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राजस्थान चुनावः क्या शेखावाटी में किसान राजनीति का सियासी शून्य भर पाएंगी अन्तर्राष्ट्रीय खिलाड़ी एंव किसान नेता कृष्णा पूनिया?

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शरीफ मोहम्मद खिलजी

राजस्थान विशेषकर शेखावाटी की राजनीति में हमेशा से किसान  सियासत का बड़ा महत्व रहा है। पूर्व केन्द्रीय मंत्री एवं पद्मश्री शीशराम ओला के इंतकाल के बाद शेखावाटी की किसान  राजनीति में सियासी शून्य कायम हो गया।शेखावाटी में किसान ताकतवर कौम होने के बाद भी उन्हें वो महत्व नहीं मिला जिसकी ये उम्मीद लगाए बैठें थे।स्वर्गीय शीशराम ओला के देहावसान के बाद पैदा हुए सियासी शून्य को भरने के लिए क्षेत्र की किसान कौम  अन्तरराष्ट्रीय खिलाड़ी एवं पद्मश्री कृष्णा पूनिया से उम्मीद लगाए बैठी है।

देश को आजादी मिलने के बाद राजतंत्र समाप्त हुआ और लोकतंत्र की स्थापना हुई। सामंती-जमींदारी खत्म होने के बाद राजपूत वर्ग कांग्रेस के खिलाफ हो गए तो किसान वर्ग  अपनी जमीन वापस मिलने पर कांग्रेस के साथ खड़े हो गया। राजस्थान विशेषकर शेखावाटी अंचल में  कांग्रेस की सरकारों में किसान वर्ग ने अपनी राजनीति खूब चमकाई।विशेषकर शेखावाटी और मारवाड़ इलाके में कांग्रेस पार्टी के टिकट पर किसान वर्ग से विधायक और सांसद का चुनाव जीतते रहे।

राजस्थान में किसान वर्ग को राजनैतिक एवं सामाजिक पहचान दिलाने में बलदेव राम मिर्धा को बड़ा श्रेय जाता है।50 के दशक में मारवाड़ किसान सभा बना कर मिर्धा ने कांग्रेस के समानांतर संगठन खड़ा करने का प्रयास किया।लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू ने बलदेव राम मिर्धा से मध्यस्थता कर भूमि सुधार से जुड़े अहम निर्णय लिए. जिसके बाद मारवाड़ किसान सभा और कांग्रेस की राह एक हो गई और सामंती-जमींदारी प्रथा के खिलाफ राजस्थान में किसान वर्ग कांग्रेस के झंडे तले लामबंद हो गए। बलदेव राम मिर्धा परिवार के दो सदस्य रामनिवास मिर्धा और नाथूराम मिर्धा के समय किसान राजनीति शिखर पर पहुंची।

राजस्थान का नागौर जिला इन्हीं के चलते हमेशा से किसान राजनीति का सियासी केंद्र बना। मिर्धा परिवार की राजनीतिक हनक का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि आपातकाल के बाद जब कांग्रेस का उत्तर भारत से सफाया हो गया, तब विधानसभा चुनाव में मारवाड़ की 42 सीटों में से कांग्रेस ने 26 सीटें जीत दर्ज की थी।मिर्धा को कभी ऊम्र आड़े नहीं आई। अपने अंतिम चुनाव में खाट पर मरणासन्न अवस्था में होने की वजह से वोट मांगने के लिए वे कहीं नहीं गए लेकिन भारी फासले से जीते थे।

2009 के संसदीय चुनावों में उनका नाम जरूर चला—बाबा री पोती, नागौर री ज्योति. इस स्लोगन से ज्योति मिर्धा पर बाहरी या पैराशूटी नेता होने का दाग नहीं लगा और वे मजे से जीतीं। इसी प्रकार शेखावाटी में स्वर्गीय शीशराम ओला किसान वर्ग के बड़े नेता रहें। राजस्थान  में नागौर, सीकर, चुरू, झुंझुनूं को शेखावाटी के नाम से जाना जाता है। राजस्थान की राजनीति में इसे किसान बेल्ट (जाट बेल्ट) कहा जाता है। किसान वर्ग का यंहा करीब 30 सीटों पर खाशा प्रभाव है।

 

