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जस्टिस सच्चर की जयंती पर हुए सेमिनार में बोले असद हयात, ‘संगठित भीड़ ने इंस्पेक्टर की जान लेकिन CM योगी इसे मॉब लिंचिग ही नही मान रहे’

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लखनऊ – रिहाई मंच ने जस्टिस राजिंदर सच्चर की पहली जयंती पर लोकतांत्रिक आवाज़ों पर बढ़ते हमले के खिलाफ लखनऊ में सेमिनार किया। सेमीनार में वक्ताओं ने तीखा विरोध दर्ज किया कि हक और इंसाफ की आवाज उठाने वाले नेताओं पर हमले बढ़ते जा रहे हैं। योगी सरकार में यूएपीए, एनएसए और देशद्रोह जैसे अलोकतांत्रिक कानूनों के तहत वंचित समाज पर शिकंजा कसा जा रहा है।

लोकतांत्रिक अधिकार नेता अर्जुन प्रसाद सिंह ने कहा कि मोदी के शासनकाल में संविधान द्वारा प्रदत्त आजादी के अधिकार पर हमले तेज़ हो गए हैं। भीमा कोरेगांव के बाद नागरिक अधिकार नेताओं के घरों में पुलिस द्वारा छापे मारे गए और उनकी गिरफ्तारियां की गईं। इन कार्रवाईयों ने साबित कर दिया कि दाभोलकर, पंसारे, कलबुर्गी, गौरी लंकेश की हत्या करने वाली फासीवादी विचारधार किसी भी हद तक जाकर दमन पर उतारु है। कशमीर में छोटे-छोटे बच्चों तक को पैलेट गन का निशाना बनाया जाता है तो कभी स्कूली बच्चों को पत्थरबाज कहकर गोलियों का शिकार। सोहराबुद्दीन मामले ने तो एक बार फिर से व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं कि अगर आरोपी रसूखदार होगा तो उसको सजा नहीं होगी।

योगी आदित्यनाथ हेट स्पीच मामले के याचिकाकर्ता परवेज परवाज को झूठे मामले में जेल भेजने के सवाल पर यूपी में फर्जी इनकाउंटर मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट में पैरवी करने वाले एडवोकेट फरमान नक़वी ने बात रखी। योगी के खिलाफ हेट स्पीच का मामला सुप्रीमकोर्ट में है और याची परवेज़ परवाज़ ने यह कभी स्वीकार नहीं किया कि उन्होंने कोई सीडी सीधे पुलिस को 2013 में दी थी। परवेज़ का उच्च न्यायालय में कथन था कि उन्होंने सीडी 2007 में अपने शपथ पत्र के साथ सीजेएम अदालत में दाखिल की थी जो आज भी टूटी हुई दशा में रिकार्ड पर है। उसे कभी फोरेंसिक जांच के लिए नहीं भेजा गया। मामला सुप्रीम कोर्ट में लम्बित है और राज्य सरकार ने कोई भी जवाब अभी दाखिल नहीं किया है। योगी द्वारा निजी तौर पर परवेज को निशाने बनाते हुए राजनीतिक द्वेश के तहत कार्रवाई की जा रही है। उन्होंने आईटी एक्ट में कम्प्यूटर जांचने के अधिकार समेत किए जा रहे परिवर्तनों को नागरिकों स्वतंत्रता और निजता पर हमला कहा। ऐसे कानूनी प्रावधानों की वैधानिकता को अदालत में चुनौती दी जानी चाहिए। मनमाने तरीके से शहरों का नाम बदलने की प्रक्रिया विधि अनुसार न होकर राजनीति से प्रेरित है। इलाहाबाद का नाम बदले जाने के मामले में हम न्यायालय के आदेश की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

