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नज़रियाः देश में भ्रष्टाचार दूर करना है तो धारा 341 हटाकर मुसलमानों को महत्वपूर्ण पदों पर बैठा दीजिए

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मोहम्मद ज़ाहिद

भारत की व्यवस्था में भ्रष्टाचार के चरम पर होने की एक प्रमुख वजह इस व्यवस्था में मुसलमानों का ना होना है, इसीलिए पद पर रहते फर्ज़ निभाने जैसे कार्य अब निर्रथक हो चुके हैं और चुँकि मुसलमान फर्ज़ की अहमियत इसलिए समझता है क्युँकि वह इस धार्मिक आवश्यकता (नमाज़ , रोज़ा , ज़कात और हज) को टूटा फूटा ही सही निभाता ही निभाता है तो वह पद के फर्ज़ को भी निभाता और देश भ्रष्टाचार के मामले में रोज़ नया इतिहास नहीं रचता।

इस देश में भ्रष्टाचार ने इतिहास यूं रचा कि दूसरे के भ्रष्टाचार की जांच करने की ज़िम्मेदारी वाली एक जाँच एजेन्सी के दो सबसे बड़े अधिकारी एक दूसरे को ही भ्रष्ट और घूसखोर कह रहे हैं। मुसलमानों को सरकारी नौकरी से बाहर करने की सबसे बड़ी साजिश देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने की थी और आज अंबेडकर के नाम का माला जप रहे मुसलमान यह समझ लें कि तब अंबेडकर इस साजिश को समझबूझ कर चुप थे।

मुसलमानों को सरकारी नौकरी से बाहर करने के लिए ही नेहरू ने धारा 341 लगाकर आरक्षण को धर्म के आधार पर ना देने का प्रावधान कर दिया। नेहरू जी के इस धारा 341से एक धर्म वाले (मुसलमान) आरक्षण से बाहर कर दिए गये और केवल दूसरे धर्म वालों (हिन्दू) को आरक्षण में एकाधिकार दे दिया गया। दरअसल मुसलमानों की समझ में आजतक यह नहीं आया कि 70 साल से आरक्षण से वंचित मुसलमानों का यदि धर्म है तो क्या जो 70 साल से आरक्षण पा रहे हैं उनका धर्म नहीं है ? फिर किस कारण से एक धर्म वालों को धारा 341 से आरक्षण वंचित किया गया और दूसरे धर्म वालों को इसका लाभ दिया गया ?

दरअसल नेहरू की साजिश का एक मात्र आधार यह था कि इस्लाम धर्म में सैद्धांतिक रूप से जाति नहीं होती इसलिए उनको आरक्षण नहीं मिलेगा, हिन्दू धर्म जाति व्यवस्था पर आधारित है इसलिए उनको आरक्षण मिलेगा। इसीलिए आरक्षण को धर्म आधारित ना बनाकर जाति आधारित किया गया जो कि स्पष्ट रूप से मुसलमान विरोधी आरक्षण व्यवस्था है। अब आगे देखिए, जिस आरक्षण को इस्लाम में जाति व्यवस्था ना होने के कारण इस संविधान ने मुसलमानों से दूर कर किया था, उसी आरक्षण को 1991 में इसी संविधान ने मुसलमानों में जाति की बात स्विकार कर के “मंडल आयोग” में आरक्षण दे दिया।

हांलाकि इसमें भी दोगलापन अधिक है और मुसलमानों पर अन्य धर्म के उसी वर्ग वालों को वरियता और नियुक्ति देने का खुला खेल चलता ही रहता है। खैर नेहरू जी को देखिए, पंडित जवाहर लाल नेहरू की नेतृत्व वाली तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने 10 अगस्त 1950 को एक अध्यादेश पास कराया जिसे कंस्टीटूशन (अनुसूचित जाति) आर्डर 1950 कहा जाता है। जिसके पैरा-3 में स्पष्ट किया गया है कि “कोई व्यक्ति जो हिन्दू धर्म को छोड़ कर किसी और धर्म को स्वीकार करता है वह अनुसूचित जाति नहीं माना जाएगा। किसी ऐसे व्यक्ति को आरक्षण की सुविधा नहीं मिलेगी जो गैरहिन्दू होगा। इस अध्यादेश का अर्थ था कि अनुसूचित जाति (दलित जाति) के मुसलमान ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन और दूसरे धर्म को मानने वाले लोगों को आरक्षण का लाभ उठाने वालों की सूची से बाहर कर दिया जाये जबकि 1936 से 1950 तक तमाम लोग सामान्य रूप से आरक्षण का लाभ उठा रहे थे”।

मतलब साफ है कि आरक्षण इस देश में सिर्फ़ बहुसंख्यकों के लिए है और शेष इससे वंचित रहें इसके लिए अंबेडकर के रहते ही नेहरू जी ने इसकी व्यवस्था कर दी थी। और अंबेडकर जी चुप रहे। उनके लिए भी दलित जाति जो किसी और धर्म में चली गयीं तो वह उनसे या उनके दलित एजेन्डे, सामाजिक न्याय से बाहर हो गयीं। तो सवाल तो उठता ही है कि क्या अंबेडकर भी सांप्रदायिक और मुसलमान विरोधी थे ? इसका जवाब तो आप खुद से पूछिए पर यह सच है कि मुसलमान इस देश में लात जूता खाकर भी उसी के नाम का ढोल पीटता है क्योंकि उसके पास कोई विकल्प नहीं।

उसे आरक्षण से बाहर करने की साजिश पर चुप रहे अंबेडकर की ढोल वह बजाता है तो उस संविधान की ढोल भी वह बजाता है जिसने उसे नौकरी से वंचित कर दिया , तो उस काँग्रेस की ढोल बजाता है जिसने 70 साल में उसे दलितों से बदतर कर दिया, तो खुद को कुत्ता और गद्दार कहने वाली मायावती का भी मुसलमान ढोल बजाता है, और वह ढोल बजाता है मुसलमानों का एक मुश्त वोट लेकर उनको मुज़फ्फरनगर देने वाली समाजवादी पार्टी का, जिसने कानून और संविधान की रक्षा के लिए अयोध्या में गोली चलाई तो बहुसंख्यकों ने मुलायम को खलनायक और मुसलमानों ने अपना मसीहा मान लिया।

 

खैर मुसलमान तो उच्चतम न्यायालय के उसके विरुद्ध होने पर भी उसका सम्मान करता है, इलाहाबाद उच्चन्यायालय के बाबरी मस्जिद पर फैसला, हाजी अली दरगाह में महिलाओं के प्रवेश से लेकर ट्रिपल तलाक तक के फैसलों पर मुसलमानों की प्रतिक्रिया की तुलना सबरीमाला, अयोध्या-1992, जल्लीकट्टू, दही हाँडी, दिपावली पर दिल्ली में फटाखे पर रोक और संथारा पर उच्चतम न्यायालय के फैसलों पर बहुसंख्यकों की प्रतिक्रिया से कर लीजिए। आपको यह एहसास हो जाएगा कि लात जूता खाकर कट मर कर भी मुसलमान इस देश को सबसे अधिक प्यार करने वाला और उसके विरुद्ध देश की सारी व्यवस्थाओं का सम्मान करने वाला नागरिक है। इस देश में भ्रष्टाचार दूर करना है तो धारा 341 हटाकर मुसलमानों को महत्वपूर्ण पदों पर बैठा दीजिए, और मात्र 5 साल में सफल परिणाम देख लीजिए।

(लेखक सोशल मीडिया एक्टिविस्ट हैं, ये उनके निजी विचार हैं)