किसान नेता शीशराम ओला, शेखावाटी के भीष्म पितामह

स्वर्गीय शीशराम ओला शेखावाटी के एक ऐसे नेता रहे हैं जिन्हें सदैव किसानों के सच्चे हितैषी के रूप में याद किया जाता रहेगा। झुंझुनू लोकसभा क्षेत्र से लगातार पांच बार चुनाव जीतकर रिकॉर्ड बना चुके ओला का राजनीतिक जीवन 1957 से शुरू हुआ था। ओला का  जन्म 30 जुलाई 1927 को राजस्थान के झुंझुनू जिले के अरड़ावता गांव में किसान मंगलाराम के घर हुआ था। आर्थिक अभाव के कारण शीशराम ओला ने मैट्रिक की पढ़ाई करने के बाद भारतीय सेना में भर्ती हो गये। उन्होंने सेना की ओर से द्वितीय महायुद्व में भाग लिया। उस समय समाज में महिलाओं की स्थिति अच्छी नहीं थी जिसका मूल कारण था महिलाओं का अशिक्षित होना। समाज में महिलाओं की दशा सुधारने का संकल्प कर ओला ने सेना से त्यागपत्र देकर समाजसेवा के क्षेत्र में कदम रखा।

ओला ने  1952 में अपने पैतृक गांव अरड़ावता में इन्दिरा गांधी बालिका निकेतन के रूप में क्षेत्र में पहली बालिका स्कूल की स्थापना की जिसका उद़्घाटन 10 अक्टूबर 1952 को देश के प्रथम थलसेना अध्यक्ष जनरल केएम करिअप्पा के हाथों करवा कर राजस्थान में महिला शिक्षा के क्षेत्र में एक नई मशाल जलाई। मात्र तीन बालिकाओं से शुरू किया गया वही स्कूल आज डिग्री कॉलेज बन चुका है जहां कई व्यावसायिक व अन्य उच्चतर विषय पढ़ाए जाते हैं। वर्तमान में वहां तीन हजार से अधिक छात्राएं अध्ययनरत हैं तथा लाखों छात्राएं अपनी शिक्षा पूरी कर समाज के विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत हैं।

ओला की समाजसेवा व सक्रियता को देखकर कांग्रेस ने उनको 1957 में पहली बार खेतड़ी से विधानसभा का टिकट दिया, जिसमें वे विजयी हुए। ओला ने 1957 से 1993 तक लगातार दस बार राजस्थान विधानसभा का चुनाव लड़ा जिसमें आठ बार जीत दर्ज की। ओला 18 फरवरी 1981 से 1990 तक राजस्थान सरकार में जगन्नाथ पहाड़िया, शिवचरण माथुर, हीरालाल देवपुरा और हरिदेव जोशी के नेतृत्व वाली सरकारों में जलदाय, वन एवं पर्यावरण, पंचायतीराज एंव ग्रामीण विकास, सैनिक कल्याण, इन्दिरा गांधी नहर परियोजना, परिवहन, यातायात, सहकारिता, आबकारी, भू-जल, सिंचाई सहित कई विभागों को मंत्री के रूप में संभाला। ओला 1962 से 1977 तक दो बार झुंझुनू के जिला प्रमुख रहे। ओला अपने जीवन में आठ बार विधायक, पांच बार सांसद व दो बार जिला प्रमुख का चुनाव जीत कर कुल 15 चुनाव जीतने वाले देश के एकमात्र राजनेता थे।

वर्ष 1996 में ओला ने 11वीं लोकसभा के लिए कांग्रेस से टिकट मांगा, मगर टिकट नहीं मिलने पर उन्होंने कांग्रेस छोड़कर झुंझुनू लोकसभा क्षेत्र से तिवारी कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़कर लोकसभा में प्रवेश किया। उसके बाद बाद उन्होंने लगातार पांच बार लोकसभा चुनाव जीत कर रिकॉर्ड बनाया। ओला को 28 जून 1996 को प्रधानमंत्री देवेगौड़ा की सरकार में स्वतंत्र प्रभार के उर्वरक एंव रसायन राज्य मंत्री बनाया गया। 1997-98 में गुजराल सरकार में उन्हें स्वतंत्र प्रभार का जल संसाधन राज्य मंत्री बनाया गया। 23 मई 2004 से 27 नवम्बर 2004 तक यूपीए-वन की सरकार में श्रम एवं रोजगार विभाग के कैबिनेट मंत्री तथा 27 नवम्बर 2004 से 22 मई 2009 तक खान विभाग के कैबिनेट मंत्री रहे। उन्हें 2010 में लोकसभा में कांग्रेस कांग्रेस संसदीय दल का उपनेता मनोनीत किया गया था। सितम्बर 2013 में उन्हे पुन: केन्द्रीय मंत्रिमंडल में श्रम व रोजगार मंत्री बनाया गया था।

