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राफेल घोटालाः यदि समय पर सौदा हो गया होता तो आज ये उन्नत विमान हमारी वायुसेना में शामिल होते।

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ध्रुव गुप्त

दो दिनों तक लोकसभा में राफेल विवाद पर सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों को सुनने के बाद समझ यह बनती है कि इस मामले में कमोबेश कांग्रेस और भाजपा दोनों ही कठघरे में हैं। वायुसेना की तत्काल मांग को देखते हुए 2004 में आई कांग्रेस सरकार ने 526 करोड़ प्रति विमान की दर तय कर फ्रांस से 126 राफेल विमान खरीदने का मसौदा तैयार किया। वायुसेना की तत्काल ज़रूरतों और सुरक्षा की अनदेखी कर कांग्रेस सरकार 8-10 साल तक प्रक्रियाओं में ही उलझी रही और अपने कार्यकाल में इस सौदे को अंतिम रूप नहीं दिया।

यदि समय पर सौदा हो गया होता तो आज ये उन्नत विमान हमारी वायुसेना में शामिल होते। क्या कांग्रेस सरकार को सौदे में किसी बिचौलिए के आने की प्रतीक्षा थी ? वैसे भी मनमोहन सिंह की ‘ईमानदार’ सरकार गठबंधन धर्म के नाम पर भ्रष्टाचार से आंख मूंद लेने के लिए कुख्यात रही थी। सत्ता में आने के बाद भाजपा की सरकार ने 2016 में इस सौदे को अंतिम रूप दिया, लेकिन यह सौदा आज कई गंभीर सवालों के घेरे में है। पहला यह कि एक विमान की कीमत कुछ ही सालों में 526 करोड़ से 1600 करोड़ कैसे हो गई ? सरकार का तर्क यह है कि कांग्रेस की डील में सिर्फ विमान की कीमत शामिल थी। मोदी जी की डील में विमान के साथ मेटिओर और स्कैल्प जैसी खतरनाक मिसाइलों के अलावा स्पेयर पार्ट्स, हैंगर्स, ट्रेनिंग सिम्युलेटर्स, ऑन बोर्ड ऑक्सीजन रिफ्यूलिंग सिस्टम भी शामिल हैं।

इस विषय पर रक्षा विशेषज्ञों को ही कुछ बोलने का अधिकार है, लेकिन यह सवाल तो उठता ही है कि यदि हमें मिसाइलें और उसके पार्ट्स भी फ्रांस से ही लेने थे तो हमारे वैज्ञानिकों ने पृथ्वी, अग्नि और आकाश मिसाइलों की लंबी श्रृंखला क्या गणतंत्र दिवस के परेड में विदेशी मेहमानों को दिखाने भर के लिए बनाई है ? दूसरी आपत्ति यह है कि यदि ये विमाम देश की सुरक्षा के लिए इतने ही ज़रूरी थे तो वायुसेना की ज़रूरतों की अनदेखी कर इनकी संख्या 126 से घटाकर 36 क्यों कर दी गई ? तीसरा बड़ा सवाल यह है कि दशकों से विमान निर्माण में महारत प्राप्त सरकारी उपक्रम हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड को अंतिम समय में परिदृश्य से हटाकर अनिल अंबानी की अनुभवहीन कंपनी को ऑफसेट पार्टनर के तौर पर शामिल करने का समझौता किसके दबाव में किया गया ? देश की जनता को इन सवालों का जवाब जानने का हक़ है।

इस पूरे प्रकरण की संयुक्त संसदीय समिति द्वारा जांच ही पर्याप्त नहीं। यह समिति उसके सदस्यों की राजनीतिक प्रतिबद्धताओं से निर्देशित होती है। सच तभी सामने आएगा जब सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में पूर्व और वर्तमान जजों की एक समिति कांग्रेस के कार्यकाल से लेकर अभी तक राफेल मुद्दे पर की गई तमाम कार्रवाई और अपनाई गई तमाम प्रक्रियाओं की जांच कर सच्चाई देश के सामने लाए।

(लेखक पूर्व आईपीएस हैं, ये उनके निजी विचार हैं)