Home विशेष रिपोर्ट अमरेश मिश्रा का लेखः सावरकर द्वारा गढ़ा गया ‘हिंदुत्व’ विदेशी ताकतों का...

अमरेश मिश्रा का लेखः सावरकर द्वारा गढ़ा गया ‘हिंदुत्व’ विदेशी ताकतों का स्लीपर सेल है!

SHARE

11 दिसम्बर को भाजपा की चौंकाने वाली शिकस्त मे स्थानीय मुद्दों के अलावा, चार ऐसे कारण हैं जो मोदी की हार के लिए जिम्मेदार माने जा रहे हैं। इनमें पहला कारण गाँवों में खेती-किसानी का संकट, दूसरा कारण  शहरी युवाओं में बेरोज़गारी को लेकर बेचैनी, तीसरी वजह  राहुल गांधी का राजनीतिक पुनरुत्थान और चौथा कारण  कांग्रेस की ‘धार्मिकता या धर्म में आस्था’। मगर इस वक़्त मैं इन चारों में से पहले तीन कारणों के विश्लेषण में नहीं जाऊँगा।  तो आइए, हम चौथे कारण का विश्लेषण करें, जिसे न केवल संघी टीवी न्यूज़ चैनलों ने, बल्कि, कुछ साम्प्रदायिकता-विरोधी नागरिकों ने भी ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ की संज्ञा दी है। सबसे पहले मैं यह स्पष्ट कर दूँ कि ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ नाम की कोई चिड़िया अस्तित्व में है ही नहीं। यह ठीक वैसे ही है जैसे कि हम एक टेबल या एयर कंडीशनर को सॉफ्ट टेबल या सॉफ्ट एयर कंडीशनर कहने लगें! इसका आधार ही बेहूदा है। 

हिंदुत्व असल में है क्या?

आखिर यह हिंदुत्व है क्या? क्या यह हिन्दुओं का धर्म है? उनकी जीवन शैली है? नहीं! यह दोनों में एक भी नहीं है। यह वीर सावरकर द्वारा गढ़ा गया अपेक्षाकृत आधुनिक राजनीतिक शब्द है, जिसका आधार, बीसवीं सदी की योरिपियन  फासीवादी राजनीति मे निहित है। 1996 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में हिंदुत्व को एक जीवन शैली बताया था जो एक भ्रामक व्याख्या है। प्राचीन धर्म शास्त्रों में कहीं भी ‘हिंदुत्व’ शब्द का उल्लेख नहीं हैं।  हिन्दू शब्द भी भविष्य-पुराण ही मे मिलता है। आज़ादी के बाद के महानतम हिन्दू विचारक स्वामी करपात्री जी ने ‘हिंदू धर्म और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ’ नाम की अपनी पुस्तक मे गोलवलकर के हिंदुत्व के सिद्धांत को सिरे से खारिज़ किया है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि ‘सनातन धर्म’, जिसको हिंदू धर्म भी कहा जाता है, ही हिन्दुओं का धर्म है।  इसके अतिरिक्त कोई और शब्दावली जैसे ‘हिंदूवाद’ (Hinduism) या हिन्दुत्व का प्रयोग नहीं किया जा सकता।

हिन्दूवाद एवं हिंदुत्व भ्रामक क्यों है?

हिन्दू एक सर्वमान्य भौगोलिक शब्द/ परिभाषा है जिसे एक धर्म विशेष के अनुयायियों के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकता है और वह धर्म, सनातन धर्म या हिन्दू धर्म हो सकता है। किन्तु यह हिन्दूवाद (Hinduism) कदापि नहीं हो सकता। हिन्दुओं के धर्म को हिंदुत्व या हिन्दूवाद कहना उतना ही भ्रामक है जितना कि मुस्लिमों के धर्म को मुस्लिमत्व या मुस्लिमवाद कहना! मुस्लिमों का धर्म इस्लाम है और हिन्दुओं का सनातन धर्म। यहाँ तक की ईसाईयों का धर्म भी ईसाई धर्म कहलाता है, न कि ईसाईत्व या ईसाईवाद! तो फिर सोचने वाली बात है, कि जब हिन्दुओं का धर्म हिंदुत्व या हिन्दूवाद कहलाता ही नहीं है, तो राहुल गांधी का मंदिरों  के दर्शन करना ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ कैसे हुआ?

