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तो क्या प्रधानमंत्री का यह बयान केवल वक्ती तौर पर देश का आक्रोश थामने की एक सतही कोशिश मात्र है?

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पुलवामा हमले के बाद हुए भारी नुकसान का बदला लेने के लिए सेना को ऐक्शन लेने की खुली छूट दे दी गयी है। कब, कहाँ और कैसे कार्रवाई करनी है, अब ये सेना ही तय करेगी। प्रधानमंत्री का ये बयान कल से ही हवाओं में तैर रहा है। चैनल मीडिया वालों के लिए यही बयान संजीवनी बना हुआ है। कल जब पहली बार ये बयान सुना तब भी थोड़ा अटपटा लगा था लेकिन फिर भी लगा कि क्या पता, इस बार शायद हमारे सीने की आग सरकार के सीने में भी धधकी हो। नुकसान बड़ा हुआ है, देश खून खून हो गया है तो प्रधानमंत्री शायद ऐक्शन की मुद्रा अपना रहे हों। लेकिन तभी पता चला कि प्रधानमंत्री तो दिल्ली में हैं ही नही, वे तो झांसी में रैली कर रहे हैं, और लोगों से आशीर्वाद मांग रहे हैं।

जानकर विचित्र लगा। लेकिन फिर सुना कि आज संसद भवन में सर्वदलीय बैठक बुलाई गई है। एक बार फिर लगा कि नही, सरकार वास्तव में सीरियस है। लेकिन फिर उतनी ही गहरी निराश तब हुई, जब देखा कि आल पार्टी मीटिंग में तो राजनीतिक दलों की सेकेंड, थर्ड लेयर लीडरशिप भाग ले रही है और उसकी अध्यक्षता गृहमंत्री कर रहे हैं। प्रधानमंत्री तो अपनी अगली चुनावी रैली के लिए यवतमाल निकल गए हैं। वेदना हुई, मैं सोचता हूँ कि जब देश आंसुओं के सैलाब में डूब रहा हो तो देश के नेता को वे आंसू पोंछते हुए दिखना जरूरी होता है। ऐसे गाढ़े समय मे भी अगर देश का नेता ही अपनी पार्टी का नेता बना रैलियां करता फिर रहा हो तो देश की बाकी फर्स्ट लेयर लीडरशिप से क्या उम्मीद की जा सकती है।

मुझे याद है, जब इंदिरा जी की दुर्भाग्यपूर्ण हत्या हुई थी, तो राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह यमन की यात्रा पर थे। आनन फानन में अपने सारे निर्धारित कार्यक्रम निरस्त करके देश के सारे बड़े नेता दिल्ली पहुंचे और तत्काल आल पार्टी मीटिंग बुलाई गई, जिसमे चौधरी चरण सिंह ने खुद आगे बढ़कर देश का आक्रोश थामने की गरज से तत्काल राजीव गांधी को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाने का प्रस्ताव रखा था। आज चालीस जवानों की सामूहिक हत्या से उपजा राष्ट्रीय रोष किसी भी हाल में किसी प्रधानमंत्री की हत्या से उपजे रोष से कम नही नही है। न तो इन शहादतों का महत्व उससे कम है, न इसका मोल उससे कम है।

आज जबकि देश भर में शहीदों की चिताएं सजी हैं, तब कम से कम एक दिन का राजकीय शोक तो घोषित किया ही जाना चाहिए था। आल पार्टी मीटिंग की अध्यक्षता करने के लिए खुद प्रधानमंत्री को अपने सारे निर्धारित कार्यक्रम निरस्त करके दिल्ली में हर हाल में मौजूद रहना चाहिए था और सभी राष्ट्रीय और क्षेत्रीय राजनीतिक दलों की सर्वोच्च लीडरशिप को मीटिंग में भाग लेना चाहिए था। तब शायद पाकिस्तान को भी स्थिति की गंभीरता का मैसेज जाता और वह यह समझने को बाध्य होता कि भारत ने इस बार खुद को ज्यादा गंभीरता से प्रतिबद्ध किया है। लेकिन यह कड़ा संदेश देने का मौका सरकार ने हाथ से जाने दिया।

तो क्या प्रधानमंत्री का यह बयान केवल वक्ती तौर पर देश का आक्रोश थामने की एक सतही कोशिश मात्र है? क्या यह बयान भी जुमलों की कड़ी का अगला जुमला ही बनकर रह जायेगा? ऐसा हम इसलिए सोच रहे हैं कि हमे मालूम है कि इस वीभत्स और हौलनाक हमले का प्रतिकार क्या होगा, यह तय करना सेना का काम नही है। यह राजनीतिक इच्छाशक्ति का मामला है, यह राजनीतिक जवाबदेही का मामला भी है। टारगेट और लक्ष्यभेद की समयसीमा तय करके सेना को निर्णय बताना देश की राजनीतिक लीडरशिप का काम है। उसका इम्प्लीमेंटेशन करना ही सेना का काम है। इतिहास में इसके सफल उदाहरण भी पहले से मौजूद हैं।

