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नज़रियाः अब भीड़ अखलाक और पहलू खान जैसे साधारण लोगों की जगह पुलिसकर्मियों और अधिकारियों को मार रही है।

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कृष्णकांत

बुलंदशहर में इंस्पेक्टर सुबोध कुमार के बाद अब गाजीपुर में सुरेश वत्स को भीड़ ने मार डाला। अब भीड़ अखलाक और पहलू खान जैसे साधारण लोगों की जगह पुलिसकर्मियों और अधिकारियों को मार रही है। भीड़ ने जब पहली हत्या की थी, तभी उसके हौसले को कुचलने की जगह माल्यार्पण करके उसका हौसला बढ़ाया गया। बुलंद शहर मामले में एक भाजपा नेता का कहना था कि इंस्पेक्टर की मौत नहीं, गायों की मौत ज़्यादा गंभीर है। बुलंदशहर की घटना के बाद योगी की अगुआई में जो समीक्षा बैठक हुई उसमें सिर्फ गायों पर चर्चा हुई।

इंस्पेक्टर की मौत पर कोई बात नहीं हुई। यह भीड़ अब जान चुकी है कि हमको पूरी छूट है। अब यह भीड़ खुलेआम नेता और मंत्री के समर्थन से मार रही है। यह आम आदमी से लेकर खास आदमी तक को मार रही है। उत्तर प्रदेश में पुलिस का इक़बाल खत्म हो गया है। असली जंगल राज इसे ही कहते हैं जब जानवर मनुष्य से बड़ा है और कानून का रखवाला उन्मादी भीड़ के आगे बहुत छोटा।

औवेसी मुसलमानों का नुकसान कर रह हैं?

ओवैसी की संसद में इंस्टैंट तीन तलाक पर की गई तकरीर बेहद शानदार थी, सिर्फ उनके अंतिम वाक्य को छोड़कर. अंत में उन्होंने कहा, ‘मैं कॉन्क्लूड कर रहा हूं… जब तक दुनिया बाकी रहेगी, हम मुसलमान बनकर शरियत पर चलते रहेंगे.’ उनकी पूरी तकरीर बेहद तार्किक और बेहतरीन थी. लेकिन हर पढ़ा लिखा मुसलमान अंतत: अगर कट्टर मुसलमान बन जाएगा तो हम सब यह कैसे कह पाएंगे कि हर हिंदू को अंतत: उदार ही होना चाहिए?  डॉक्टर आंबेडकर ने समान नागरिक संहिता पर बहस करते हुए संविधान सभा में जो कहा था, उसे ध्यान से पढ़ने की जरूरत है.

उन्होंने कहा, ‘पर्सनल लॉ को बचाने के सवाल पर आएं तो मैं समझता हूं इस मामले पर पूरी तरह और पर्याप्त रूप से उस समय चर्चा और बहस हो चुकी थी जब हमने संविधान के एक निर्देशक सिद्धांत जो राज्य पर एक समान नागरिक संहिता लाने की दिशा में सक्रिय रहने की जिम्मेदारी डालता है, पर चर्चा की थी और मैं नहीं समझता कि उस पर आगे विचार किए जाने की जरूरत है. परंतु मैं यह कहना चाहूंगा कि अगर संविधान में इस तरह के बचाने के (सेविंग) क्लॉज का समावेश किया गया तो वह भारत के विधानमंडलों को किसी भी सामाजिक विषय पर कानून बनाने में अक्षम बना देगा. इस देश में धार्मिक धारणाएं इतनी व्याप्त हैं कि वे जन्म से लेकर मृत्यु तक जीवन के हर पहलू को अपने दायरे में लिए हुए हैं. ऐसा कुछ भी नहीं है जो धर्म न हो और अगर पर्सनल लॉ को बचाना है तो मुझे पक्का विश्वास है कि सामाजिक विषयों पर कानून बनाने का कार्य ठप पड़ जाएगा. मैं नहीं समझता कि उस तरह की स्थिति को स्वीकार करना संभव है.’

डॉक्टर आंबेडकर ने आगे कहा, ‘यह कहने में कुछ भी असाधारण नहीं है कि हमें अब से धर्म को इस तरह से परिभाषित करने की दिशा में काम करना चाहिए कि हम विश्वासों और ऐसे विधि-विधानों से आगे नहीं जाएंगे जो ऐसे अनुष्ठानों से जुड़े हों जो आवश्यक रूप से धार्मिक हैं. यह जरूरी नहीं है कि इस तरह के कानून, उदाहरण के लिए काश्तकारी या उत्तराधिकार से संबंधित कानून, धर्म द्वारा शासित हों. यूरोप में ईसाइयत है, परंतु ईसाइयत का अर्थ यह नहीं है कि पूरी दुनिया के ईसाई या यूरोप के किसी भाग में बसे ईसाइयों का उत्तराधिकार के मामले में एक जैसा कानून हो. ऐसी कोई चीज अस्तित्व में नहीं है. मैं व्यक्तिगत रूप से यह नहीं समझ पाता कि धर्म का दखल इतने विस्तृत क्षेत्र में क्यों होना चाहिए कि वह पूरे जीवन को ही समेट ले और विधानमंडल को उस क्षेत्र में घुसने न दे.’

सरकार की मंशा पर पुख्ता संदेह है. जितना मैं समझ सका हूं, प्रस्तावित कानून भेदभाव करता है. उसका ​तार्किक विरोध जायज है. लेकिन इंस्टैंट तीन तलाक भी बुरा है. उसे खत्म करने में धार्मिक मठों की असफलता को कैसे नजरअंदाज करेंगे? आपको भेदभावपूर्ण कानून का विरोध करना चाहिए, साथ में बुरे धार्मिक कानूनों और कुप्रथाओं का भी.

धर्म निजी मसला है. उसे राजव्यवस्था का आईन बनाने में बुनियादी समस्या आएगी. ओवैसी बहुत विद्वान व्यक्ति हैं. वे अपनी लगभग हर बहस में संविधान को आधार बनाकर बहस में हावी होते हैं, लेकिन अंतत: इस्लाम को तवज्जो देना खतरनाक है. क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम और धर्म अथवा आस्था दो अलहदा चीजे हैं. क्या ओवैसी इतना सी बात नहीं समझते? वे तार्किक और संविधान सम्मत बातें करके भी मुसलमानों का नुकसान कर रहे हैं.

(लेखक युवा पत्रकार हैं, ये उनके निजी विचार हैं)