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Awaam ki awaaz

जिन्हें भीड़ ने पीटकर मारा, पुलिस ने उन्हें भीड़ के हाथों पिटकर मर जाने के जुर्म में दोषी पाया।

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कृष्णकांत

पहली हत्या इस शक के आधार पर हुई थी घर में जो खाना पका है वह गाय का मांस है। दूसरी हत्या हुई जब किसान अपने बच्चों को दूध पिलाने के लिए नई गाय खरीद कर ला रहा था। तीसरी हत्या हुई जब एक व्यापारी खरीदी गायों को बेचने जा रहा था। चौथी हत्या तब हुई जब चमड़े का कारोबारी ट्रक में चमड़े ले जा रहा था। पांचवीं, छठवीं, सातवीं…. सिलसिला चल निकला। कबीलों, चरवाहों, गड़रियों और सपेरों के देश में लोगों ने गायों को साथ लेकर आना-जाना छोड़ दिया। अब किसी गैरहिंदू के लिए गाय का साथ जान गंवाने की गारंटी हो गया। गोवंशीय पशुओं का व्यापार बंद हो गया। अब यह व्यापार सिर्फ लाइसेंसी कंपनियां करने लगीं।

यह सब तब हो रहा था जब हिंदुस्तान दुनिया में बीफ निर्यात का कीर्तिमान कायम कर रहा था। बीफ निर्यात पर सवर्ण हिंदुओं का कब्जा था, सो और पुख्ता हो गया। गाय समेत तमाम पालतू जानवर सदियों से हिंदुस्तानियों की जिंदगी में ऐसे मौजूद थे जैसे चेहरे के बीचोबीच नाक मौजूद रहती है। गए जमाने में मुंशी प्रेमचंद का होरी एक गाय के सपने के साथ मर सकता था। मगर अब वह गाय का सपना तभी देख सकता है जब वह गोरक्षकों से प्रमाणित हिंदू हो।

गाय के पीछे अचानक हत्यारे गोरक्षा दल आए और गोपालकों के दिन लद गए। हत्यारों को हत्या का लाइसेंस मिल गया। सरकार ने कातिलों को माला पहनाया। मुर्दों पर मुकदमा दर्ज हुआ। चौतरफा खौफ तारी हुआ। अवाम में डर फैलने लगा कि सरकार बहादुर अन्याय कर रही है। वह भीड़ को शह दे रही है। भीड़ खुद को अदालत समझ रही है। अदालत के बाहर लोगों की हत्याएं हो रही हैं।

विपक्षी सियासतदानों ने सरकार को क्रूर और अन्यायी कहा, वे बोले हम सरकार में आएंगे तो न्याय करेंगे। समय गुजरा, कुछ सूबों के चुनाव हुए और गांधी का बोझ ​लादे विपक्षी सत्ता में आ गए। फिर मुर्दों के खिलाफ अदालत में चार्जशीट जमा हुई। जिन्हें भीड़ ने पीटकर मारा था, पुलिस ने उन्हें भीड़ के हाथों पिटकर मर जाने के जुर्म में दोषी पाया। लेकिन कहानी खत्म नहीं हुई। जुल्म की कहानियां कभी खत्म नहीं होतीं।

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