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मेरे देश की सेना के शहीदों को बहुत प्यार के साथ सलाम और उनके पीछे छूट गए बिलखते घरवालों से माफी कि हम …..

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नितिन ठाकुर

जैशे मुहम्मद ने हिंदू कट्टरपंथियों को मुसलमानों से नफरत की एक और वजह दे दी। कोई ठहरकर नहीं सोचेगा कि ढाई हजार जवानों के काफिले पर हमला कायराना हरकत नहीं है, बल्कि ढीठाई से किया गया विस्फोट है। ये भारत की कश्मीर में लगातार सैन्य तैनाती का जवाब है जिसका ज़िम्मेदार जैशे मुहम्मद जैसा पाकिस्तानी पिट्ठू तो है ही, साथ में भारत की सारी सरकारें हैं जो कई दशकों के गुज़रने के बावजूद ना शांति से कुछ सुलझा सकी और ना हिंसा से।

ये कहना कि हम बदला लेंगे कोई बहादुरी की बात नहीं है। सबको पता है कि भारतीय सेना सक्षम है और दस-पांच दिन में ज़िम्मेदार आतंकियों को छीलकर रख देगी। इस सिलसिले में कितने घरों पर रेड होगी, कितने घर तलाशे जाएंगे और कितने ही लोग हिरासत में लिए जाएंगे इसका अंदाज़ा नहीं लेकिन इतना ज़रूर पता है कि इस पूरी कवायद से भड़ककर फिर कोई हथियार उठाएगा और किसी आतंकी संगठन में शामिल होकर सेना के उन जवानों को घात लगाकर मारेगा जो सिर्फ इस देश की असफल सरकारों के हुक्म का पालन कर रहे हैं।

सोशल मीडिया पर जो तमाशा चल रहा है वो अलग ही है। पुलवामा की खबरों पर ऐसी अधिकतर प्रोफाइल ठहाके लगा रही हैं जो अपना ठिकाना कश्मीर बता रही हैं या फिर पाकिस्तान। किसी मुस्लिम नाम की प्रोफाइल शांति बहाली या फिर घटना पर ना हंसने की नसीहत दे रही है तो उसे ट्रोल किया जा रहा है। कोई शिया बताकर डपट रहा है और तो कोई कश्मीर में भारतीय सेना की कथित ज़्यादतियों का पुराण बांचकर उसे इस्लाम से ही खारिज कर दे रहा है। एकाध तो यहूदी और फिलिस्तीन तक का ज्ञान दे रहा है और बाकी को भड़का रहा है। गैर मुसलमानों पर तो खैर गालियां और ताने बरस ही रहे हैं।

इधर कई हिंदू कट्टरपंथियों को देख रहा हूं। आस्तीनें उन्होंने भी चढ़ा ली हैं। “बदला-बदला” तो कर ही रहे हैं, एकतरफा हो कर सारे मुसलमानों और कश्मीरियों को भी शाप दे रहे हैं। सैनिकों की शहादत पर जश्न मनानेवालों के स्क्रीनशॉट लगाकर लोगों को भड़का रहे हैं और जो भी शांति-सौहार्द की बात करते हैं उनके खिलाफ एक मानस तैयार कर रहे हैं। इनकी नाराज़गी भी जैश जैसों पर कम, उन पर ज्यादा है जो “मारो-मारो” के शोर में भी ठहरकर सोचने की वकालत करते हैं। इन फेसबुक वीरों कहना है कि सोचना क्या है, अब तो बस मारो!!

वो भी बिन सोचे कि आखिर इतने दिनों से दोनों तरफ वाले और कर ही क्या रहे हैं? आज जो भी कश्मीर विवाद का हल बातचीत से करने का विचार रखेगा उसे देश और सेना विरोधी कहने का दिन है। जो उधर वालों को समझाएगा की हिंसा इस्लामी कायदे से गलत है उसे मुसलमान मानने से इनकार कर देने का दिन है।

आखिर में भारी दुख, गुस्से और निराशा से मुझे इतना भर लिखना है कि लाशों पर जश्न मनानेवाले या और लाशें गिरने का इंतज़ार करनेवाले गिद्धों से भी गये-गुज़रे हैं। वो कम से कम भूख शांत करने के लिए किसी मरे हुए को नोंचते हैं मगर ये लोग सिर्फ अपनी नफरतों की भूख मिटाने के लिए किसी के बाप-भाई-बेटे- दोस्त को लाश में तब्दील होते देखने की ख्वाहिश रखते हैं। मेरे देश की सेना के शहीदों को बहुत प्यार के साथ सलाम और उनके पीछे छूट गए बिलखते घरवालों से माफी कि हम आपके दुख को समझने और यहां उसके इज़हार के सिवाय कुछ नहीं कर सकते। सिर्फ एक तड़प है जो इस खबर के मिलने के बाद से ही मन उदास कर रही है।

(लेखक युवा पत्रकार हैं)