ओला को उनके द्वारा सामाजिक क्षेत्र में किये गये विशेष कार्यों के लिए सरकार द्वारा उन्हें 1968 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया था। वे राजस्थान प्रदेश कांग्रेस के कोषाध्यक्ष व किसान सेल के अध्यक्ष भी रह चुके हैं। 15 दिसम्बर 2013 को ओला का केन्द्रीय सरकार में कैबिनेट मंत्री पद पर रहते हुए नई दिल्ली में निधन हो गया था।

स्वर्गीय शीशराम ओला के देहांत के बाद शेखावाटी की किसान राजनीति में जो बिखराव देखने को मिला है उससे  साफ जाहिर होता है कि शेखावाटी की राजनीति के भीष्म पितामह कहे जाने वाले शीशराम ओला ने सभी दलों की राजनीति में अपने चेहरे की खनक रखी।शेखावाटी की राजनीति में किसी भी दल में कोई कितना भी बड़ा राजनीतिज्ञ क्यों न हो लेकिन स्वर्गीय शीशराम ओला के कद के आगे आज भी सब बोने नज़र आते है।

पक्ष हो या विपक्ष कोई भी शेखावाटी की राजनीति में उलटफेर करना हो तो वह शीशराम ओला के अलावा कोई नहीं कर सकता था। शीशराम ओला की यह काबिलियत भी थी कि उन्होंने बड़े दलों को हमेशा अपने काबू में रखा। जब चुनाव आते थे तो शायद किसी भी दल की टिकट किसी को भी दिलवानी हो तो वह ओला जी के हाथों से निकलती थी।उनके लिए यही कहेंगे उस राजनीति के भीष्म पितामह ने अकेले अपने दम पर शेखावाटी में अपना प्रभाव रखा। जनता के साथ विशेषकर किसान वर्ग के साथ उनका लगाव बहुत ही घनिष्ठ व मित्रवत था।

इस बार के विधानसभा चुनाव में भी  शेखावाटी क्षेत्र की महत्वपूर्ण भू‍मिका रहेगी।इस क्षेत्र में करीब 30 विधानसभा क्षेत्र आते हैं।किसान  राजनीति के केंद्र इस इलाके में जाट, राजपूत, माली, ब्राह्मण, गुर्जर, अनुसूचित जाति सहित अल्पसंख्यकों के वोट चुनावी गणित में उलटफेर का माद्दा रखते हैं।

अन्तर्राष्ट्रीय खिलाड़ी किसान नेता पद्मश्री कृष्णा पूनिया

शीशराम ओला के देहांत के बाद शेखावाटी की किसान राजनीति में सियासी शून्य कायम हो गया है। ऐसे में शेखावाटी का किसान वर्ग पद्मश्री कृष्णा पूनिया से उम्मीद लगाए बैठा है। गौरतलब है कि कृष्णा पूनिया ने एक अन्तरराष्ट्रीय खिलाड़ी के रूप में न केवल  क्षेत्र के मान सम्मान को बढाया है, बल्कि शेखावाटी ही नहीं पूरे राजस्थान को अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलवाई है।किसान वर्ग से ताल्लुक रखने वाली कृष्णा पूनिया युवा वर्ग विशेषकर महिलाओं में खाश लोकप्रिय है।

पद्मश्री कृष्णा पूनिया के नाम से पिछली गहलोत सरकार के समय रणथम्भौर अभ्यारण्य की एक बाघिन का नाम भी कृष्णा रखा गया था। दंबग स्वभाव की कृष्णा पूनिया का मनचलों को पिटते हुए का वीडियो राष्ट्रीय सुर्खियां बना था।कृष्णा पूनिया को सैकड़ों बार राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर के विभिन्न पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है। हाल ही में उन्हें इंडिया टुडे का श्रेष्ठ महिला पुरस्कार एवं फोकस भारत मंच द्वारा भी सम्मानित किया गया। इसके अलावा उन्हें अर्जुन पुरस्कार, महाराणा प्रताप पुरस्कार (राजस्थान सरकार), भीम पुरस्कार(हरियाणा सरकार), महाराणा मेवाड़ पुरस्कार(मेवाड़ फाउंडेशन उदयपुर),भवानी सिंह सम्मान (राजपरिवार जयपुर) से भी सम्मानित किया गया है।

