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सवर्ण आरक्षण और विवादः हार रे! 65 हजार प्रति महीने पाने वाले सवर्ण गरीब

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सिद्धार्थ रामू

65000 प्रति महीन पाने वाले गरीब सवर्णों के पक्ष में खड़ा होकर आपने महान कार्य किया है- मायावती जी, रामदास आठवाले जी, रामविलास पासवान जी, अखिलेश यादव जी, सीताराम येचुरी और डी राजा जी। आप लोगों को बधाई ! आप लोगों ने गरीबों के पक्ष में खड़े होकर फुले, शाहू जी, पेरियार , डॉ. आंबेडकर और कार्ल मार्क्स के सपनों को साकार किया। गरीबों की इस पक्षधरता के लिए इतिहास आपको याद रखेगा।

गरीब सवर्णों के लिए आंसू बहाने के लिए संसद एकजुट हो गई। क्या आंबेडकरवादी और क्या सामाजिक न्यायवादी सब गरीब सवर्णों के लिए रो रहे थे। वामपंथियों आखिर क्यों न रोते, मामला गरीब सवर्णों का था, उनके वर्ग का था। आखिर यही गरीब लोग तो सर्वहारा वर्ग हैं। मीडिया भी गरीब सवर्णों के साथ थी। गरीब के प्रति इतनी दया-ममता बहुत कम देखने को मिलती है। भला हो इन गरीब का !

आईए देखते हैं कि गरीब सवर्ण या जनरल होने का पैमाना सरकार ने क्या तय किया है। प्रति वर्ष आठ लाख से कम आमदनी करने वाले सवर्णों को गरीब माना गया है। इसका मतलब है कि यदि किसी सवर्ण एकल परिवार में प्रति महीने 65 हजार की आमदनी हो रही है, तो गरीब सवर्ण में शामिल। जानकारों का कहना है कि 90 प्रतिशत सवर्ण इस दायरे में आते हैं, इसमें 5 एकड़ जमीन और अन्य पैमाने भी शामिल हैं।

यह वही संसद और सरकारें हैं जिन्होंने गरीबी रेखा 32 रूपए प्रतिदिन तय की है। यानी यदि किसी परिवार में यदि पांच सदस्य है और वे कुल मिलाकर प्रतिदिन 160 रूपया से कम खर्च करते है या प्रति महीने 4800 रूपया से कम खर्च करते हैं, तो वह गरीब हैं। कहां प्रति महीने 4800 रूपये पांच लोगों के परिवार की तय गरीब रेखा और कहां गरीब सवर्णों की 65 हजार प्रति महीने की गरीब रेखा।

(लेखक फॉरवर्ड प्रेस मैग्ज़ीन के संपादक हैं)