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प्रशांत टंडन का लेखः राम जन्मभूमि सिर्फ एक मुकदमा है, ये न आंदोलन बचा है और न ही चुनाव का मुद्दा

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2019 के चुनाव के वक़्त 65 फीसद मतदाता की उम्र 35 वर्ष या इससे कम होगी. जो आज 35 वर्ष का है वो 6 दिसंबर 1992 को ये कोई सात साल का रहा होगा. इससे कड़ी में 55 फीसद मतदाता का जन्म 6 दिसंबर 1992 के बाद का है. उसने वो देखा ही नहीं जो उस वक़्त घटा. इन दो आंकड़ों को रामजन्म भूमि के चुनावी असर का विश्लेषण करते वक़्त अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है और 1989 और 1992 के बीच अयोध्या और देश में जो हुआ उसी को रिफ्रेंस प्वाइंट मान लिया जाता है. पत्रकार ये गलती करते हैं पर मोदी और बीजेपी अयोध्या के भंवर में नहीं फसते हैं.
2014 के चुनाव प्रचार में मोदी अयोध्या नहीं गए और न ही एक भी भाषण में राममंदिर का मुद्दा उठाया. प्रधानमंत्री रहते हुये भी अयोध्या नहीं गए. 2017 के उत्तर प्रदेश के चुनाव में बीजेपी ने बिना राममंदिर के ही प्रचंड बहुमत ले लिया. मोदी ने बेशक ध्रुवीकारण का कार्ड खेला. श्मशान – कब्रिस्तान और दिवाली – ईद आए उनके भाषणों में पर अयोध्या से फिर भी दूर ही रहे.

काठ की हांडी: 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद ढहाये जाने के बाद देश भर में दर्जनों शहरों में दंगे हुये. कोई 2000 जाने गई इन दंगो में – अकेले मुंबई में ही 800 लोग मारे गये. इसके पहले दो साल राम शिलाओं का सिलसिला चला. शहर शहर कारसेवक राम शिलाये ले कर अयोध्या की तरफ चल पड़े थे. रास्तों में इनके खाने पीने और ठहरने की इंतजाम होता था. सड़क पर ट्रैफिक रोक कर आरतियाँ होती थी. शहर में चारों तरफ लोग घरों की छत पर खड़े होकर घंटे,घड़ियाल और शंख बजाते थे. इसके बावजूद मंडल ही भारी पड़ा था. 1993 में उत्तर प्रदेश में एसपी-बीएसपी की सरकार बन गई थी. 1996 में केंद्र में भी बीजेपी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला था. काठ की हांडी एक ही बार चढ़ी और वो भी आधी अधूरी ही खिचड़ी बना पाई.

1989 से शुरू हुई मंडल की राजनीति की अब दूसरी पीढ़ी आ चुकी है और स्थापित भी हो गई है. दलित चेतना में भी इन तीन दशकों में भारी इजाफा हुआ है. ये दोनों वर्ग राम जन्मभूमि आंदोलन को ब्राह्मणवादी वर्चस्व को बनाये रखने की कवायद के रूप में देखते हैं. इसी वजह से आरएसएस राम मंदिर का आंदोलन ज़मीन पर दोबारा नहीं खड़ा कर पाई. अब जो होता है वो सिर्फ बयानबाजी है.

बीजेपी के मेनिफेस्टो में भी राम मंदिर पर गंभीरता का ग्राफ चुनाव दर चुनाव नीचे ही गिरता गया है. 2014 के 42 पेज के मेनिफेस्टो में पेज नंबर 41 पर राममंदिर एक वाक्य की रस्म अदायगी तक ही रह गया.

1996 मेनिफेस्टो: अयोध्या में भव्य राम मंदिर का वादा.

1998 मेनिफेस्टो: रजामंदी और कानून के दायरे में राम मंदिर का निर्माण का रास्ता साफ करने का वादा.

2004 मेनिफेस्टो: अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण की प्रतिबद्धता

2009 मेनिफेस्टो: बातचीत के और अदलात की कार्यवाही के ज़रिये अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के लिए रास्ता बनाने का वादा

2014 मेनिफेस्टो: संविधान के दायरे में अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण की संभावनायें तलाशने का वादा.

क्यों बचते हैं मोदी राम मंदिर से:

पहला कारण है कि राम मंदिर एक स्पष्ट वादा है जिसे पूरा करना होगा. उत्तर प्रदेश और केंद्र में बहुमत की सरकार के बाद इस पर किसी और दल पर दोषारोपण की गुंजाइश नहीं है. लेकिन कानून और अदालत के रास्ते इसकी कोई समय सीमा नहीं तय की सकती है. कानून के दायरे के बाहर ये रास्ता जोखिम भरा है. शिवसेना और अकाली दल को छोड़ कर सभी सहयोगी छिटक जायेंगे. इस जोखिम को उठाने के बाद भी ये विश्वास बीजेपी में नहीं है कि वो अकेले सत्ता में आ जाएगी.

दूसरा कारण ज्यादा अहम है. जब से मोदी ने दिल्ली का रुख किया है उन्होने बीजेपी के नेरेटिव को अपने कब्जे में रखा है. मंत्री, नेता, प्रवक्ता, पिछलग्गू टीवी चैनल, आईटी सेल, ट्रोल सब वही बोलते हैं जो मोदी और अमित शाह चाहते हैं. कौन मुद्दा कब आयेगा, कितना उछलेगा, किस पर कैसा बचाव करना है, किस पर हमला बोलना है सब एक ही जगह से तय होता है. राम मंदिर अगर केंद्रीय मुद्दा बनता है तो नेरेटिव मोदी के कंट्रोल से बाहर चला जागेगा. धर्म संसद, अखाड़े, विश्व हिन्दू परिषद, शंकराचार्य, किस्म किस्म के साधू सन्यासी, तोगड़िया और तमाम लोग अलग अलग भाषा बोलेंगे. ये सब लोग न्यूज़ में मोदी को मिलने वाला स्पेस कम करेंगे और आये दिन नये विवादों को जन्म देंगे. मोदी के लिए सरकार की साख और नेरेटिव को कंट्रोल में रखना दोनों चुनौती भरे काम होंगे.

प्रशांत टंडन वरिष्ठ पत्रकार

इन कारणों की वजह से राम मंदिर के निर्माण के लिये कानून या ऑर्डिनेंस की बात भी शिगूफ़ा लगती है. अयोध्या से दूर भागने का सबसे बड़ा कारण है समाज में इस मुद्दे के प्रति उदासीनता. देश के युवा को जो बाबरी मस्जिद के गिराये जाने के वक़्त था ही नहीं इसमे दिलचस्पी नहीं दिखाई देती है.

पाँच साल के गूगल सर्च के ट्रेंड इसकी गवाही दे रहे हैं. राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद दोनों ही विषयों पर इन्टरनेट ट्रैफिक सिर्फ 6 दिसंबर के आस पास की तारीखों या अदालत की सुनवाई के दौरान ही बढ़ता है. ये भी मुख्य तौर पर समाचार माध्यमों की वजह है. आर्थिक हालात और घोटालों से ध्यान बटाने के लिये मोदी अगर अयोध्या जाने पर मजबूर होते हैं तो भी इस बात की गारंटी नहीं है कि अयोध्या से वो वापिस दिल्ली आ पाएंगे.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)