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अलीगढ़ ‘फर्जीमुठभेड़’ पर अमरेश का सवाल, ‘संविधान की दुहाई देने वालों के मुखौटे उतर गए हैं।’

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आज हम अलीगढ़ में हुई घटना पर फिर चर्चा करेंगें जिसमें मॉब लिंचिंग की कोशिश की गई। मेरे सहित अन्य कई साथियों का जीवन खतरे में डाल दिया गया था। संविधान की दुहाई देने वालों के मुखौटे उतर गए हैं। यूपी में भाजपा सरकार ने संविधान की धज्जियां उड़ाकर रख दीं हैं। अब लोग अपनी पूरी ताकत के साथ राज्य से लड़ेंगे। आपको 1857 याद होगा इतिहास कभी भी एक सीधी लकीर पर नहीं चलता। कभी एक कदम आगे तो कभी दो कदम पीछे।

बीसवीं सदी में आज़ादी के बाद विकसित संविधानवाद की हत्या की जा चुकी है। हम वापिस 19वीं सदी में धकेल दिए गए हैं। बीसवीं सदी का आज़ादी आन्दोलन हमेशा प्रासंगिक रहेगा। पर चूंकि हम 19वीं सदी और उसकी कैटागिरी मे धकेल दिये गये हैं, 1857 की जंग-ए-आज़ादी आज ज़्यादा प्रासंगिक है। फासीवादी ताकतें आवाम के ज़ेहन से संविधानवाद को निकाल फेंकने में सफल हो गई हैं।

मध्य्वादी और उदारवादी अपनी इंग्लिश मीडियम की अभिजात्यता का चोला उतारना नहीं चाहते और इसी कारण वे कृषक वर्ग के साथ संवाद स्थापित कर पाने में बुरी तरह असफल हुए हैं। जनता सोचती हैं कि संविधानवाद एक अभिजात्य सोच है। जनता को अपनी बात समझानी होगी। लेकिन इसके लिए उपदेशात्मक लहजे को त्यागना होगा। आज लोग यदि कांग्रेस को वोट देंगें तो इसलिए नहीं सिर्फ कि वे नेहरू या अम्बेडकर का सम्मान करते हैं या वे संविधान की रक्षा करना चाहते हैं।

वे भाजपा के विरोध में कांग्रेस को इसलिए वोट देंगें कि राहुल गांधी एक सनातनी शिव भक्त होने का काउन्टर-नैरेटिव सामने रखने की कोशिश कर रहे हैं। एक ऐसा शिवभक्त जो सनातन-विरोधी आरएसएस की मुखर आलोचना करता है। इसमे वे कहां तक सफल होते हैं, ये एक अलग मुद्दा है।

‘हम मानवाधिकारों का सम्मान करते हैं’ इस तर्क पर अगर हम सोचते हैं कि संवैधानिक अधिकार सुरक्षित हो जाएंगें, ऐसा कतई नहीं होगा। यह तभी होगा जब आप और मेरे जैसे लोग जनता के बीच जायेंगे और फासीवाद के विरुद्ध उनकी सहज मगर प्रगतिशील निष्ठाओं का आह्वान करेंगे। १८५७ के जज़्बे को पुनर्जीवित करेंगे।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, इतिहासकार एंव किसान क्रान्तिदल के अध्यक्ष और मंगल पांडेय सेना के संयोजक हैं)