कृष्णा पूनिया वर्तमान में कांग्रेस की प्रदेश सचिव है। वे पीसीसी मेम्बर के साथ एआईसीसी मेम्बर भी है। पिछले विधानसभा चुनावों में कृष्णा पूनिया को करारी हार का सामना करना पड़ा था। लेकिन वर्तमान में परिस्थितियां बदली हुई है, आज किसान वर्ग शेखावाटी में किसान राजनीति के शून्य को समझ पा रहा है। पिछले पांच सालों में शेखावाटी में कृष्णा पूनिया की लोकप्रियता में भारी इजाफा हुआ है। आज कृष्णा पूनिया शेखावाटी की किसान राजनीति का केंद्र बिंदु बन चुकी है।

संपूर्ण कर्ज माफी का मुद्दा शेखावाटी के किसानों का सबसे बड़ा है। शेखावाटी के किसानों के 2 बड़े आंदोलन के बाद ही सरकार ने 50 हज़ार रुपए की कर्ज माफी की घोषणा की थी। सीकर में मेडिकल कॉलेज एवं क्षेत्र के कस्बों में सरकारी कॉलेज का ना होना भी मुद्दा है। शेखावाटी के कस्बें श्री माधोपुर, दातारामगढ़ नीमकाथाना, उदयपुरवाटी, राजगढ़ के सिद्धमुख में पानी का वादा पूरा नहीं हुआ है। कुंभाराम कैनाल योजना का लाभ नहीं मिल पाना भी प्रमुख है। नीमकाथाना को जिला एवं  चूरू में सुजला जिले की मांग भी बनी हुई है।

कृष्णा पूनिया हरियाणा की बेटी और शेखावाटी की बहू है। कृष्णा पूनिया का जन्म 05 मई 1977 को एक जाट परिवार में अग्रोहा, हिसार, हरियाणा में हुआ। पूनिया की शादी 2000 में राजस्थान के चूरू जिले के राजगढ़ तहसील के गागडवास गांव के रहने वाले अन्तरराष्ट्रीय कोच वीरेन्द्र सिंह पूनिया से हुई।  कृष्णा ने अपनी पढ़ाई साइकोलॉजी में कनोडिया गर्ल्स कॉलेज जयपुर से की थी।

बचपन में कृष्णा पूनिया को डिस्कस थ्रो के बारे में कुछ भी मालूम नहीं था। कृष्णा वही खेल खेलती थीं जो और बच्चे खेला करते थे। कृष्णा की बुआ उनकी लम्बाई देखकर उनको इस खेल में लाईं। कृष्णा पूनिया के  ससुराल में खेल के प्रति जागरूकता थी जिसकी वजह से उन्हें काफी प्रोत्साहन मिला। कृष्णा पूनिया अपने पति वीरेन्द्र सिंह पूनिया को कोच के साथ मार्गदर्शक भी मानती हैं।खेलों के अलावा वे सामाजिक कार्यों में भी सक्रिय हैं। 2008 से 2014 तक वे कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ राजस्थान सरकार की ब्रांड एम्बेसडर रहीं। 2010 से 2014 तक वह राजस्थान चुनाव आयोग की ब्रांड एम्बेसडर भी रहीं।  खिलाड़ी और कांग्रेस नेत्री कृष्णा पूनिया राजस्थान के प्रमुख किसान नेताओं में शुमार हैं।

2010 में दिल्ली में हुए राष्ट्रमंडल खेलों में कृष्णा पूनिया ने डिस्कस थ्रो में स्वर्ण पदक जीता था। कृष्णा पूनिया पहली एथलीट हैं जिन्होंने राष्ट्रमंड़ल खेलों में स्वर्ण जीता। 2011 में भारत सरकार द्वारा इस शानदार खेल उपलब्धि के लिए कृष्णा पूनिया को पद्मश्री पुरस्कार से नवाजा गया। उन्होंने 2006 में दोहा एशियन खेलों में कांस्य पदक जीता था। कृष्णा पूनिया ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय खेलों में कुल 55 पदक जीते हैं जिसमें 29 स्वर्ण, 16 रजत और 10 कांस्य पदक शामिल हैं।कृष्णा पूनिया ओलम्पिक खेलों में भी भाग ले चुकी है।

बहरहाल अब देखना होगा कि खेलों में किसान वर्ग और शेखावाटी का मान सम्मान बढाने वाली पद्मश्री कृष्णा पूनिया, स्वर्गीय शीशराम ओला के देहांत के बाद कायम सियासी शून्य को भरने में कामयाब होती है या नहीं।कृष्णा पूनिया के नाम पर किसान राजनीति का ये ऊंट किस करवट बैठता है, देखने लायक होगा।

(लेखक राजनैतिक विश्लेषक है)