1971 में इंदिरा जी ने सैम मानेक शॉ को बुलाकर अपना फैसला सुनाया, कहा कि मुझे पूर्वी पाकिस्तान मुक्त चाहिए, कितना समय लेते हो? मानेक शॉ ने कहा, 6 महीने। इंदिरा जी ने पूछा,और जल्दी नही कर सकते? सैम बोले, तैयारियों में समय तो लगेगा, लेकिन हमें टाइम लिमिट बता दीजिए। क्या करना है और कबतक करके देना है, ये फैसला आपका। कैसे करना है, ये फैसला मेरा। इंदिरा जी ने कहा, दिसम्बर तक इस दुनिया के नक्शे पर मुझे बांगलादेश चाहिए। मानेक शॉ ने हामी भर दी। और उसके बाद का सबकुछ हमारे गौरवशाली इतिहास का हिस्सा है।

पाकिस्तानी सेना के जनरल नियाजी के नेतृत्व में पाकिस्तान के नब्बे हज़ार सैनिकों को जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के जांबाजों ने आत्मसमर्पण करने पर मजबूर कर दिया और 16 दिसम्बर 1971 को पाकिस्तान दो फाड़ हो गया, दुनिया के नक्शे में एक नए देश बांग्लादेश का उदय हुआ। ऐतिहासिक सफलताएं ऐतिहासिक निर्णयों से मिलती हैं। दुनिया के देशों की किस्मत राजनीतिक फैसले तय करते हैं। दुनिया की राजनीतिक गुत्थियां राजनीतिक इच्छाशक्ति से सुलझती हैं। लोकतांत्रिक समाजों की किस्मत भी राजनीतिक नेतृत्व को लिखनी होती है। अपने मतों की शक्ल में देश राजनीतिक नेताओं को ही अपना विश्वास सौंपता है। सेना तो संविधान की हलफ उठाये राजनीतिक नेतृत्व के प्रति जवाबदेह है। जनता के प्रति जवाबदेही आपकी है प्रधानमंत्री जी। इसलिए देश को बहलाइये मत। तात्कालिक डैमेज कंट्रोल की पॉलिटिक्स मत कीजिये। हौसलामंद फैसला लीजिये और इतिहास में अपना नाम दर्ज कराइये। ज्यादा कुछ न हो सके तो धारा 370 पर ही खेल जाइये। इस राष्ट्रीय विपत्ति की घड़ी में देश की समूची ताकत आपके साथ खड़ी है, आप ही अपने साथ खड़े नही दीखते। लीजिये आपको प्रेरणा देने को चलते चलते इतिहास का एक पन्ना खोल देता हूँ। इसे पढ़िए, मुस्कुराइए और भुजाओं को झटका देकर उठ खड़े होइए।

युद्ध जीतने के बाद जनरल सैम मानेक शॉ एक रोचक संस्मरण सुनाया करते थे, जिसे बाद में उनकी बेटी माया मानेक शॉ ने भी बीबीसी को बताया था। 1947 में दिल्ली स्थित सेना मुख्यालय में मानेक शॉ और याह्या खान दोनों की एक साथ तैनाती थी। मानेक शॉ की मोटर साइकिल बहुत शानदार थी। याह्या खान की उस पर बहुत दिन से नज़र थी। याह्या ने मानेक से उनकी वो मोटर साइकिल खरीदने की अपनी इच्छा कही, लेकिन मानेक अपनी मोटर साइकिल किसी को छूने को भी नही देते थे। उन्होंने याह्या को मना कर दिया। लेकिन बाद में जब देश का बंटवारा हो गया और याह्या खान पाकिस्तान जाने लगे तो मानेक शॉ ने दयार्द्र होकर अपनी प्रिय मोटर साइकिल उन्हें दे दी। दाम तय हुआ 1000 रूपये। लेकिन याह्या उस समय पैसा नही दे सके। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान जाकर वहां से पैसे भेज दूंगा। लेकिन फिर पाकिस्तान से न कभी याह्या की कोई खोज खबर आई न 1000 रूपये का चेक आया।

1971 के युद्ध के समय मानेक शॉ और याह्या खान दोनों अपने अपने देश के सेनाध्यक्ष थे। मात्र तेरह दिन के उस लोमहर्षक युद्ध में सैम की सेनाओं ने युद्धभूमि में याह्या की सेनाओं को धूल चटा दी। नब्बे हज़ार सैनिकों का समर्पण करा लिया। पूर्वी पाकिस्तान टूटकर नया बांग्लादेश बन गया। इंदिरा गांधी को दुर्गा का अवतार कहा गया और ये सारी विजयगाथा इतिहास ने अपने पन्नों पर लिपिबद्ध कर ली। उस पूरे इतिहास को पढ़िए तो किसी पन्ने पर, किसी कोने में सैम मानेक शॉ की वह ठिठोली भी दर्ज मिलनी चाहिए जो उन्होंने मीडिया के सामने ऑफ द रिकॉर्ड कही थी। हंसते हुए मानेक शॉ ने याह्या खान को तंज सुनाया था। सैम बोले- याह्या ने मेरी मोटरसाइकिल के पैसे आजतक नही भेजे। एक मोटरसाइकिल की कीमत साले ने अपना देश देकर चुकाई।

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