Home पड़ताल नज़रियाः #Metoo कैम्पेन भी सामाजिक न्याय की ही एक बड़ी लड़ाई है

नज़रियाः #Metoo कैम्पेन भी सामाजिक न्याय की ही एक बड़ी लड़ाई है

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प्रशांत टंडन

सत्ता भ्रष्टाचार पैदा करता है और सत्ता के केंद्र में पहला अनैतिक काम जो कदम रखता है वो यौन शोषण ही होता है। राजनीतिक, मीडिया, धार्मिक, एनजीओ, कॉर्पोरेट हर तरह की सत्ता में ये बीमारी देखी गई है।मीडिया जगत की जो कहानियां #metoo कैम्पेन के तहत पढ़ी वो बिलकुल भी नई नहीं है। क्लबों, न्यूज़रूम की खुसफुस, दफ्तरों के स्मोकिंग कॉर्नर में ये कहानियां चटखारे लेकर कर सुनी और सुनाई जाती रहीं हैं फर्क सिर्फ दो हैं अब आने वाली कहानियों में। इस बार ये कहानियां खुद वो सुना रहे हैं जो इस हिंसा के शिकार हुये हैं और अब ये किसी गॉसिप के शक्ल में नहीं हैं बल्कि उसमे भयानक तकलीफ, बेचैनी और गुस्सा है।

कितने ही करियर बर्बाद हुये हैं, कितनी ही प्रतिभाशाली पत्रकारों ने नौकरियाँ छोड़ी हैं और न जाने क्या क्या कीमत चुकाई है उस बहुत ज़रूरी न कहने पर। सोचिये एक रिपोर्टर किसी मंत्री या अफसर से कितनी बेबाकी से सवाल पूछती है, उसके लिखे पर संसद में हंगामा हो सकता है लेकिन वही रिपोर्टर दफ्तर के अंदर कितनी बेबस है, किस किस तरह अपने को बचाती है। एम जे अकबर तो कुख्यात रहे हैं इस मामले में और भी कितने ही हैं।

आज हिम्मत जुटा कर अगर वो सब लिख रहीं हैं जो उनके साथ घटा तो समझिये कि वो मानवता पर एहसान कर रहीं हैं। और मर्दों को ये ज़रूरी सूचना भी कि वक़्त है अब भी होश में आ जाओ।

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मीडिया जगत में महिला और पुरुष सहयोगियों में करीबी रिश्ता होता है, साथ साथ काम करना होता है और इस दिन रात के साथ में हंसी-मज़ाक, लड़ाई झगड़े, आगे निकालने की होड़, अनुशासन लागू करना सब कुछ आता है बारी बारी लेकिन हर अवस्था की एक लक्ष्म्ण रेखा होती है और हर व्यक्ति चाहे वो महिला हो या पुरुष अच्छी तरह जानता है कि कब उसे वो लांघ रहा है।

मैंने लंबे समय तक मीडिया में जिम्मेदार पदों पर काम किया है। सकड़ों भर्तियां भी की हैं, प्रमोशन भी दिये हैं और कई बार नहीं भी, ज़रूरत पड़ने पर अनुशासन भी लागू किया है लेकिन ये सब एक लक्ष्म्ण रेखा के भीतर रह कर। ये कोई बहुत मुश्किल काम नहीं है। हां कुछ कभी नाराज़ भी हुये होंगे, कभी मैं भी गलत रहा हूंगा, मेरे भी फैसलों में कभी पसंद और नापसंद हावी हो सकती है लेकिन इंसानी हद पार की हो ऐसा कभी नहीं हुआ। बात छोटी सी है अपने अंदर भी एक विशाखा कमेटी बना लेनी चाहिये।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)