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खुलासाः अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपनी सरकारी बैठकों में उड़ाते हैं मोदी की खिल्ली

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गार्डिनर हैरिस

भारत और अमेरिका के बीच रिश्तों में हमेशा एक जलन काम करती रही है. लेकिन इसमें कुछ दिल्ली के लिए बेहद हैरान कर देने वाला रहा या फिर उसका स्वाद कड़वा कर देने वाला था. उसी में एक राष्ट्रपति ट्रंप के पीएम नरेंद्र मोदी के अग्रेंजी बोलने के लहजे का मजाक उड़ाना भी शामिल है. ट्रंप के मोदी की नकल करने का एक वीडियो नई दिल्ली में वायरल है. इस तरह की खबरें हैं कि ट्रंप अक्सर अपनी आंतरिक बहसों में मोदी की मिमिकरी करते हैं.

“दि हिंदू” की विदेशी मामलों की संपादक सुहासिनी हैदर का कहना है कि “यहां एक आम समझ है कि मोदी इस बात को लेकर सुनिश्चित नहीं हैं कि वो ट्रंप के साथ व्यवसाय कर सकते हैं.” “भारत अब इस नतीजे पर पहुंच रहा है कि ट्रंप भारत के साथ उस तरह से व्यवहार नहीं करेंगे जैसा उदारतापूर्ण व्यवहार पूर्व राष्ट्रपतियों का था.”

यही कूटनीतिक सिरदर्द है जिसका विदेश मंत्री माइक पोंपियो रक्षामंत्री जिम मैट्टिस के साथ बुधवार को नई दिल्ली की अपनी यात्रा के दौरान सामना करेंगे. विदेश मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों के मुताबिक राष्ट्रपति की मूर्खतापूर्ण हरकतों से सावधानी पूर्वक बचने के साथ ही पोंपियों के सामने रिश्तों को लेकर चुनौतियों की एक लंबी सूची होगी जिसे उन्हें न केवल संरक्षित करना है बल्कि उन्हें आगे भी ले जाना है.

दूसरी चुनौतियों में व्यापार का बढ़ता तनाव है. अमेरिकियों का ये दबाव है कि भारत ईरान से भारी मात्रा में खरीदे जाने वाले तेल पर अचानक रोक लगा दे. इसके साथ ही वाशिंगटन रूस से सैन्य साजो-सामान खरीदना जारी रखने पर भारत पर प्रतिबंध की धमकी दे रहा है. गौरतलब है कि भारत अब तक रूस से बहुत ज्यादा हथियार खरीदता रहा है.

2014 में सत्ता में आने के बाद अमेरिका के साथ रिश्तों में सुधार मोदी की प्राथमिकताओं में एक था. लेकिन नई दिल्ली वाशिंगटन को लेकर अचानक अनिश्चय की स्थिति में चली गयी. मोदी हाल के सप्ताहों में मास्को और बीजिंग के साथ रिश्तों को मजबूत करने में जुट गए.

दशकों से अमेरिका ये उम्मीद कर रहा था कि आर्थिक और सैन्य ताकत बनकर भारत उभरते चीन का मुकाबला करेगा. ट्रंप के पहले विदेश मंत्री रेक्स डब्ल्यू टिलरसन ने भारत तक अपनी पहुंच को अपने कार्यकाल की प्रमुख पहलों में से एक बताया था. अक्तूबर में अपने एक लच्छेदार भाषण में उन्होंने बताया था कि दोनों देश क्यों प्राकृतिक साझीदार हो सकते हैं. उन्होंने इसके हजारों कारण गिनाए थे.

मेटिस के शासन के तहत पेंटागन भी साझीदारी के लिए बराबर प्रतिबद्ध है. यहां तक कि इसने पैसिफिक इलाके पर निगरानी रखने वाले अमेरिकी लड़ाकू हवाई अड्डे का भारत को लुभाने के मकसद से नया नाम इंडो-पैसिफिक कमांड रख डाला. जिससे अमेरिका की भारत और सहयोगी ताकतों के साथ साझेदारी और मजबूत हो सके.

भारत की बढ़त को अमेरिका के लिए एक स्वाभाविक जीत के तौर पर देखा जाता था. इसीलिए पहले के राष्ट्रपति नई दिल्ली के व्यापारिक संरक्षण को ज्यादातर नजरंदाज कर देते थे. और अगर भारत सरकार रूस से कुछ सैन्य हथियार चाहती थी वो भी वाशिंगटन के लिए स्वीकार्यता के तौर पर देखा जाता था. जब तक कि इससे भारत के मजबूत होने की संभावना थी.

लेकिन ट्रंप के शासन में किसी को भी व्यापार के मामले में छूट नहीं मिल रही है. कांग्रेस द्वारा रूस को दंडित करने के प्रयास का मतलब है कि भारत द्वारा रूस से आधुनिक हवाई रक्षा प्रणाली की खरीद- ठीक उसी को टर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैय्यिप एरडोगन भी खरीदने पर विचार कर रहे हैं- रिश्तों को गंभीर रूप से चोट पहुंचा सकती है.

किन्हीं रूपों में मोदी और ट्रंप एक दूसरे के लिए बने हुए हैं. दोनों विचारधारात्मक तौर पर मध्य से लेकर दक्षिण तक के राष्ट्रवादी हैं जिन्हें अपने-अपने देशों में कुछ अल्पसंख्यकों द्वारा असहिष्णु और दुर्जनों के नेता के तौर पर देखा जाता है.

