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वरिष्ठ पत्रकार अमरेश मिश्रा का विश्वेषणः करुणा शुक्ला और छत्तिसगढ़ मे भाजपा की हार की छुपी दास्तां!

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युद्ध मे अदम्य साहस और क़ुर्बानी की आव्यशक्ता होती है। 2014 मै ही करुणाजी को कांग्रेस मे लाया था। करुणा शुक्लाजी, जो भाजपा से छत्तिसगढ़ मे विधायक, सांसद और कुशल जन-नेता/संगठक रह चुकी हैं, ने जब कांग्रेस जॉइंन की, तब पार्टी की हालत अच्छी नही थी। NK Patel और विद्या चरण शुक्ल जी के साथ छत्तिसगढ़ का पूरा नेतृत्व ‘नक्सली हमले’, जो लोगों के अनुसार, सत्ता शक्ति द्वारा प्रायोजित था, मे साफ हो चुका था।

2014 मे करुणा शुक्लाजी बिलासपुर से कांग्रेस टिकट पर चुनाव लड़ी। मोदी लहर मे भी 3, 75,000 वोट पाकर दूसरे नम्बर पर रहीं। 2014 मे छत्तिसगढ़ ने भाजपा को 11 मे से 10 सांसद दिये। विपक्ष चारो खाने चित्त था। जब करुणा शुक्ला जी ने नये प्रदेश अध्यक्ष भूपेश बघेल को भाजपा मे अपने सांगठिक अनुभव का सार दिया।जिसके चलते तीन पहलुओं पर काम हुआ:

1. कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण शिविर।

2. रमन सिंह भाजपा सरकार के खिलाफ हर मुद्दे पर सड़क पर उतरना।

3. ब्लाक और बूथ स्तर पर कमेटियां गठित करना।

कांग्रेस लंबे समय से आंदोलन की राजनीती मे नहीं थी। 2003 से लगातार हार से कार्यकर्ता हतोउत्साहित थे। RSS ने अपने आदिवासियों के बीच काम और रमन सिंह ने पैसे और कोरपोरेट्स के ज़ोर का ऐसा हव्वा बना रक्खा था, कि लगता था 50 साल भाजपा राज करेगी। इतिहास मे बड़ी ताक़त का मिथक, उस बड़ी ताक़त की असलियत, काम की शैली जानने वाला ही तोड़ता है। छत्तिसगढ़ मे यह काम करुणा शुक्ला ने किया।

2018 के चुनाव के पहले, रमन सिंह का आलम यह था कि विपक्ष के लोग किसी धरना-प्रदर्शन के पहले ही उठा लिये जाते थे। कांग्रेस आफिस मे घुस कर पुलिस ने जम कर लाठियां बरसाई। अटलजी के अस्थिकलश के मामले मे भाजपा ने खुल कर बदतमीज़ी की। अटलजी के अस्थिकलश भाजपा आफिस मे लावारिस पड़े थे। जब करुणाजी के नेतृत्व मे भाजपा आफिस के सामने धरना दिया गया। पूरे देश मे संदेश गया कि रमन सिंह ने अटलजी की भतीजी और उनके अस्थि कलश के साथ बदसलूकी की।

हर बार राजनंदगांव से रमन सिंह अपने विपक्ष को खरीद लेता था। 2018 चुनाव मे भी रमन सिंह, भाजपा और देश के कई pollsters, भाजपा की जीत के प्रति आश्वस्त थे। रमन सिंह जानता था की पैसे के बल पर राजनंदगांव से खड़े विपक्षी प्रत्याशी को वो खरीद लेगा। और पूरे छत्तिसगढ़ ने चुनाव प्रचार के लिये free रहेगा। अजीत जोगी भी रमन सिंह के खिलाफ चुनाव लड़ने की बात करके पीछे हट गए।

करुणाजी अपने कद के हिसाब से कोई आसान सीट चुन सकती थीं। या लोक सभा/राज्य सभा के लिये इंतज़ार कर सकती थी। पर उन्होने छत्तिसगढ़ मे रमन सिंह सरकार को हटाने की ठान ली थी। वो जानती थी, कि राजनंदगांव से जीतने के लिये रमन सिंह 25 करोड़ तक खर्च देगा। और कांग्रेस के पास पैसे की बेहद कमी थी। पर अगर राजनंदगांव मे रमन सिंह को कड़ी टक्कर मिल गयी, तो पूरे प्रदेश मे वो प्रचार नही कर पायेगा। और कांग्रेस को कम से कम 20 सीटों का फायदा होगा।

अटलजी की विरासत कांग्रेस के साथ खड़ी है, यह मेसेज जायेगा, सो अलग। मैं राजनंदगांव चुनाव प्रचार मे गया था। लोग कह रहे थे कि ‘पहली बार तो यहां चुनाव हो रहा है’–अभी तक तो एकतरफा मुक़ाबला होता था। यह साफ हो गया था कि करुणाजी के लड़ने से, भाजपा का बड़ा हिस्सा, पूरे प्रदेश मे कांग्रेस को वोट दे रहा है।

11 दिसम्बर मतगणना के समय कई राउंडस मे करुणाजी ने रमन सिंह को पछाड़ा। जिसकी वजह से रमन सिंह अपनी सीट बचाने मे लग गया। और बाकी सीटों पर गड़बड़ी नही कर पाया। रमन सिंह हर बार 35000 से उपर वोटों से जीतता था। इस बार मात्र 14000 वोटों से, बड़े जुगाड़ से, जीता। पर पूरे प्रदेश मे भाजपा 18 सीटों पर सिमट गयी। मध्य-प्रदेश और राजस्थान मे कांग्रेस के दिग्गज लगे थे। वहां कांग्रेस जीती। मगर छत्तिसगढ़ ही मे कांग्रेस दो-तिहाई बहुमत से जीती।

कांग्रेसअध्यक्ष राहुल गांधी ने जो करुणाजी को सम्मान दिया वो अतुलनीय है। करुणाजी केत्याग के फलस्वरूप, उनको छत्तिसगढ़ औरकेंद्र मे बड़ी भूमिका मिल रही है। 2019 मे पूरे देश को यह संदेश देना है कि अटलजीकी विरासत पूरी तरह करुणाजी के माध्यम से कांग्रेस के साथ है।

अमरेश मिश्रा (वरिष्ठ पत्रकार)

तीनो राज्यों मे सवर्ण भाजपा की हार का बहुत बड़ा कारण हैं। लोगों को नही पता कि छत्तिसगढ़, जहां 40% दलित-आदिवासी आबादी है, वहां पर समाज के निचले तबके, सवर्णो के बनाये माहौल पर चलते हैं। 29 ST सीटों मे कांग्रेस को 27 मिली। SC सीटों पर भी भाजपा बुरी तरह पिछड़ी। छत्तिसगढ़ मे भी यह संदेश देना है कि कांग्रेस सब के साथ है और सवर्णो का योगदान बहुमूल्य है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, एंव मंगलपांडेय सेना के संयोजक हैं)