राहुल गांधी उस तथाकथित हिंदुत्व के अनुयायी नहीं हैं जो एक राजनीतिक सिद्धांत है। वह जिन मंदिरों में दर्शन के लिए जाते हैं वे सनातन धर्म के मंदिर हैं, हिंदुत्व के नहीं! राहुल गांधी सनातन धर्म के सिद्धांतों के अनुयायी हैं। आप उनसे सहमत या असहमत हो सकते हैं, मगर आपको उनकी आस्था को ‘सनातनी’ कहना होगा। उसे हिंदुत्व या साफ्ट हिंदुत्व की संज्ञा देना मिथ्या प्रचार है। लिबरल्स सचेत हो जाएं राहुल गांधी द्वारा छद्म हिंदुत्व का पर्दाफ़ाश किए जाने से बिलबिलाए ‘लार्ड’ मेघनाद देसाई सरीखे खुजैले मोदीभक्तों ने भी राहुल गांधी की आस्था को ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ की संज्ञा दी है। क्या अब  लिबरल्स  सांप्रदायिक तत्वों की हाँ में हाँ मिलाने लगे हैं?

हिंदुत्व, हिन्दूवाद और शशि थरूर

‘द प्रिंट’ में छपे एक लेख में शशि थरूर ने हिंदुत्व को एक राजनीतिक सिद्धांत/मत बताते हुए इसे हिन्दूवाद (Hinduism) से स्पष्ट रूप से भिन्न रेखांकित किया है। थरूर की मंशा अच्छी होने के बावजूद, वह हिन्दुओं का धर्म सनातन धर्म बताने से कतरा रहे हैं और यही वह सनातन धर्म हैं जिसके अनुयायी राहुल गांधी हैं।

साम्राज्यवाद, हिन्दूवाद और हिंदुत्व

असल में थरूर सनातन धर्म के विषय में 19वीं सदी की ब्रिटिश-औपनिवेशिक पाश्चात्य व्याख्या का अनुसरण कर रहे हैं।  साम्राज्यवादियों ने जानबूझकर सनातन धर्म को हिंदूवाद (HInduism) की संज्ञा दी, ताकि उनके उपनिवेश की गुलाम जनता किसी एक भावनात्मक-आध्यात्मिक-सार्वभौमिक डोर में बंधकर अपने आकाओं के धर्म के खिलाफ लामबंद न हो जाए।  अन्ग्रेज़ों की मंशा थी सनातन धर्म को हिन्दूवाद या हिन्दुइज़्म का चोला पहना दिया जाए। इससे धर्म, दर्शन (philosophy) मे तब्दील हो जायेगा। और इसकी जब जो चाहे और जैसे चाहे , व्याख्या की जा सके।

‘हतो वा प्राप्यसि स्वर्गं, जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्’ अर्थात ‘युद्ध करते हुए मारे गए तो स्वर्ग प्राप्त करोगे और यदि जीवित रहे तो धरा को भोगोगे’–भागवद्गीता का क्रांतीकारी श्लोक है। अन्ग्रेज़ों के हिंदूवाद (Hinduism) मे यह श्लोक महज एक दर्शन (Philosophy) बन कर रह गया। इस श्लोक की धार्मिक, भावनात्मक, कर्म की ओर अग्रसर, अन्याय और गुलामी के खिलाफ धर्मयुद्ध करने के पहलू को अन्ग्रेज़ों ने नष्ट करना चाहा। 1857 से 1947 तक 1857 से लेकर 1947 तक भारत की आजादी की लड़ाई हिन्दूवाद (Hinduism) के कब्ज़े से सनातन धर्म को आज़ाद कराने की लड़ाई भी थी।

