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जो मजबूत सरकार आम चुनाव के साथ कश्मीर का चुनाव नहीं करा सकी, वह पूरे देश में एक चुनाव क्यों चाहती है?

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कृष्कांत

कहा जा रहा है कि चुनाव का खर्च बहुत बढ़ गया है। 1952 में पहले आम चुनाव का खर्च 10 करोड़ रुपये आया था, 2019 में माना जा रहा है कि करीब 6500 करोड़ रुपये चुनाव में खर्च हुए। इसके साथ ही ओडिशा, आंध्र प्रदेश, अरुणाचल और सिक्किम के भी चुनाव हुए।

पिछली मोदी सरकार ने अपने प्रचार के लिए विज्ञापन पर 5245।73 करोड़ रुपये ख़र्च किए। इस धनराशि से थोड़ा ही ज्यादा चुनाव का खर्च है। यानी भाजपा सरकार ने जितना सरकारी पैसा अपने प्रचार पर फूंका, उससे कम में चुनाव संपन्न हो जाता है। सरकार अपने प्रचार पर पैसा फूंकने पर फिलहाल कोई रोक नहीं लगाने जा रही है।

2014 का लोकसभा चुनाव 3870 करोड़ रुपये में संपन्न हुआ था। यह 6500 करोड़ रुपये हुआ तो सरकार इसे रोकने की सोच रही है। लेकिन मनमोहन सरकार ने अपने दस साल में प्रचार पर जितना खर्च किया था, मोदी सरकार ने पांच ही साल में उससे ज्यादा खर्च कर दिया। यानी सरकार चुनाव खर्च के बराबर पैसा, जो कि जनता का पैसा है, अपने प्रचार पर तो लुटाना चाहती है, लेकिन चुनाव का खर्च घटाने के लिए अभियान चला रही है जो लोकतंत्र की बुनियाद है!

दूसरा तर्क है कि पूरे पांच साल देश चुनावी मोड में रहता है। हमारे संसदीय लोकतंत्र में जो चुनावी व्यवस्था है, उसके तहत प्रधानमंत्री देश का प्रधानमंत्री होता है। वह चुनाव प्रचार मंत्री नहीं होता। केंद्र में जिस पार्टी की सरकार है, वह राज्यों के चुनाव भी लड़े, इससे केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री को लेना देना नहीं होना चाहिए। लेकिन समस्या यह है कि बीजेपी मोदी को चेहरा बनाकर परधानी तक का चुनाव लड़ती है। इसलिए प्रधानमंत्री पूरे पांच साल प्रचार करते हैं। मोदी और योगी इसीलिए हमेशा चुनावी मोड में रहते हैं, क्योंकि मोदी और शाह ने अपनी पार्टी को भी अपनी मुट्ठी में रखा है। अब डेढ़ आदमी मिलकर सरकार भी चलाएंगे, पार्टी भी चलाएंगे तो पूरे पांच साल चुनावी मोड में रहना ही पड़ेगा।

यानी पांच साल चुनावी मोड में रहने की परेशानी बीजेपी की अपनी परेशानी है। पार्टी को मोदी-शाह के चंगुल से छोड़ दें तो यह परेशानी खत्म हो जाएगी। इसके लिए चुनाव की व्यवस्था बदल देना अपने फायदे के लिए व्यवस्था को बदलना है। 25 जून को यही आरोप मोदी जी ने इंदिरा पर लगाया है कि आपातकाल अपने फायदे के लिए लगाया गया, यह सही भी है। अब वे खुद यही काम क्यों करना चाहते हैं?

तीसरा तर्क है कि पहले लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ होते थे। यह स​ही है। 1950 में संविधान के लागू होने के बाद पहला चुनाव 1952 में हुआ। जाहिर है कि नये संविधान के तहत पहला चुनाव था तो राज्य और केंद्र के चुनाव एक साथ हुए। पांच साल सरकारें चलीं और फिर 1957 में सभी चुनाव एक साथ हुए। लेकिन 1959 में इंदिरा गांधी की जिद ने केरल में ईएमएस नंबूदरीपाद की सरकार गिरवा दी। राष्ट्रपति शासन लगा दिया। फिर 1962 में चुनाव हुए। यानी तीन साल तक राष्ट्रपति शासन। आज व्यवस्था यह है कि किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाया जाता है तो छह महीने के भीतर वहां पर चुनाव कराना अनिवार्य है ​क्योंकि एक चुनी हुई सरकार जनता का अधिकार है। जनादेश सिर्फ जनता दे सकती है। कोई मंत्री या प्रधानमंत्री नहीं।

