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कोयला खदान मालिकों की जेब भरने के लिये मोदी सरकार एक और फैसला, अब खदान में रात को भी काम करेंगी महिलाऐं

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गिरीश मालवीय

पिछले तीन दिनो मे बहुत सी बेहद महत्वपूर्ण खबरें पीछे छूट गयी, दो दिन पहले खबर आयी कि मोदी सरकार ने महिलाओं को भूमिगत खदानों में काम करने की अनुमति दे दी है अब उनसे रात में भी काम करवाया जा सकेगा। श्रम मंत्रालय ने एक बयान देकर कहा कि ‘‘केंद्र सरकार जमीन के ऊपर किसी खदान और जमीन के अंदर किसी खदान में काम करने वाली महिलाओं को खान कानून, 1952 की धारा 46 के प्रावधानों से छूट देती है।’’ बयान में कहा गया है कि खान मालिक जमीन के ऊपर फैली खानों में किसी महिला को शाम सात से सुबह छह बजे तक नियुक्त कर सकते हैं। वहीं भूमिगत खदान के मामले में शाम सात बजे से सुबह छह बजे तक उनकी तैनाती केवल तकनीकी, निरीक्षण या प्रबंधन स्तर के कामकाज के लिए ही की जा सकती है।

जबकि हम अच्छी तरह से जानते हैं कि खदानों में ऐसे कानून कायदों का किस तरह पालन किया जाता है पहले खनन कानून 1952 के तहत भूमिगत खदानों में महिलाओं के काम करने पर प्रतिबंध था वहीं खुली खदानों में महिलाओं को नौकरी पर रखा जा सकता है, लेकिन उसमें भी उनकी ड्यूटी दिन में होनी चाहिए थी. खदानों से भरपूर माल कमा रहे पूंजीपतियों को सस्ता श्रम चाहिए ओर अब सरकार ने उनका रास्ता साफ कर दिया, इस बारे में जागरण की खबर पढ़ रहा था उसने इस बात को महिला सशक्तिकरण से जोड़ दिया, मैं हक्का बक्का रह गया मीडिया इस तरह के कुचक्र कैसे रचता है, कही पढ़ा था कि संसार की सारी दौलत भी दे दी जाए तो स्त्री के श्रम की कीमत अदा नही की जा सकती, जो श्रम वह सहज भाव से करती है।

बेहद आश्चर्य इस बात का भी हुआ कि इस बात की कही कोई चर्चा कोई बहस नही हुई,शायद बाजारवाद की पोषक मीडिया को #ME_TOO जैसे कैम्पेन को उठाने में ज्यादा दिलचस्पी है क्योंकि उसमें तथाकथित सेलेब्रिटीज़, हाई क्लास सोसायटी से जुड़ी महिलाओं के किस्से चटखारे मार कर पढ़े जाते हैं। नाना पाटेकर, MJ अकबर का किस्से सुर्खियों में रहे लेकिन दूरदर्शन में काम कर कामकाजी महिलाओं का योन शोषण मुद्दा नही बन पाया.

तथाकथित नारीवादीयो ने भी केंद्र सरकार के इस आदेश पर खामोशी ओढ़ ली, ऑड नारी जैसी वेबसाइट अपने पाठकों को सॉफ्ट पोर्न परोसती रही…. जबकि मेघालय में कुछ दिनों पहले ऐसी ही असुरक्षित खदानों में 15 मजदूर अपनी जान से हाथ धो बैठे है तो ऐसे नारीवाद के झंडाबरदार एक बार सरकार से पूछ तो ले कि महिलाओं की सुरक्षा के क्या इंतज़ामात किये गए हैं, ओर जो नियम है उनका कितना पालन किया जाता है. मीडिया द्वारा श्रमिको के उत्पीड़न को नजर अंदाज करना अब हैरान नही करता लेकिन कम से कम ऐसा घटियापन उनसे अपेक्षित नही है ऐसी खबरों को भी महिला सशक्तिकरण के नाम पर वह ग्लैमराइज करे.

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)