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प्रेम प्रकाश का लेखः कोई सच कहने वाला है? है कोई सच कहने वाला?

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इस एक घटना के बाद मेरा अपने समाज के प्रति नजरिया बदल गया.बात ज्यादा पुरानी नही है.फिर भी बीस साल तो हुए ही होंगे.इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद हम गाँव पर आ डंटे थे.परिवार छितरा गया था.चाची की आकस्मिक मौत ने सब कुछ बिखेर कर रख दिया.तीसेक सदस्यों वाले हमारे संयुक्त परिवार की एक बड़ी धुरी थी वो..सच कहें तो चाची के बल पर ही हम लोग पढ़ लिख पाए.उन्होंने घर संभाला और हम सभी ने परदेस में अपना-अपना काम पूरा किया.बड़ों ने नौकरी-चाकरी और बच्चों ने पढ़ाई लिखाई..चाचा भी सरकारी नौकरी में थे,लेकिन वे उनके साथ भी नही गयीं..खेतीबारी प्रायः अधिया बटइया पर चली गयी थी.लगभग सभी के बाहर रहने का एक कुपरिणाम ये हुआ कि हमारी कई सारी ज़मीनें हमारी नही रहीं.लोगों ने कब्जे कर लिए.खलिहान,चकआउट्स,और गाँव-समाज की हमारे नियंत्रण की ज़मीनें,जैसा कि गाँवों में अक्सर होता है,हमारी नामौजूदगी में लोगो ने हथिया ली थी.

हमारे गाँवों में गजब-गजब की प्रवृत्तियां आज भी पल रही हैं.वैसे अंतहीन लालच और कब्जेदारी के ऐसे नमूने शहरों में भी बहुत मिलते हैं..लेकिन गाँवों में तो ज़मीने गजब-गजब ढंग से कब्ज़ा ली जाती है.अगर किसी की खेती नही हो रही है और वो परदेसी भी है तो बगल वाले की किस्मत जाग जाती है.वो दोनों चकों की कॉमन मेड की अपनी ओर से खूऊऊऊऊब छंटाई करता है..और ऐसा वो हर साल नही,हर फसल में करता है,.बाकी तरफ की मेड़ों को भले 10-5 साल न छुए लेकिन कॉमन वाली मेड पर उसको खूब दुलार आता है.काटेगा,छांटेगा,खुरचेगा,इधर की मिटटी उधर करेगा और घंटों यहाँ से वहां पसीना बहायेगा.कुल मुलाकर 1-2 इंच मेड को आगे खिसका देगा. धान के सीजन में जब बारिश होती है और खेतों को बनाया जाता है,मेड़ों को एलानिया तौर पर संवारा जाता है तब बड़े-बड़े चक्के काट कर मेड बनाते हुए वो करीब करीब एक नई मेड ही बना डालता है और इस तरह पूरी लम्बाई में करीब करीब आधा फुट ज़मीन तो बन ही जाती है.अगर कोई दस साल परदेस रह गया और उसकी खेत की रखवाली करने वाला कोई नही है तो लौट कर पता चलता है कि 10-5 बिस्सा खेत तो गायब ही है..मामले खड़े होते हैं,मुकद्दमे चलते हैं लेकिन हमारा ग्रामीण जीवन चल इसी शान से रहा है.

खिसकती हुई मेड़ों की यह कहानी हमारे गाँवों में बाबा आदम के ज़माने से चल रही है.अगर 2-4 पीढ़ी बाद घाना, मॉरिशस या सूरीनाम जैसे देशों से लौटकर आने वाले भारतीयों को उनकी खेती ही नही,उनके गाँव भी प्रायः नही मिलते हैं तो इसीलिए नही मिलते हैं..लोग कब्ज़ा कर लेते हैं.मेड की तो छोडिये,खेत के खेत खिसक जाते हैं साहब.गाँव के गाँव घूरगड्ढों में चले जाते हैं.

नैतिकता इस देश का बस मानस-मूल्य ही बनकर रह सकी है,मानव मूल्य नही बन पायी है अभी.हम लोग लालची होते हैं और लालच भी पूरी धूर्तता के साथ करते हैं.ऐसे ही नही हुआ था कि 94-95 के दिनों में मुझे याद है जब गोरखपुर में एक ज़मीन की पैमाइश करते समय लेखपाल की जंजीर कमिश्नर के बंगले में घुस गयी थी.पता चला,कुछ दिन लोग नही रहे तो सरकार बहादुर ने ही उस पर कमिश्नर का बंगला बनवा दिया.ज़मीनों के लाखों लाख ऐसे मुकद्दमे भारत की अदालतों में बीस-बीस साल से चल रहे हैं और ये हम तीसों साल से देख रहे हैं.इन मामलों के निर्णय आसान हैं भी नही.इतने दिनों में कई सच बदल जाते हैं,कई लोग बदल जाते हैं,कई पीढियां बदल जाती हैं,कई ज़मीने बदल जाती है,कई गाँव बदल जाते हैं.

