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क्या आतंकी हमले के बाद मुसलमानों पर निंदा करने का अतिरिक्त दबाव आ जाता है!

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रोहिन कुमार

कहने का जोखिम लेना पड़ेगा. सेना पर हर हमले के साथ मुसलमानों पर निंदा करने का अतिरिक्त दबाव आ जाता है. वर्ना उन्हें चिन्हित किया जाएगा. उसके बाद बारी लिबरलों/वामपंथियों की आती है. देखा जाएगा, वो क्यों नहीं बोल रहा/रही. दूसरे राज्यों में हमले के बाद मामला लॉ एंड ऑर्डर का बनता है. पुलिस और सरकार तलब होती है. कश्मीर में हमला हो तो सरकार के साथ सहानुभूति जुड़ जाती है अगर वो भाजपा की हो. सेना के साथ हुए इस हादसे में चूक कहां हुई, यह सवाल गायब हो जाता है.

कश्मीर में न पीडीपी है, न नेशनल कॉन्फ्रेंस. वहां है राष्ट्रपति शासन. केन्द्र सरकार का सीधा हस्तक्षेप. हमला नोटबंदी के तीन साल बाद भी हो रहा है. मतलब है कि पीडीपी को छोड़ने, या केन्द्र के शासन से कश्मीर में कुछ बदला नहीं है. पठानकोट बेस कैंप में आंतकी तीन दिन रहकर निकल गए. उड़ी, गुरदासपुर, अमरनाथ यात्रियों पर हमला और आए दिन एनकाउंटर हो ही रहा है. इन हमलों की जांच किस निष्कर्ष पर पहुंची उसका कुछ मालूम है आपको?

सुरक्षाबलों की इतनी मौजूदगी के बावजूद ये कैसे जारी है? सेना के अपने इंफॉर्मर्स, खुफिया एजेंसियों के बावजूद इस तरह का हमला? बॉर्डर सील है फिर भी? सोचकर बहुत मुश्किल लगता है. कुछ तो गंभीर गड़बड़ है भीतर. कश्मीर एक वॉर जोन है और उसे इस सरकार ने थोड़ा भी न्यूट्रलाइज नहीं होने दिया. बुरहान कश्मीर के लिए एक रेफरेंस प्वाइंट बन गया.

किसी भी राजनीतिक दल में ये कुव्वत नहीं है कि वो अभी चूक पर सवाल करे. न ही भाजपा में इतनी हिम्मत है कि वे कश्मीर पर ऑल पार्टी मीटिंग बुला ले. भाजपा चाहेगी कि ये मामला गर्माया रहे. आप आज से महीने भर बाद इन मृत सैनिकों के परिजनों से मिलना. उनकी हालत देखना. सरकार क्या सहायता और सम्मान देगी ये गौर करना. भाजपा ने सैनिकों को कितना सम्मान दिया है ये दिख रहा है. ओआरओपी से लेकर राफेल तक. जवानों के टीए/डीए से लेकर उनके बुलैट प्रूव जैकेट तक.

सर्जिकल स्ट्राइक के लिए मुंह से आग फेंकना बहुत आसान है. जिनके परिजन श्रीनगर जैसे जगहों पर पोस्टेड हैं, उनसे पूछिए. उनके घर के चूल्हे नहीं जलते. भयभीत रहते हैं. सोचते हैं अब फोन आएगा और आवाज़ आएगी, मैं सुरक्षित हूं. अपने लुबलुबाहट के लिए जवानों को आग में मत झोंकिए. जवानों के ह्यूमन राइट्स पर बात कीजिए. ऐसे कभी नहीं समझ आएगा कि एक तरफ का राइट ह्यूमन राइट है और दूसरे तरफ का कुछ नहीं है..यही पर्सेप्शन है. कश्मीर को इस हालत में इसी पर्सेप्शन ने पहुंचाया है.

(लेखक युवा पत्रकार हैं, ये उनके निजी विचार हैं)

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