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फिल्म समीक्षाः ‘द एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ बेहतर फ़िल्म हो सकती थी। मगर निर्देशक के मन में बेईमानी थी।

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ओम थानवी

‘द एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ बेहतर फ़िल्म हो सकती थी। मगर निर्देशक के मन में बेईमानी थी। थोड़ा उलझाव भी। इसलिए फ़िल्म मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार संजय बारू ( इंडियन एक्सप्रेस समूह में हम साथ थे) पर केंद्रित होकर रह गई। जबकि उनकी किताब पर वह महज़ आधारित थी, उसका निरूपण नहीं।

निर्देशक की उलझन का सबसे बड़ा प्रमाण यह कि वह फ़िल्म में असली चरित्र लाता है, नाम भी वही इस्तेमाल करता है, उनकी परिचित वेशभूषा, हावभाव और मुद्राएँ भी – यहाँ तक कि सिंह, सोनिया गांधी, राहुल, सुषमा स्वराज, जॉर्ज फ़र्नांडीज़, स्मृति ईरानी आदि के असल वीडियो-क्लिप भी – मगर फिर भी फ़िल्म को पूरी तरह बारू के तथ्यों या वर्णन पर केंद्रित नहीं कहना चाहता। बल्कि पल्लाझड़क इबारत में कहता है कि असल चरित्रों से कोई लेना-देना नहीं, फ़िल्म का उद्देश्य तो मनोरंजन भर है।

और बेईमानी का रंग यह कि सिंह को ही नहीं, राष्ट्रपति अब्दुल कलाम, राहुल गांधी, अहमद पटेल आदि को निपट उपहास के चरित्रों में ढाल दिया है। सिंह के सचिव टीकेए नायर (उन्हें चंडीगढ़ के दिनों से जानता हूँ, जब वे पंजाब के मुख्य सचिव थे) ठिगने और पतले हैं, लेकिन फ़िल्म के नायर कुछ और ही निकले। सिंह हरदम कठपुतली की चाल से चित्रित किए गए हैं, पटेल षड्यंत्रकारी के रूप में।

अंत में चुनाव के हवालों से बेईमानी का मंतव्य और स्पष्ट हो जाता है। फिर भी, मेरा मानना है कि बचकाने निरूपण का असर लोगों के मन में उलटा पड़ेगा। कांग्रेस की परम्परा, अहं का टकराव आदि परिचित चीज़ें हैं। हो सकता है सिंह के प्रति उलटे सहानुभूति पैदा हो, क्योंकि वे बुरे या नाकारा व्यक्ति न थे। शायद इसीका सबूत था कि हम जब इतवार की शाम फ़िल्म देखने गए, हॉल बेतरह ख़ाली मिला।

आप पूछ सकते हैं कि फ़िल्म में मुझे कुछ अच्छा भी लगा? जी, बारू की भूमिका में अक्षय खन्ना का अभिनय। और अंत में बाबा नागार्जुन की मंत्र-कविता “ॐ श‌ब्द ही ब्रह्म है …” का चित्रण: साधु तिवारी का गाना और उंनकी अपनी धुन यक़ीनन बहुत बढ़िया हैं। गाने का (फ़िल्मांकन की ठहरी तसवीरों के साथ) सम्पादन भी। पर यह गाना ऐसी घड़ी बजता है, जब दर्शक फ़िल्म ख़त्म हुई जान बाहर के दरवाज़े तक पहुँच चुके होते हैं! इसे भी निर्देशक विजय गुट्टे की काहिली मानिए।