खैर,लौटें गाँव की तरफ और चलें उस खेत की तरफ जहाँ कॉमन मेड बड़े सलीके से काटी जा रही होती है.अगर आपने पूछ दिया की ये क्या कर रहे हो यार…तो वो कहेगा खेत को दुलहिन बना रहे हैं यार…तीन तरफ की उसकी मेड़ें घास फूंस उगाये भूतनी बनी रहेंगी लेकिन चौथी मेड को वो दुलहिन बनाये रखता है.क्योंकि दुलहिन के उस तरफ वाले मौजूद नही होते हैं.वो अगर मौजूद होते तो वो भी अपनी तरफ से काटते और दोनों तरफ से कट कर मेड पतली हो जाती..और तब आने जाने वाले चार ठो गालियाँ सुनाते हुए गुज़र जाते.दो काश्तकारों के चकों के बीच से गुजरने वाली कॉमन मेड को किसी भी तरह काटना-छांटना गाँव के संविधान में गुनाह माना जाता है.और यह गुनाह हमारे गाँवों को तबाह कर रहा है.हालांकि अब इस तबाही को बढ़ते हुए बाज़ार ने काफी हद तक रिप्लेस कर दिया है.अब तो हमारे गाँवों में घुसता हुआ बाज़ार अपने आप में एक तबाही है.

ऐसे ही एक मामले में,जब खेती शुरू की तो हम अपनी ज़मीन खोज रहे थे.हमारा खलिहान गायब हो गया था.बात-चीत शुरू हुई प्रेम से और बात-चीत से ही काम निकल जाय,ऐसा शुरू से ही स्वभाव रहा है.लेकिन कोई कान देने को तैयार ही न हो.सीधा और रटा-रटाया जवाब मिलता था.ये तो हमारा है भइया,आप अपना खोज लीजिये.थोडा ज्यादा बात की तो लोगो ने तेवर भी दिखाए.लोग जुटे,गाँव जुटा..बात फैली तो टुकडो-टुकड़ों में चौपालें लगने लगीं.एप्लीकेशन दिया तो एसडीएम के सीधे आदेश से नाप-जोख कर खलिहान तो निकल आया..लेकिन अब दबंगई शुरू हुई.कब्ज़ा दिलाना लेखपाल का काम थोड़े ही है.वैसे भी ये लेखपाल नाम का प्राणी अगर किसी गाँव में दिख जाय तो आस पास के 4-6 गाँवों के लोगों के लिए एक काम निकल जाता है.सारा काम धंधा छोड़ के अमेरिका तक की राजनीति पर चोकरने वाले चौधरी लोग लेखपाल के इर्द-गिर्द जमा हो जाते हैं.उस एक ज़मीन पर 100-100 साल के इतिहास बखान होते हैं.बहरहाल,नाप जोख कर के लेखपाल अपने घर गया तो काबिज ने कहा-नही देंगे ज़मीन.हम इतने साल से काबिज हैं,छोड़ दें क्या….??? जाइए जो करना हो कर लीजिये.

कुल मिलाकर हुआ ये कि थाना-पुलिस होने से पहले हमने पंचायत बुलाई और आसपास के गाँवों के सैकड़ों चौधरी इकठ्ठा हुए.पंचायत के सरपंच हुए बुज़ुर्ग वासुदेव यादव..मै सरपंच के चयन से एक दूसरी वजह से खुश था.जाति व्यवस्था में जकड़े इस देश में मैंने अपने गाँव को एक नया संस्कार जीते हुए देखा..मै इस बात की प्रशंसा करता हूँ.ये सवर्ण बाभनों की पंचायत थी,जिसकी सदारत एक पिछड़ा अहीर कर रहा था.मुझे यह सीन बड़ा अच्छा लगा.एक तो वे बुज़ुर्ग थे,दूसरे वासुदेव यादव मेरे गुरु भी थे.उन्होंने मुझे जूनियर क्लासेज में पढाया था.तय पाया गया कि मन की हिंसा से भरे हुए शारीरिक हिंसा को उद्यत्त इन लालची और झगडालू बाभनों का झगडा मिटाने का सामर्थ्य एक शिक्षक में ही हो सकता है.पंचायत शुरू हुई लेकिन क्या कहूँ,एक से एक कूटनीतिक और दांव-पेंच से भरी बातें.एक से एक गड़े हुए इतिहासों के मुर्दे,एक से एक कहानियाँ और एक से एक बातों की बाज़ीगरी का दृश्य देखते ही बनता था.कुल मिलकर सभापति ने एक फैसला तो दिया.लेकिन सम्बंधित पक्ष ने उसे स्वीकार नही किया.अंततः बात थाना पुलिस होते हुए कोर्ट कचहरी तक पहुंची और दोनों पक्षों के लोगों को ज़मानत करानी पड़ी.आजिज आये झगडालुओं को आखिर समझौते की मेज पर आना पड़ा.ज़मीन के बदले ज़मीन दी गयी..और मैंने देखा है-विवाद चाहे किसी भी किस्म का हो,किसी भी स्तर का हो,उसका सम्मानजनक समाधान समझौते की शक्ल में ही संभव होता है..हम लोगों ने भी ले दे कर समझौता कर लिया.

