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प्रशांत कन्नोजिया का लेखः बाबरी को दोबारा खड़ा कर संविधान को सलामी दी जाए!

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6 दिसंबर बाबरी विध्वंश का दिन है भारत की तारीख में ये दिन काले अक्षर के तौर पर दर्ज है. इसी दिन देश में दो समुदाय के बीच कभी न पटने वाली खाई खोद दी गई थी. ये दिन अंबेडकर पुण्यतिथि की तौर पर भी दर्ज है. आरएसएस ने 6 दिसंबर क्यों चुना ये भी बड़ा सवाल है. आरएसएस ने एक तीर से दो निशाना साधा था ताकि मुसलमानों में खौफ और बहुजनों के नायक अंबेडकर की पुण्यतिथि पर ध्यान हट जाए. आरएसएस के लोग इसे गौरव दिवस के रूप में मनाते है. यानी संविधान का उल्लंघन पर नंगा नाच है.

बाबरी मस्जिद 450 साल से स्थापित है. बाबर का राज 1526 से 1530 था. तुलसीदास ने 1570 के आसपास रामचरित मानस अयोध्या में बैठकर लिखा. वो राम को अपना पहला प्रेम मानते थे. तो कोई भक्त ऐसा हो सकता है कि उसके आराध्य का मंदिर तोड़ा गया हो और वो उसके बारे में न लिखे? रामचरित मानस में यह बात कहीं दर्ज नहीं है.

बाबरी मस्जिद का जो विवाद सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है वो आस्था का मामला नहीं बल्कि ज़मीन के मालिकाना हक का विवाद है. मीडिया इसे बार-बार आस्था का मामला कहकर गुमराह कर रहा है. सवाल ये नहीं है कि वहां क्या था सवाल ये है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद भी बाबरी गिरा दी गई. सवाल ये है कि अदालत के आदेश का उल्लंघन करने पर सजा क्यों नहीं मिली? सवाल ये है कि एक इतिहासिक इमारत गिरा दी गई उसके गुनहगारों को सजा क्यों नहीं मिल रही है? देश में 15% जनसंख्या में खौफ पैदा करने की कोशिश हो रही है. 6 दिसंबर को सिर्फ बाबरी पर हमला नहीं बल्कि 15% अल्पसंख्यक समाज पर हमला था. एक अच्छा लोकतंत्र अपने कमजोर नागरिकों के हितों को सर्वप्रथम रखता है. एक अच्छा लोकतंत्र अपने कमजोर नागरिकों को अधिकार दिलाने के लिए हर एक नया आयाम तलाशता है और हर टूल को इजात करता है, जिससे उसके कमजोर नागरीकों को अधिकार प्राप्त हो सके.

एक भारतीय नागरिक होने के नाते और संविधान में विश्वास करने वाले के नाते मैं चाहता हूं कि अयोध्या में न अस्पताल बने, न यूनिवर्सिटी बस वहां दोबारा बाबरी मस्जिद का निर्माण होना चहिये. उसकी पहली अज़ान और पहली नमाज़ लोकतंत्र को सीना चौड़ा करके सलाम करेगी और यही भारत देश की और 5000 साल पुराने सभ्यता की जीत होगी.

(लेखक युवा पत्रकार हैं)