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हिजाब और बुर्क को निशाने बनाने वाले ‘प्रगतिशील’ लोगो को क्या नगा साधुओं से भी उतनी ही समस्या है ?

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नज़ीर मलिक

सीख समाज में महिलाओं की तरह केश बढ़ाने की परंपरा है। इसकी आलोचना के लिए तमाम आधार है, मगर उसकी आलोचना नहीं होती। (होनी भी नहीं चाहिए) । आदिवासी समाज में बहु विवाह की परंपरा है (उसे कानूनी मान्यता भी है)। एक व्यक्ति एक दर्जन विवाह कर सकता है। वो कर भी रहा है। गोवा में 30 साल की उम्र तक किसी महिला के मां नहीं बनने पर उसे त्याग देने की परंपरा है, इसे भी कानूनी अधिकार दिया गया है। नॉर्थ ईस्ट में गाय का मांस खाने का प्रचलन है, इसे भी कानून ने मान्यता दे रखी है। इनमे सिखों केश बढ़ाने को छोड़ कर सब ही समाज पर दुष्प्रभाव डालते हैं।

हिन्दू धर्म में नगा साधुओं का नंगा रहना और समाज में विचरण करना आज की दृष्ट से घिनावना और समाजद्रोह है। जैन समाज में केश लूंचन प्रगतिशील समाज के लिए अव्यवहारिक तो है ही, उनके साधुओं का नंगा/ दिगम्बर होकर समाज में घूमना बेहद अमानवीय है। नंगा हैं साधु का विधान सभा में भाषण करना तो भारतीय समाज के माथे पर कलंक ही है

भारतीय समाज मै ऐसी तमाम रीतियां, रूढ़ियां हैं जो अप्रगतिशील तो हैं ही, कई तो समाज विरोधी भी हैं। लेकिन प्रायः देखा गया है कि तथाकथित प्रगतिशील ( वास्तविक प्रगतिशील नहीं) लोग इनको न मुद्दा बनाते हैं, न इनका प्रखर विरोध करते हैं। उनका विरोध बुर्का और हिजाब पर ही होता है। बुर्के के खिलाफ उठाए जाने वाले कई सवाल तो फिर भी जायज़ है, लेकिन उनका विरोध हिजाब से क्यों है, ये कोई नहीं बताता है। हिजाब में चेहरा खुला रहता है। पूरे वस्त्र से शालीनता टपकती है, फिर उसका विरोध क्यों?

दरअसल इसके दो कारण हैं एक तो तथाकथित प्रगतिशील लोगों को प्रगतिशीलता झाड़ने के लिए मुस्लिम समाज आसान टारगेट है, दूसरे प्रगतिशीलता की नकाब ओढ़े सांप्रदायिक जनो के लिए ये फायदेमंद धंधा है। हो सकता है कि ये कहते हुए मै ही गलत हूं। यदि हिजाब गलत और समाज पर दुष्प्रभाव डालने वाला है तो कृपया लोग बताए कि क्यों और कैसे? इसके अलावा तथाकथित प्रगतिशील जन ये भी बताए की हिजाब के मुकाबले पोस्ट में उठाए गए अन्य मुद्दों को नज़रंदाज़ करने कि वजह क्या है?

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, ये उनके निजी विचार हैं)