचारिक विस्तार में भी डॉ ज़ाकिर हुसैन की महत्वपूर्ण भूमिका रही है. शिक्षा के बारे में डॉ ज़ाकिर हुसैन के दर्शन को काशी विध्यापीठ के सम्बोधन से समझा जा सकता है जो उन्होने 14 अगस्त 1935 को दिया था. डॉ ज़ाकिर हुसैन ने कहा –“राष्ट्रीय शिक्षा में राष्ट्रीय धरोहर को संरक्षित करना चाहिए. मनुष्य के लिए याद का जो महत्व है वही महत्व समाज मे शिक्षा का है. जैसे सिर्फ एक याद के चले जाने से मनुष्य का जीवन उद्देश्य विहीन हो जाता है, इसी तरह से किसी देश का जीवन भी नष्ट हो जाता है यदि उसके अतीत को भुला दिया जाए. यदि भारत अपनी पहचान को मानव जाति के हित में उपयोग करना चाहता है तो उसे अपनी सांस्कृतिक पहचान को बचाए रखना होगा.”

इस दर्शन को उन्होने जामिया मिलिया इस्लामिया मे आजमा कर देखा. डॉ ज़ाकिर हुसैन के अनुसार शिक्षा को राष्ट्रीय उद्देश्य का केंद्र होना चाहिए. यही कारण था कि उन्होने जामिया में ‘कार्य आधारित शिक्षा पर ध्यान दिया न कि पुस्तक आधारित शिक्षा पर’ जामिया शुरू से ही भारत कि आवश्यकता आधारित शिक्षा का केंद्र रहा.

डॉक्टर जाकिर हुसैन जामिया मिलिया इस्लामिया के सह-संस्थापक थे और 1928 से कई वर्षों तक उन्होंने इसका वाईस चांसलर रहते हुए सेवा की थी. डॉक्टर हुसैन के नेतृत्व में जामिया भारतीय स्वतंत्रता अभियान से अच्छी तरह जुड़ भी गया था. आजादी के बाद डॉक्टर जाकिर हुसैन भारत के तीसरे राष्ट्रपति बने. 1963 में उन्हें भारत के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया. लेकिन आज सरकार और समाज दोनों ने ही डॉक्टर जाकिर हुसैन के विचारों को भुला दिया. राजनैतिक पार्टियों के नेताओं और कार्यकर्ताओं को उनका नाम तक पता नहीं है. स्कूली पाठ्यक्रमों से भी उनको पूरी तरह से गायब कर दिया गया है. स्वतंत्रता संग्राम के इस बहादुर सिपह सालार को भुला देने का जिम्मेदार कौन है ? ये हम-सब के लिए सोचने वाली बात है.

सदी के महान शिक्षाविद डॉ ज़ाकिर हुसैन ने कहा था कि देश में कोई भी बदलाव केवल राजनीति के जरिए नहीं लाया जा सकता है, इसके लिए शिक्षा का रास्ता ही अपनाना होगा. उनका पूरा जीवन शिक्षा और धर्मनिरपेक्षता के लिए समर्पित रहा. डॉ ज़ाकिर हुसैन को आधुनिक भारत का ऐसा शिक्षाविद माना जाता है जिसने शिक्षा के विकास में देश के विकास के सपने देखे. आठ फरवरी को डॉ. जाकिर हुसैन का जन्मदिवस होता है।