लेकिन जो एक बात कहने-सुनने के लिए मुझे इतना लिखना और आपको इतना पढना पड़ा,वो ये कि उन दिनों जब खलिहान तलाशी का हमारा ये मामला चल रहा था तो बाबूजी को अक्सर बहुत छुट्टी लेनी पड़ती थी.वे पुलिस में थे.घर आते तो मुझसे कहते-चलो,कहीं सही बोलने वाला आदमी खोजें…पहले तो हम लोग हंस पड़े.लेकिन बाद में वे जिद्द पर अड़ गये कि मुझे एक आदमी तो ऐसा ज़रूर खोजना है,जो इस मामले में केवल सच बोल दे.कहते थे कि इस मामले को जानने वाले हज़ारों लोग अभी जीवित हैं.कोई तो आकर सिर्फ इतना बोले कि ये मेरा खलिहान था या नही.खलिहान तो वैसे भी नम्बर की ज़मीन होती है….कोई तो सच बोल दे कि हाँ,10 साल पहले यहाँ आपका खलिहान था.बाबूजी की ये जिद्द लिए हम उनके साथ लिटरली मोटरसाइकिल लेकर गाँव गाँव घूमते थे.परिचित,अपरिचित सबके यहाँ जाते थे.और ये चुटकुला वे ज़रूर छोड़ते थे कि आपके गाँव में कोई सच बोलने वाला है..?? फिर उसको पूरा मामला समझाते,शुरुआत में हमने तमाम ऐसे लोगों को मौके पर बुलाया,जो इस मामले का आदि-अंत जानते थे.लेकिन शुरू हो जाती थी वही गंवई कूटनीतिक दांव-पेंच से भरी बाते.चार लाइन ऐसी बोली जो मुझे अच्छी लगे और चार लाइन ऐसी बोली जो,उनको अच्छी लगे और इसके बाद चलते बने.उलझाव भरी बातें,चालाक बातें.डिफेंसिव बातें,मीठी-मीठी बातें करने वाले सचमुच हज़ारों मिले लेकिन खरी और सच्ची बात कहने वाला बाबूजी को एक भी आदमी नही मिला.और ये तब था,जब आड़ में सब सच बोलते थे.बस समस्या इतनी थी कि समाज मे सच नही बोलना है,सबके सामने सच नही बोलना है..

सोचता हूँ न जाने कब सबके सामने सच बोलने वाला हौसला पायेंगे हम,आप,सभी…..हम जिस दुनिया में रहते हैं,उस दुनिया में इसी ‘आड़’ के कारण अंधेरों के सच ज्यादा होते हैं और उजालों के सच दम तोड़ देते हैं और फिर वे अपने ताबूत भी खुद ही बन जाते हैं.इस दुनिया में जितनी भी पीडाएं हैं, उन सब के पीछे यही एकांत का सच खड़ा है.मनुष्य कभी इतना दुस्साहसी नही हो पाया कि वो खुद से भी सच न बोल सके..असल में खुद के सामने तो झूठ रह ही नही जाता,लेकिन आदमी अभी इतना नैतिक भी नही हो पाया है कि खुद से बोल पाने वाला सच सबके सामने भी बोल सके….सबके सामने मतलब सबके सामने.जे.कृष्णमूर्ति कहते हैं-यू आर नो बडी…गांधी कहते हैं-सत्य ही मेरा ईश्वर है.मुझे लगता है कि इन दो वाक्यांशों का अर्थ समझ लें,तो दुनिया को कुछ भी पढने समझने की ज़रुरत नही है.जहाँ जाकर सारा पढना और समझना चुक जाता है,ये दो वाक्यांश उसके बाद के धरातल से बोले गये हैं.मानवता को यह अद्भुत देन है इन मनीषियों की।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, ये उनके निजी विचार हैं)