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नज़रियाः भीड़ पहले कमज़ोर नागरिक को मारेगी, फिर पुलिस को मारेगी, और उसके बाद नेता की भी बारी आऐगी।

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कृष्णकांत

भीड़ पहले कमज़ोर नागरिक को मारेगी। फिर पुलिस को मारेगी। फिर नेता की भी बारी आ सकती है। अगर इंस्पेक्टर को भीड़ मार सकती है तो नेता की सुरक्षा कौन करेगा? नेता कब तक चिल्लाता फिरेगा कि वह विष्णु का अवतार है। इसी तरह की ज़हर-बुझी भीड़ में से नाथूराम निकला था, जिसने गांधी जैसे महापुरुष को भी नहीं छोड़ा। धर्म की सियासत करने वाले नहीं जानते कि वे सभ्यता और संस्कृति के सबसे बड़े दुश्मन हैं।

मुश्किल यह है कि बुरे को बुरा कहने वाले कम हैं इसलिए नफरत की फैक्ट्री पर उत्पादन बन्द करने का दबाव नहीं है। भाजपा सांसद ने कहा है कि बुलंदशहर हिंसा में बजरंग दल का कोई रोल नहीं है. इंस्पेक्टर की हत्या पुलिस की साजिश है. मैं हैरान हूं कि भीड़ को किसी ने अभी तक ‘भगत सिंह के वारिस’, ‘निर्दोष बच्चे’ और ‘राष्ट्रभक्त’ नहीं कहा. सारे केंद्रीय मंत्री कहां हैं? भीड़ को जल्दी माला पहनाने की जरूरत है. परंपरा टूटनी नहीं चाहिए.

मोदी और उनका भाषण

जब कभी वे निम्न स्तर की बात करते हैं तो मुझे उनकी बूढ़ी मां याद आती हैं। सोचता हूं यह आदमी अपने फायदे के लिए कुछ भी बेच सकता है- मां, मर्यादा, माटी, मातृभूमि, मनुष्यता-कुछ भी। आदमी चाहे जैसा हो, लेकिन अपनी मां को बख़्श देता है, उसका तमाशा नहीं बनाता। यहां इन्होंने तो मां और मातृभूमि दोनों का ऐसा नारा लगाया कि अंततः उनका उपहास ही किया।

वास्तव में इस देश के नेता भ्रष्ट नहीं हैं, हम सब भ्रष्ट हैं। हम अपनी सोच से गुलाम हैं। हम सदियों से अवतार खोजने वाले धर्मभीरु और डरपोक लोग हैं जिनके पास दर्शन तो सिर्फ छह हैं, लेकिन देवता 33 करोड़ हैं। देश का उपराष्ट्रपति प्रधानमंत्री को विष्णु का अवतार कहे और पूरा देश चुपचाप सुन ले तो सोचिए कि ऐसे देश मे तर्क की कितनी जगह है।

किसी ने नहीं पूछा कि नोटबन्दी करने के बाद देश का मुखिया अपनी बुजुर्ग मां को 2000 रुपया क्यों नहीं भेज सकता था? अगर नहीं भेज सकता तो धिक्कार है। मां की देखभाल ना करना शुचिता है और अडानी अम्बानी के हाथ देश बेच देना देशभक्ति है? देश का सबसे ताकतवर आदमी, जो अपनी मां की देखभाल नहीं सुनिश्चित कर सकता, वह देश का क्या करेगा?  महीनों हो गए हैं, ये रोज़ किसी न किसी रैली में ही पाए जाते हैं। पिछले 70 सालों में इतना खलिहर प्रधानमंत्री नहीं हुआ। इस बार देश ने एक ऐसा प्रधानमंत्री चुना है जिसके लिए अपनी चुनावी हवस से बड़ा कुछ भी नहीं है। ना मां, ना मर्यादा, ना मानुष।

क्या नेहरू को कौस कर पटेल का अपमान कर रहे हैं मोदी

‘आजादी के बाद कांग्रेसी सत्ता की छीनाझपटी में व्यस्त हो गए और करतारपुर पाकिस्तान में चला गया.’ यह आरोप जितना नेहरू पर है, उतना ही देश की पहली सरकार के गृहमंत्री और उपप्रधानमंत्री सरदार पटेल पर भी है जिन्होंने देश की 500 से अधिक रियासतों का एकीकरण किया.

पटेल की सबसे बड़ी प्रतिमा ऐसे नहीं बनी है. गालियां उनको भी मिलेंगी. और देगा कौन? जिनसे पांच साल भाषण देने और झूठ का वमन करने के सिवा कुछ न हो सका. वे नेहरू और पटेल को गरिया कर 2018 में वोट मांग रहे हैं. सोचिए कि इस देश की जनता को वे क्या समझते हैं?

(लेखक युवा पत्रकार हैं, ये उनके निजी विचार हैं)