Home पड़ताल 6 दिसंबरः सेक्यूलर कांग्रेस के ‘दोहरे’ चरित्र की गवाह है बाबरी मस्जिद

6 दिसंबरः सेक्यूलर कांग्रेस के ‘दोहरे’ चरित्र की गवाह है बाबरी मस्जिद

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मोहम्मद ख़ालिद हुसैन

इसी 27 सितम्बर 2018 को राम जन्मभूमि- बाबरी मस्जिद विवाद से जुड़े एक अहम मामले “मस्जिद में नमाज इस्लाम का अभिन्न हिस्सा नहीं है”, पर सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला आ गया. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 1994 के संविधान पीठ के फैसले पर पुनर्विचार की जरूरत नहीं है और यह मामला अब बडी़ बेंच में नहीं भेजा जाएगा। इस मुद्दे ने एक बार फिर से बाबरी मस्जिद की यादें ताज़ा कर दी हैं। बाबरी मस्जिद और राम मंदिर विवाद ने कई दशकों तक भारत की राजनीति को प्रभावित किया है। बाबरी मस्जिद मुद्दे पर बहुत सी बातें लिखी गयीं, बहुत से लोगों ने लिखीं लेकिन अभी भी इस पर बहुत कुछ लिखा जाना बाक़ी है। ये विवाद एक दिन में तो नहीं पैदा हुआ होगा काफ़ी समय लगा होगा इस विवाद को पैदा होने में। शुरू से ही बाबरी मस्जिद और राम मंदिर विवाद में कांग्रेस की बड़ी अहम भूमिका रही। कांग्रेस ने कभी इस मुद्दे को सुलझाने की कोशिश नहीं की। कांग्रेस हमेशा से यही चाहती रही की ये मुद्दा सदा ज़िंदा रहे।

साल 1986 में फैजाबाद जिला न्यायालय के जज के.एम. पांडे को बाबरी मस्जिद का ताला खुलवाने की याचिका पर सुनवाई करनी थी। हैरत की बात है कि उस वक्त केंद्र सरकार (कांग्रेस) का प्रतिनिधत्व कर रहे दो अधिकारी और वीर बहादुर सिंह की सरकार ने कोर्ट में कहा कि मस्जिद के दरवाजे खुलने से इलाके में तनाव की संभावना नहीं है। ऐसा वो तब कह रहे थे जब अर्जी में बाबरी मस्जिद के अंदर भक्तों द्वारा पूजा करने की इजाजत मांगी गई थी जबकि लगभग 30 साल पहले ही इस मस्जिद को पंडित अभिराम दास द्वारा अपवित्र घोषित कर दिया गया था।

हालाँकि ये अजीब बात थी। हिंदुओं को उस मस्जिद में घुसने की इजाजत मिलने से मुस्लिम समुदाय नाराज हो सकता था, क्योंकि इससे तीन दशक पहले पंडित अभिराम दास और बाकी लोग इसे ‘अपवित्र’ कर चुके थे। देश को आज़ाद हुए दो साल ही हुए थे। देश के पहले प्रधानमंत्री नेहरु नए भारत की रूपरेखा तैयार कर रहे थे और गृहमंत्री सरदार पटेल देश की सीमाओं को निर्धारित कर रहे थे। मगर अयोध्या में इन सब से दूर बाबरी मस्जिद के रूप में जाने जाने वाली इमारत को राम मंदिर में बदलने की तैयारी चल रही थी। 22 और 23 दिसंबर 1949 को बाबरी मस्जिद के अंदर रामलला की मूर्ति गुपचुप तरीके से स्थापित कर दी गई. दो दिन बाद कानूनी आदेश के बाद भक्तों को मंदिर से हटाया गया और यथास्थिति‍ बरकरार रखने का आदेश दिया गया। यह वाक्या बरसों से चल रहे संघर्ष के बीच एक निर्णायक मोड़ की तरह था। इस घटना के बाद स्थानीय पुलिस ने तीन नामजद पंडित अभिराम दास, राम शकल दास और सुदर्शन दास समेत तकरीबन 60 लोगों के खिलाफ़ दंगा भड़काने, अतिक्रमण करने और एक धार्मिक स्थल को अपवित्र करने का मामला दर्ज किया। ये तो सन 1949 की बात थी। अब फिर लौटते है 1986 की तरफ़।