1967 के चुनाव के बाद चार राज्यों में मध्यावधि चुनावों की नौबत आई। इसके बाद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, जो कम्युनिस्टों और समाजवादियों के सहारे सरकार चला रही थीं और पार्टी के भीतर सिंडीकेट की साजिश से जूझ रही थीं, उन्होंने एक साल पहले केंद्र का चुनाव कराने की घोषणा कर दी। यह किसी भी सरकार का फैसला है कि वह समय से पहले चुनाव में जाए। राज्य भी और केंद्र भी। लेकिन केंद्र अगर समय से पहले चुनाव चाहता है तो राज्य भी ऐसा क्यों करें? इसलिए चुनाव अलग अलग होने लगे।

अब सवाल है कि एक चुनाव की व्यवस्था कर दी जाए तो ऐसी समस्या आने पर क्या होगा? किसी राज्य की सरकार ने सत्ता में आते ही विश्वास खो दिया तो क्या वहां होगा। क्या पांच साल राष्ट्रपति शासन रहेगा और वह भी इसलिए कि चुनाव में खर्च आता है?

अब यह स्थिति उलट दीजिए। माना कि ​राज्यों में सरकारें मजबूत स्थिति में हैं लेकिन केंद्र की सरकार ने बहुमत खो दिया क्या तब सभी राज्यों की विधानसभाओं को भंग किया जाएगा क्योंकि केंद्र की सरकार गिर गई है?

लोकतंत्र की मूल भावना यानी चुनाव को खर्च के तर्क से नकार देना हास्यास्पद ही नहीं, बेहद बचकाना है। आज आप कह रहे हैं कि चुनाव और संघीय प्रणाली विकास विरोधी है, खर्चीली है। कल को यह कहने वाले आ जाएंगे कि लोकतंत्र और संसदीय व्यवस्था ही विकास विरोधी है। चुनाव मत करवाइए। एक राजा सिंहासन पर बैठा है, 50 साल उसी को रहने दीजिए क्योंकि चुनाव में खर्च आएगा। यह तर्क नहीं, कुतर्क है।

राजनीतिक पार्टियों का काम है चुनाव लड़ना। प्रधानमंत्री का काम है सरकार और दशे चलाना। ​जिन्होंने पार्टी और सरकार को एक ही में समेट दिया है, उन्हें अपने रवैये में सुधार की जरूरत है, संघीय व्यवस्था बदल देने की जरूरत नहीं है।

केशवानंद भारती केस में सुप्रीम कोर्ट ने व्याख्या दी थी कि संविधान की मूल आत्मा को संशोधन के जरिये भी बदला नहीं जा सकता। संविधान की इस मूल आत्मा में संघीय ढांचा भी शामिल है। एक देश, एक चुनाव तभी लागू हो सकता है जब इस संघीय ढांचे को बदल दिया जाए। इस ढांचे को कोई सरकार सिर्फ इसलिए नहीं बदल सकती है कि हम पांच साल चुनावी मोड में नहीं रहना चाहते। आप चुनावी मोड में खुद ही रहते हैं। वरना आपका काम पहले से तय है।

फिलहाल नई सरकार का काम है कि ध्वस्त हो रही अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करना और करोड़ों बेरोजगारों को रोजगार देना। अब कोई सरकार बेरोजगारों को पकौड़ा और छनौटा थमाकर चुनाव के बारे में सोच रही है तो यह सरकार चलाने वालों की समस्या है। व्यवस्था की समस्या नहीं है।

सरकार खर्च बचाने, समय बचाने, विकास करने के बहाने लोकतंत्र के मूल ढांचे को बदलना चाहती है। सरकार के प्रचार के बराबर खर्च को घटाने के नाम पर हम अपने गणतंत्र से समझौता नहीं कर सकते।

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