लेकन नवंबर में हुई मोदी और ट्रंप के बीच शिखर बैठक व्यापार के मुद्दे और खासकर हैरली-डैविडसन मोटरसाइकिल पर भारत की चुंगी को लेकर बहुत निराशाजनक रही. ट्रंप द्वारा हाल के महीनों में ईरान और टर्की पर लगाए गये प्रतिबंध का भारत पर भी प्रभाव पड़ा है जो डॉलर के मुकाबले उसके रुपये की गिरावट के तौर पर देखा जा रहा है.

भारत में आब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के प्रतिष्ठित फेलो मोहन गुरुस्वामी ने कहा कि “अमेरिकी अचानक हमें बता रहे हैं कि हम मिसाइल और तेल नहीं खरीद सकते और कोई नहीं जानता है कि इसके बारे में क्या कहा जाए.” विदेश विभाग में भारत से डील करने वाला सबसे महत्वपूर्ण पद खाली पड़ा हुआ है ये बात अनिश्चितता को और बढ़ा देती है. और इस सप्ताह की बैठकों को दो बार टाला गया. बहुत सारे भारतीयों का मानना है कि हाल की बैठक ट्रंप के दबाव में रद्द की गयी थी.

जार्ज डब्ल्यू बुश के एशियाई सलाहकार रहे माइकेल ग्रीन ने कहा कि “ह्वाइट हाउस का हर देश के साथ रवैया ऐसा है कि हम आपको अपने द्वारा अचानक चयनित किए गए मुद्दों की गुफा में ले जाएंगे और वो भी राष्ट्रपति के झक्कीपने की प्राथमिकता पर आधारित होगा.” “और उसमें आप को हारते हुए दिखना है. वहां कोई जीत जैसी स्थिति नहीं होगी.” फिर भी रिश्तों में सुधार की अच्छी संभावना है.

वालमार्ट और अमेजन दोनों भारत में अरबों रुपये का निवेश कर रहे हैं. भारत की अमेरिका के साथ रक्षा औजारों की खरीद अगले साल तक 18 अरब डालर तक पहुंच जाएगी. दोनों देशों के बीच 2017 तक कुल 126 अरब डालर का व्यापार हुआ है. और अमेरिका में भारतीय छात्रों की संख्या बढ़कर 186000 हो गयी है जो लगातार चार सालों में दोहरी संख्या का विकास दर है.

जैसा कि चीन भारत के साथ अपने गैर चिन्हित सरहद पर ज्यादा हमलावर है और इसके साथ ही उसका श्रीलंका, नेपाल औऱ मालद्वीव- सभी परंपरागत भारतीय सैटेलाइट- में निवेश भी बढ़ रहा है. ऐसे में नई दिल्ली पर ये दबाव बढ़ता जा रहा है कि वो पूरी ताकत के साथ बीजिंग का मुकाबला करे.

यहां तक कि भारत का परंपरागत प्रतिद्वंदी पाकिस्तान चीनी छाया की जगह और ज्यादा स्पष्ट तौर पर दिख रहा है. एक समय में भारत के शीर्ष राजनयिकों में से एक ललित मान सिंह का कहना है कि “चीन को लेकर सरकार के भीतर और बाहर सोच में एकाएक क्रांतिकारी बदलाव आ गया है. उसे हमारे लिए बड़े खतरे के तौर पर देखा जा रहा है.” “और अगर आप चीन को खतरे के तौर पर देखते हैं तब आप आस-पास देखते हैं कि चीन से कौन रक्षा कर सकता है. और ये अमेरिका है.”

भारतीयों का कहना है कि लेकिन मोदी सरकार के शीर्ष पर बैठे लोगों में कोई भी इस बात को लेकर निश्चित नहीं है कि ट्रंप से कैसे डील किया जाए. जिनके मूड और मांगों की भविष्यवाणी अमेरिकी राजनयिक भी नहीं कर सकते हैं.

पोंपियो और मैट्टिस को ट्रंप की चिंताओं को बगैर खारिज किए हुए या फिर इस बात का वादा करना होगा कि वो कोई नई बाधा नहीं खड़ी करेंगे. भारतीयों को उन्हें जरूर इस बात के लिए सुनिश्चित करना होगा. बुश के शीर्ष राजनयिक रहे अशले जे टेलिस का कहना है कि “ह्वाइट हाउस का इस तरह का अस्थिर व्यवहार हर शख्स को इस स्थिति में लाकर खड़ा कर देता है कि रिश्तों से अधिकतम लाभ लेने की कोशिश की जगह वो खतरे को कम करने में जुट जाते हैं.” “हर कोई इससे निपटने के लिए संघर्ष कर रहा है. और भारत कोई अपवाद नहीं है.”

पोंपियो को पाकिस्तान के नये पीएम इमरान खान से मिलने के लिए पाकिस्तान में भी कुछ घंटे रुकना है. अफगानिस्तान में युद्ध के मसले पर दोनों देशों के बीच रिश्ते इतनी परीक्षा के दौर से गुजर चुके हैं कि दोनों पक्ष अब अपने-अपने राजनयिकों की गतिविधियों पर भी लगाम लगाने लगे हैं. इसी कड़ी में अमेरिकी सेना ने पाकिस्तान को दी जाने वाली 300 मिलियन की सहायता पर रोक लगा दिया है. जिसके लिए उसने आतंकी समूहों के खिलाफ पर्याप्त कार्रवाई न होने की बात कही है.

(गार्डिनर हैरिस का ये लेख न्यूयार्क टाइम्स में प्रकाशित हुआ है, जिसका अनुवाद जनचौक पर प्रकाशित हुआ है, इसको वहीं से साभार लिया गया है.)