गोरखपुर दंगा मामले में योगी आदित्यनाथ व अन्य के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ रहे सामाजिक कार्यकर्ता असद हयात एडवोकेट ने कहा कि राज्य सरकार नागरिकों के हितों की संरक्षक होती है। पीड़ित जनता पहले सरकार से आशा रखती है और उसके बाद ही न्यायालय जाती है। लेकिन जब अपराधी ही सरकार पर कब्ज़ा जमाए बैठे हों तो सरकार अपराधियों के पक्ष में पक्षकार हो जाती है। ऐसी हालत में उन अपराधियों से लड़ने वाले नागरिकों का दमन होता है। परवेज़ परवाज़ का मामला इसकी मिसाल है जिन्हें दो मामलों में झूठा फंसाया गया। कथित सीडी का मामला सुप्रीम कोर्ट में है। उनका कथन है कि यह सीडी उन्होंने पुलिस को दी ही नहीं थी और पुलिस अधिकारियों ने ऐसी कोई फर्द जब्ती नहीं बनाई जिसमें लिखा हो कि मार्च 2013 में यह विवादित सीडी परवेज़ ने अपने हस्ताक्षर से उनको सौंपी। योगी आदित्यनाथ ने अपनी सरकार आने के बाद अपनी अभियोजन स्वीकृति की फाइल को रद्द करवा दिया। यह ऐसा मामला है जिसमें न्याय की हत्या हुई है। हमारा संघर्ष जारी रहेगा। योगी आदित्यनाथ सार्वजनिक रूप से यह क्यों नहीं कहते कि उन्होंने ऐसा कोई भाषण नहीं दिया था जो उनको रजत शर्मा द्वारा आपकी अदालत में दिखाया गया। योगी आदित्यनाथ को सरकार में बने रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है और न ही वे सत्य के रक्षक हैं। यूपी में माॅब लिंचिग की अनेक घटनाएं हैं मगर अफसोस है कि मुख्यमंत्री को अपने एक पुलिस अधिकारी की हत्या के बाद भी माॅब लिंचिग की कोई घटना नजर नहीं आती। इसी तरह दूसरे राज्यों में भी घटनाएं हो रही हैं मगर उनमें भी पुलिस की विवेचना निष्पक्ष नहीं है। पहलू केस में छह नामजद लोगों को क्लीन चिट दी गई जिनकी आपराधिक भूमिका पहलू खान ने अपने मृत्यु पूर्व बयान में बताई थी। इसी तरह रकबर माॅब लिंचिग केस में विधायक की भूमिका की जांच ही नहीं की गई और मास्टर माइंड नवल किशोर को भी सलाखों के पीछे नहीं डाला गया जिसने खुद पुलिस पर इल्जाम लगाया था कि पुलिस की पिटाई से रकबर की मौत हुई है। फैसल लिंचिग केस में दोनों अपराधी जिनको जमानत मिल गई थी, अदालत से भाग चुके हैं और अब पुलिस उनको ढूढ़ने का नाटक कर रही है। अखलाक लिंचिग केस में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद दिन प्रतिदिन सुनवाई नहीं हो रही है और सरकारी वकीलों की रुची मुकदमें के जल्द निस्तारण कराने में नहीं है। इस सबके पीछे राजनीतिक लोगों की दिलचस्पी है कि राजनितिक लोगों को सजा मिल सके।