ठीक कांग्रेस सरकार के सुझाए अनुसार जज पांडे ने अपने फैसले में कहा कि अगर हिंदू श्रद्धालुओं को परिसर के अंदर रखी मूर्तियों को देखने और पूजने की इजाजत दी जाती है तो इससे मुस्लिम समुदाय को ठेस नहीं पहुंचेगी, और न ही इससे आसमान टूट पड़ेगा। लेकिन, वाक़ई में आसमान टूट पड़ा। 14 फरवरी 1986, मुसलमानों ने बाबरी मस्जिद का दरवाजा खोलने पर काला दिवस मनाया। दिल्ली, मेरठ, यूपी, अनंतनाग और जम्मू- कश्मीर समेत देशभर में दंगे फैल गए। बाबरी मस्जिद का ताला खुलते ही दिल्ली, मेरठ, हाशिमपुरा, मुरादनगर और मलियाना समेत पूरे देश में दंगे भड़क गए। बाबरी मस्जिद के ताले खुलवाने के विरोध में कश्मीर के अनंतनाग में भी कई मंदिरों में तोडफोड़ की गई। पूरे देश का माहौल बिगड़ गया। दरअसल ये दंगे जज केएम पांडे के फैसले का ही नतीजा थे जिसका जिक्र उन्होने अपनी आत्मकथा में किया था।

भारतीय जनता पार्टी उस वक्त भारत की राजनीति में एक विपक्ष के तौर पर उभरने की कोशिश कर रही थी। बीजेपी ने राजीव गांधी पर मुस्लिम तुष्टिकरण का आरोप लगाया। इसी बीच 62 साल की शाह बानो सुप्रीम कोर्ट में गुजारे भत्ते के अधिकार का केस जीत गईं। मुस्लिम धर्म गुरुओं के मुताबिक ये फैसला उनके शरिया कानून के खिलाफ था। हालांकि राजीव गांधी ने मुस्लिम समुदाय को खुश करने की गरज से सुप्रीम कोर्ट के फैसले को नजरअंदाज करते हुए शाहबानो केस के फैसले पर एक नया कानून बनाया। इससे हिन्दुओं का एक बडा हिस्सा मुस्लिम धर्मगुरुओं पर भड़क उठा। राजीव गांधी ने हिन्दुओं को शांत करने और खुद पर लगे मुस्लिम तुष्टीकरण के आरोपों का जवाब देने की ठानी। और 1 फरवरी, 1986 को फैजाबाद के जिला जज के. एम. पाण्डेय ने 36 साल से चली आ रही व्यवस्था में बदलाव करते हुए बाबरी मस्जिद के तालों को खोलने का आदेश दे दिया।

ताला खोलने का फैसला आने के आधे घंटे के भीतर ही, मस्जिद के मुख्य दरवाजे पर लगा ताला तोड़ दिया गया. दूरदर्शन पूरी तैयारी के साथ तैनात था और पूरे घटनाक्रम का प्रसारण देश भर में किया गया। मस्जिद अपनी जगह पर रही और रामलला की मूर्ति भी। रामलला की पूजा के लिए पुजारी तय किया गया, जो मस्जिद के किनारे के रास्ते से जाकर विवादित स्थल पर पूजा-पाठ कर सकता था। ग़ौर कीजिएगा की बाबरी मस्जिद में 36 सालों से लगे ताले को राजीव गांधी की सरकार ने ही खुलवाया था। मस्जिद का ताला खोलने के पीछे कोर्ट में दलील ये दी गई थी कि पहले मस्जिद पर ताला लगाने का कोई आदेश आया ही नहीं। उसके ठीक एक दिन बाद यानी 15 फरवरी 1986 को बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी का गठन हुआ और एक नौजवान वकील जफरयाब गिलानी जो इस फैसले के पुरजोर विरोधी थे कमेटी के संयोजक बने।

