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आरक्षण के विरोध का हिंसक इतिहास और सवर्णों के आरक्षण पर सभी एकजुट ऐसा क्यों ?

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सिद्धार्थ रामू

सवर्णों के लिए आरक्षण की घोषणा से पहले भारत के इतिहास में जब भी आरक्षण देने की घोषणा हुई, तो तूफान उठ खड़ा हो गया। 1902 में जब शाहू जी महराज ने शूद्रों-अतिशूद्रों को को आरक्षण देने की घोषणा किया, तो महाराष्ट्र के सारे ब्राह्मण शाहू जी महराज के खिलाफ उठ खड़े गए। उनके महल में आग लगा दी गई और उनकी हत्या की कोशिश की गई। आरक्षण के विरोध की अगुवाई लोकमान्य तिलक ने किया। 1932 में जब अंग्रेजों ने दलितों के लिए पृथक निर्वाचन क्षेत्र ( राजनीतिक आरक्षण) की घोषणा किया तो, तो गांधी आमरण अनशन पर बैठ गए और उसे खत्म करा कर ही दम लिया। यहां यह याद रखना जरूरी है कि पृथक निर्वाचन क्षेत्र रहता तो यह दलितों के लिए सबसे बड़ा आरक्षण साबित होता।

बिहार में जब 1971 में कर्पूरी ठाकुर ने पिछड़ी जातियों को आरक्षण दिया, तो पूरे बिहार में सवर्ण सड़कों पर उतर आए। अन्तोगत्वा कर्पूरी ठाकुर को मुख्यमंत्री पद से हटा कर ही दम लिया। पिछड़े वर्गों के आरक्षण के पहले आयोग की रिपोर्ट कभी लागू ही नहीं हुई, दूसरे आयोग ( मंडल आयोग) की रिपोर्ट धूल खाती रही, जब लागू करने की घोषणा (1992) हुई तो सवर्ण सड़कों पर उतर आये। हिंसक प्रदर्शन हुए। 2006 उच्च शिक्षा में जब ओबीसी को आरक्षण की घोषणा अर्जुन सिंह ने किया तो, सवर्णों के बेटा-बेटी हाय-हाय करते सड़कों पर उतर आए। आरक्षण दिलाने के चलते शाहू जी महराज और डॉ. आंबेडकर जैसे लोग आज भी सवर्णों की घृणा के पात्र बने हुए हैं। सवर्णों के आरक्षण पर करीब सभी पार्टियों की एकजुटता यही बताती है कि इस देश के आज भी मालिक सवर्ण ही हैं।

आरक्षण का आधार

सवर्णों को आरक्षण संविधान की भावना और आरक्षण के मूल उद्देश्य नष्ट करने की कोशिश है। लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार ने नाराज चल रहे सवर्णों को मनाने के लिए पासा फेंका है। केंद्रीय मंत्रिपरिषद के निर्णय के मुताबिक सरकार गरीब सवर्णों को दस फीसदी आरक्षण देने के लिए संशोधन विधेयक लाएगी। इसे कैसे देखें –

  • आरक्षण का उद्देश्य जीवन के सभी क्षेत्रों में हजारों वर्षों से चले आर रहे सवर्णों के वर्चस्व को तोडना था।
  • आरक्षण का उद्देश्य हजारों वर्षों से प्रतिनिधित्व से वंचित आदिवासियों, दलितों और ओबीसी समुदायों को प्रतिनिधित्व देना था।
  • आरक्षण का उद्देश्य सार्वजिनक जीवन संबंधी निर्णय और लागू करने की प्रक्रिया से बाहर लोगों को निर्णय और लागू करने की प्रक्रिया में शामिल करना था।
  • आरक्षण का उद्देश्य वर्चस्व और अधीनता के संबंधों को तोडना था, जिनका आधार सामाजिक-शैक्षिक है, न की आर्थिक।

आरक्षण रोजगार और आर्थिक उन्नति तक सीमित करना उसके मूल उद्देश्य का खारिज करना है। सबके लिए रोजगार और सबकी आर्थिक समृद्धि सरकार की जिम्मेदारी है, जिसे उसे अवश्य पूरा करना चाहिए। उसके लिए विभिन्न उपाय किए जा सकते हैं और किए जाने चाहिए। लेकिन न कर पाने में अक्षम सरकार अब आरक्षण की मूल उद्देश्य और मूल भावना को नष्ट करके गरीब सवर्णों को लुभाना चाहती है।

(लेखक फारवर्डप्रेस मैग्ज़ीन के संपादक हैं, ये उनके निजी विचार हैं)