कानपुर में बेगुनाहों पर लगे रासुका के मामलों पर एडवोकेट शकील अहमद बुंदेल ने कहा कि जिनका कोई आपराधिक रिकार्ड नहीं उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बताया जा रहा है। इस बात पर गौर किया जाना चाहिए कि रासुका और गैंगेस्टर एक्ट में भारी अंतर है। रासुका राजनैतिक द्वेश के चलते लगाया जा रहा है। मकसद है हिंदू और मुसलमानों के बीच दरार पैदा करना और एक समुदाय की देश विरोधी छवि बनाना। अंग्रेज़ी शासन ने रोलेक्ट एक्ट लागू किया था जिसमें वकील, दलील, अपील के लिए कोई जगह नहीं थी और देशभक्तों को सीधे जेल भेज दिया जाता था। आज़ाद देश में रासुका उसी दमनकारी कानून का नया रूप है जहां पीड़ित को वकालतन पैरवी से वंचित कर दिया जाता है। 2017 में कानपुर दंगे के बाद भाजपा विधायक के दबाव के चलते हिंदू मुस्लिम एकता के प्रतीक हाकिम खान पर रासुका लगा। 11 महीने बाद वह जेल से रिहा किए गए। न्याय में देरी अन्याय के बराबर है। कानपुर से लेकर बहराइच, बाराबंकी, आजमगढ़, कासगंज, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, मेरठ समेत कई जगहों पर रासुका बेगुनाहों के गले की फांस बन गया है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे रिहाई मंच अध्यक्ष मोहम्मद शुऐब ने कहा कि इसी प्रेस क्लब में परवेज परवाज ने यह अंदेशा जाहिर किया था कि योगी सरकार बनने के बाद वे खुद को सुरक्षित महसूस नहीं कर रहे क्योंकि उन्होंने आदित्यनाथ की द्वेशपूर्ण राजनीति के खिलाफ आवाज उठाई है। यह अंदेशा सच साबित हुआ और आज उनका परिवार दहशत में जीने को मजबूर है। सभी मोर्चों पर सरकार नाकाम है इसीलिए कभी धर्म सभा का आयोजन तो कभी शहरों का नाम बदलने का काम करती है। संजली हो या आसिफा आज देशा की बेटियां सुरक्षित नहीं हैं। इस काले अध्याय के खिलाफ और अपनी आने वाली नस्लों के लिए हमें लड़ना ही होगा। देशाद्रोह, रासुका, यूएपीए के नाम पर जिस तरह वंचित समाज पर थोक में मुकदमे लादे जा रहे हैं उससे साफ है कि सरकार मनुवादी एजेण्डे पर काम कर रही है। राजधानी में संविधान की प्रतियां फूंक दी जाती हैं तो अपराधी के नाम पर दलित-पिछड़े और मुसलमानों की मुठभेड़ के नाम पर हत्याएं कर दी जाती हैं। आज ऐसे दौर में जस्टिस राजिन्दर सच्चर याद आ जाते हैं कि मुसलमानों के हालात दलितों से भी बदतर हैं।

रिहाई मंच नेता शकील कुरैशी ने कहा कि राजाजीपुरम में देशविरोधी नारे के नाम पर क्षेत्रीय भाजपा विधायक, विहिप और बजरंग दल के नेताओं ने अयोध्या में हुई धर्मसभा के लिए माहौल बनाने के लिए मुस्लिम युवकों पर नारे लगाने का झूठा आरोप लगाया। जबकि वाकये के वक्त स्थानीय थाने तक की पुलिस मौजूद थी। इसके बावजूद 46 लोगों पर देशद्रोह का मुकदमा दायर किया गया।

मुजफ्फरनगर में रासुका के नाम पर की जा रही कार्रवाई को लेकर रिहाई मंच नेता रविश आलम ने कहा कि मुजफ्फरनगर में जो आग 2013 में लगाई गई वो अब तक शांत नहीं हुई। इसका खामियाजा पुरबालियान के लोगों को रासुका के नाम पर भुगतना पड़ा। 17 लोगों को रासुका के तहत पाबंद किया गया है।

डा0 मंजूर अली ने सच्चर कमेटी की सिफारिशों का जिक्र करते हुए राजनीतिक दलों की भूमिका पर सवाल उठाया। दलित अधिकार कार्यकर्ता अरुण खोटे ने जस्टिस सच्चर के साथ गुजरे आंदोलनों के अनुभवों को साझा किया। कार्यक्रम का संचालन रिहाई मंच नेता मसीहुद्दीन संजरी ने किया।

कार्यक्रम में एडवोकेट आमिर नकवी, पूर्व सांसद इलियास आजमी, रामकृष्ण, सृजनयोगी आदियोग, डा0 रुखसाना लारी, सैयद शाहनवाज कादरी, सैयद फारुख, कमर सीतापुरी, पीसी कुरील, अयान, नितिन राज, अंजली गौड़, दिलशाद, रुबीना, अजरा, प्रियंका, अहमदउल्ला, रामकुमार, शाहआलम शेरवानी, वीरेन्द्र गुप्ता, गुफरान सिद्दीकी, डा0 जीमल अहमद, लुकमान, रवीन्द्र प्रताप, नौषाद, फहीम सिद्दीकी, आफाक, वीरेन्द्र त्रिपाठी, केके शुक्ला, अजय शर्मा, डा0 आरबी रावत, ज्योती राय, राॅबिन वर्मा, डा0 एमडी खान, शमशेर गाजीपुरी, सचेन्द्र यादव, अवशाफ, अधिवक्ता संतोष सिंह, खालिद फतेहपुरी, शम्स तबरेज, एसडी शुक्ला, मलिक शाहबाज, गुफरान चैधरी आदि शामिल रहे।