यह महज़ एक संयोग नहीं है ऐन जिस बिन्दु पर हिन्दूवाद समाप्त हुआ था, ठीक उसी बिंदु से हिंदुत्व ने जन्म लिया। इससे यह साबित होता है कि हिंदुत्व नाम की यह साज़िश साम्राज्यवादी थी। 1857 के बाद से ब्रिटिश शासक सनातन धर्म और इस्लाम को लेकर अत्यधिक चौकन्ने हो गए थे क्योंकि इन्हीं  दोनों ताकतों ने बहादुर शाह ज़फर के नेतृत्त्व में एकजुट होकर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के राज का खात्मा करने की लड़ाई लड़ी थी। ब्रिटिश शासक इस्लाम की मूल अवधारणा के साथ ज्यादा छेड़छाड़ नहीं कर पाए।  परन्तु वे सनातन धर्म को हिन्दूवाद बनाने पर तुले रहे।1857 के बाद अंग्रेजों की सनातन-विरोधी ‘हिन्दूवाद की चाल’ को तब भारी झटका लगा जब लोकमान्य तिलक ने सनातन धर्म को हिन्दुओं का धर्म घोषित किया और गीता की व्याख्या एक दार्शनिक मत के तौर पर नहीं, अपितु राजनीतिक जागरण के लिए की। महात्मा गांधी ने भी सनातन धर्म को हिन्दूवाद के चंगुल से छुड़ाने के प्रयास किए।

बीसवीं सदी में जब अंग्रेजों ने सनातन धर्म के प्रादुर्भाव और इसका 1857 के हिन्दुस्तानी इस्लाम, जिसका प्रतिनिधित्व ‘जमायत उलेमा हिन्द’ करती थी, के साथ मेलजोल देखा, तो उन्होंने हिंदुत्व और मुस्लिम लीग को प्रोत्साहन देना शुरू कर दिया। ये दोनों ही सनातन-विरोधी विचारधाराएं थीं। नेहरू पश्चिमी शैली के नास्तिक नहीं थे। कांग्रेस कभी भी पश्चिमी शैली पर आधारित नास्तिक राजनितिक दल नहीं था। बुद्धिजीवियों के नायक नेहरु स्वयं नास्तिक नहीं थे। वह आधुनिकतावादी थे।  मूलत: वे एक गर्वित ब्राह्मण थे जो यह भली-भांति जानते थे कैसे अपने प्राचीन गौरव, आध्यात्मिक विरासत, परिघटनाओं और शिक्षाओं को खूबसूरती के साथ एक सूत्र में पिरोकर प्रस्तुत किया जाए।  गांधी के समय से ही कांग्रेस की विचारधारा सनातन धर्म पर आधारित विचारधारा थी। मुझे यह कहने में भी गुरेज नहीं है कि कांग्रेस हमेशा से ही सनातनी पार्टी थी और यही कारण था कि वह  मुस्लिम लीग और आरएसएस दोनों को परास्त कर पाई।

2004 से 2014 तक

2004 से 2014 के बीच फर्ज़ी सेक्युलरों की की कुछ लॉबियों, मुस्लिम लीगियों, एनजीओ और फ़र्जी आंबेडकरवादियों ने यह मिथ्या प्रचार किया कि कांग्रेस में उनका वर्चस्व है। इसी वजह से  कांग्रेस पार्टी को मोदी ने अपने उग्र साम्प्रदायिक हिंदुत्व से आसानी से पटखनी दे दी। सनातनी आख्यान के अभाव में आहत-विक्षत भारतीयों को मजबूरतन हिंदुत्व का दामन थामना पड़ा।

सनातन धर्म और साम्राज्यवाद

लेफ्ट-लिबरल बुद्धिजीवी एक बुनियादी तथ्य नहीं समझ पाए कि भारत में 1910 के बाद से सनातन धर्म और इसके मुस्लिम साथियों का संघर्ष अंग्रेजों द्वारा पोषित हिंदुत्ववादियों और मुस्लिम अलगाववादियों से चलता रहा है। कांग्रेस की सनातनी का सोच का मुकाबला करने के लिए अंग्रेजों ने पेरियार और आंबेडकर के ‘सामाजिक सुधार’ आन्दोलनों को शुरू करवाया। मगर कांग्रेस ने पेरियार और आम्बेडकर को अंग्रेजों से वापिस छीनकर अपने रंग में ढाल लिया। 1840s में अंग्रेजों द्वारा अपमानित हुए सिक्खों ने अपने पूर्व उत्पीड़कों के साथ बरसों की मैत्री के बावजूद उनके आधिपत्य को स्वीकार नहीं किया। सिक्खों ने तरह-तरह के प्रयोग किए। मगर जलियांवाला जनसंहार और 1920s में अकाली आन्दोलन के बाद उन्होंने कांग्रेस के सनातनी मूल के साथ एक संतुलन स्थापित कर लिया। भगत सिंह नास्तिक थे मगर पाश्चात्य अर्थों में नहीं। उनकी नास्तिकता सांख्य और और मीमांसा सरीखे सनातनी नास्तिकवाद के ज्यादा करीब थी (स्मरण रहे कि भगत सिंह के चीफ चंद्रशेखर आजाद एक जनेऊधारी ब्राह्मण ही थे)। सांख्य और मीमांसा दोनों ही सनातन दर्शन के नास्तिक अंग हैं।