जहां एक तरफ वीएचपी अपने अयोध्या मिशन को लेकर दिल्ली पहुंची तो वहीं दूसरी तरफ मुस्लिम धर्मगुरु इसके विरोध में सड़कों पर उतर गए। फरवरी 1989 में, वीएचपी ने घोषणा की वो राम मंदिर का शिलान्यास करेंगे। जैसे ही उन्होंने ये ऐलान किया दुनिया भर से चंदा मिलने लगा। इसके बाद विश्व हिन्दू परिषद ने राम मंदिर मुद्दे पर भारत के गांवों में अपने आंदोलन के लिए समर्थन जुटाना शुरु कर दिया। हालाँकि हाईकोर्ट का आदेश था कि विवादित जमीन पर कोई निर्माण न हो, लेकिन वीएचपी कोर्ट के आदेश की धज्जियां उड़ाने को तैयार हो चुकी थी। नतीजा ये हुआ कि देश का माहौल बिगड़ने लगा। सरकार को दखल देना पड़ा और पीएम राजीव गांधी ने गृहमंत्री बूटा सिंह को अयोध्या भेजा ताकि वीएचपी को शांत किया जा सके। अब तक कांग्रेस शिलान्यास के पक्ष में पूरी तरह नहीं दिख रही थी। 8 नवंबर 1989 को, प्रस्तावित शिलान्यास से दो दिन पहले, राज्य के अटॉर्नी जनरल ने कहा कि हाईकोर्ट के आदेश को शिलान्यास की इजाजत देने वाला माना जा सकता है। हालांकि, ये बहस का विषय था। फिर भी कांग्रेस अचानक शिलान्यास के पक्ष में खड़ी हो गई. रुख के इस बदलाव में, आने वाले चुनावों का भी एक रोल था।

वर्ष 1991 के मई महीने में प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या कर दी गई गई। दो महीने बाद ही, कांग्रेस फिर से सत्ता में आई और इस बार नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे। वर्ष 1990 में कारसेवकों पर फायरिंग की एक घटना के बाद, मुलायम सिंह सरकार सत्ता से बाहर हो चुकी थी। राममंदिर निर्माण के वादे के साथ यूपी में बीजेपी की सरकार बनी। कल्याण सिंह तब मुख्यमंत्री बने। उत्तर प्रदेश सरकार ने 2.77 एकड़ की विवादित जमीन कब्जे में ली और कोर्ट के आदेश के बावजूद, 1991 और 92 में करीब-करीब पूरे साल कारसेवा की इजाजत दे दी गई। राजीव गांधी की कुछ राजनीतिक गलतियां की वजह से बीजेपी ने अयोध्या आंदोलन को पूरी तरह से हाईजैक कर लिया, और फिर रथ-यात्रा की शुरुआत हुई। बीजेपी की संसद में ताकत 85 सीटों से बढ़कर 120 पहुंच चुकी थी।

30 अक्तूबर 1992 को वीएचपी ने एक धर्मसंसद का आयोजन किया जिसमें कारसेवकों से 6 दिसंबर को अयोध्या में इकट्ठा होने का आह्वान किया गया। कार्यक्रम के मुताबिक, कारसेवा सुबह 11 बजे शुरू होनी थी। योजना सरयू नदी का पानी और रेत लेकर, विवादित स्थल के पास बने ढांचे को साफ करने की थी। दोपहर 12 बजे के आसपास, एक तेज और लंबी सीटी सुनाई दी। अभी, साधु-संत, ढांचे को साफ ही कर रहे थे कि युवा कारसेवा तेज कदमों से सीटी की आवाज की दिशा में दौड़ पड़े. उन्होंने कंटीला तार हटा दिया, रस्सियों से विवादित ढांचे पर चढ़ गए और हथौड़ों से पूरे ढांचे को गिरा दिया। जब बाबरी मस्जिद तोड़ी गयी उस वक़्त भी केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी। 6 दिसंबर,1992, वो दिन था जिसने भारत की राजनीति का चेहरा बदल दिया।

इस मामले में कांग्रेस भी पीछे नही रही, कांग्रेस ने शुरू से इस मुद्दे में आग में घी डालने का काम किया है। जब बाबरी मस्जिद में राम लला की मूर्ति रखी गयी तब भी देश में कांग्रेस की सरकार थी। जब बाबरी मस्जिद का ताला खुलवाया गया तब उत्तरप्रदेश में और देश में कांग्रेस की सरकार थी। जब बाबरी मस्जिद को तोड़ा गया तब भी देश में कांग्रेस की सरकार थी लेकिन मुसलमानों के लिए कांग्रेस अब भी देश की सबसे बड़ी सेक्युलर पार्टी है। कई सालों से कांग्रेस के कपिल सिब्बल बाबरी मस्जिद केस के वक़ील रहे हैं। इसी साल मार्च में कांग्रेस ने कपिल सिब्बल को बाबरी मस्जिद का केस लड़ने से रोक दिया क्यूँकि “हिंदू” वोटर कांग्रेस से नाराज़ न हो जाए।

(लेखक सोशल मीडिया एक्टिविस्ट हैं, ये उनके निजी विचार हैं)