अंग्रेजों ने ईसाइयों को इस भ्रम में रक्खा कि वे ईसाई-समर्थक निज़ाम के तहत काम कर रहे हैं। लेकिन बहुसंख्यक एंग्लो –इंडियंस और विभिन्न भारतीय ईसाई समूह, समाज के श्रमजीवी वर्ग से सम्बन्ध रखते थे।  वे अनायास ही राष्ट्रीय सनातनी आन्दोलन के साथ हो लिए। पारसी एक धनवान समुदाय थे। लेकिन बिरला और बजाज जैसे सनातनी पूंजीपति घरानों का अनुसरण करते हुए कांग्रेस का समर्थन करते रहे। जैन, जो एक व्यापारी कौम है, भी कोंग्रेस के सनातनी बनिया नेताओं के पीछे चलते रहे।

वामपंथी भी सनातनी सोच की तरफ घूम गए। उन्हें समझ आ गया कि भारतीय सर्वहारा सनातनी है। असल में सुभाष चन्द्र बोस भी कांग्रेस की सनातनी सोच का ही एक आक्रामक आयाम थे (याद करें INA के दौर में उन्होंने 1857 की क्रान्ति का स्मरण किया था)।   सरदार पटेल जैसे कांग्रेस के नेता यह भली-भांति जानते थे कि आरएसएस का मूल चरित्र सनातन-विरोधी, ब्रिटिश- समर्थक और राष्ट्र-विरोधी है। इसीलिए गांधी जी की हत्या के बाद पटेल ने आरएसएस से कहा था कि वे या तो अपने संगठन को समाप्त कर दें या फिर केवल सांस्कृतिक गतिविधियों तक सीमित रहें।

ब्रिटिश-विरोधी, राष्ट्रवादी सनातनी पटेल ने यह अच्छी तरह से समझ लिया था कि हिंदुत्व कुछ और नहीं बल्कि देश के साथ गद्दारी की एक कुटिल ब्रिटिश चाल है।  अंग्रेजों के जाने के बाद हिंदुत्व एक तरह से अनाथ हो गया था। नेहरु एक आधुनिक सनातनी होने के साथ साम्राज्यवाद विरोधी भी थे। वह जानते थे कि हिंदुत्व और आरएसएस सनातनी राष्ट्रीय परंपरा का अंग कदापि नहीं हो सकते। नेहरू ने एक ऐसी साम्राज्यवाद-विरोधी राष्ट्रवादी अर्थव्यवस्था का सूत्रपात किया जिसने विदेशी ताकतों और उनके समर्थकों को हाशिए पर रक्खा। इंदिरा गांधी भी नेहरू के रास्ते पर चलीं। 1991 में राजीव गांधी की हत्या के बाद ही यह संभव हो पाया कि यूएस और इजरायल नव-साम्राज्यवादियों का चोला पहनकर भारत में घुस गए और आज  तक ब्रिटिश साम्राज्यवाद की नैया खे रहे हैं।

हिंदुत्व विदेशी ताकतों का स्लीपर सेल है!

1990 में यूएस और इजरायल ने पाकिस्तान की मदद से जो सबसे पहला काम किया वह था अपने हिन्दुत्ववादी स्लीपर सेल्स को दोबारा जगाना! एक सोची-समझी साज़िश के तहत रामजन्मभूमि आन्दोलन को हड़पकर उसे एक मुस्लिम विरोधी आन्दोलन बना दिया गया। शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जैसे सनातनियों का मत है कि रामजन्मभूमि स्थल पर कभी कोई मस्जिद थी ही नहीं। न ही मस्जिद का निर्माण करने के लिए बाबर कभी अयोध्या आया था। इसलिए 6 दिसंबर के दिन कारसेवकों ने जिस ढाँचे को ढहाया वह अस्थाई राम मंदिर था।

सनातनियों ने कैसे हिंदुत्व को पटरी से उतारा

जब तक सनातन धर्म को राज नीति के ताने-बाने में गूँथने की पहल नहीं हुई थी, तब तक हिंदुत्व बड़े आराम से पोलिटिक्स और धर्म का मुखौटा लगाए मंच पर जमा रहा। हिंदुत्व स्वयं पर धार्मिक स्वीकृति की मुहर लगवाना चाहता था मगर आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चारों धामों के शंकराचार्यों ने कभी भी आरएसएस को अपना आशीर्वाद नहीं दिया।

दूसरे, सनातन धर्म में ब्राह्मणों की भूमिका अगुआ की रही है। लेकिन हिंदुत्व मुसलमानों के खिलाफ हिन्दुओं की महा एकता की परिकल्पना करता है–जिसमें ब्राहमणों को कोई विशिष्ट दर्जा प्राप्त नहीं है। सनातन धर्म के पुरोहितों के रूप मे, ब्राहमणो ने अधर्म की नाश की बात की। पर किसी एक विशेष धर्म को अपना दुश्मन कभी नही बनाया। हमेशा विश्व के कल्याण की बात की।

आरएसएस ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि वह राहुल गांधी, जिसे उन्होंने  ‘विदेशी’ कह दिया था, और दिग्विजय सिंह, जिनको उन्होने ‘मुसलमानों का हिमायती’ घोषित कर रक्खा था, आरएसएस की बिछाई बिसात को उलटकर रख देंगे। राहुल गांधी मंदिरों के दर्शन करने गए; पूरी निष्ठा के साथ खुद को जनेउधारी ब्राह्मण और शिव भक्त घोषित किया; कैलाश मानसरोवर की यात्रा की और फिर अपने गोत्र का खुलासा भी किया। दिग्विजय सिंह ने नर्मदा की परिक्रमा यात्रा कर साधू-संतों को कांग्रेस के साथ लाकर खड़ा कर दिया। 

शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद ने मध्य प्रदेश चुनावों से ऐन पहले वीएचपी विरोधी, मोदी विरोधी, आरएसएस विरोधी धर्म-संसद का काशी में आयोजन किया। वीएचपी और आरएसएस द्वारा अयोध्या में आयोजित धर्म सभा की  इससे बेहतर काट नहीं हो सकती थी। मोदी के गढ़ काशी (वाराणासी) में बैठकर साधुओं ने खुल्लमखुल्ला ‘हिन्दू-ह्रदय सम्राट मोदी’ की मंदिरों को ढहाने की कवायद की जमकर भर्त्सना की। मोदी SC-ST एक्ट पर विधेयक लाकर फंस चुके थे। रही-सही कसर कांग्रेस ने हिंदुत्व की कमज़ोर नस पकड़कर पूरी कर दी।  हिन्दुत्व को हमेशा दो बातों से खतरा था: सनातन धर्म का राजनीती मे हलका सा प्रयोग; और हिंदुत्व मे ब्राहमण नेतृत्व न होना।

मोहन भगवत और मोदी खुद ही अपने आप को ब्राहमणो से ऊपर, ‘देवता’ समझने लगे थे! बस CP Joshi ने एक सवाल कर दिया–कि हिंदुत्व सनातन धर्म के देवी-देवताओं के नाम पर राजनीती करता है। फिर नेतृत्व मे ब्राहमण क्यूं नही हैं? और मोदी और उमा भारती की जात क्या है? इसी बात मे भाजपा-RSS फंस गयी। कभी किसी ने RSS के इस अंदरूनी विरोधाभास को पकड़ा ही नही था! नक़्ली लोग सनातन धर्म के नाम पर सत्ता का भोग कर रहे थे। भारत को तोड़ रहे थे। नफरत फैला रहे थे।  सनातनियों के हलके से वार ने उन्हे चित्त कर दिया!

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एंव इतिहासकार होने के साथ साथ, मंगल पांडेय सेना के संयोजक हैं, इस लेख का अंग्रेजी से अनुवाद साध्वी मीनू जैन द्वारा किया गया है)