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नज़रियाः अटल बिहारी वाजपेयी सम्मानीय हो सकते हैं लेकिन श्रद्धेय और आदर्श नहीं, जानिये क्यों?

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रूपेश कुमार

मैं भारत के पूर्व प्रधानमंत्री तथा लगभग सर्वस्वीकार्य राजनेता, भारत–रत्न श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी के प्रति पूरे सम्मान के साथ कहना चाहूँगा कि राजनैतिक अर्थों में वे भले एक सम्मानीय राजनेता हों, जिनके लिए नेहरू ने यह कहा हो कि यह युवक एक दिन भारत का नेतृत्व करेगा। भले उनको नेहरू के बाद की राजनीति के लोकतांत्रिक मर्यादाओं का मानक माना जाता हो।

भले उन्हें उनकी राजनैतिक क्षमताओं के कारण अन्तरराष्ट्रीय महत्व के मामलों में प्रतिपक्ष का नेता रहने के वावजूद भी भारत के नेतृत्व का अवसर मिलता हो, भले उनकी ओजस्वी कविताओं पर राष्ट्ररक्षा का भाव हृदय में तूफान मचा देता हो, भले उनके भाषण, उनका पक्ष संसद में शान्तिपूर्वक सुना जाता हो, भले उन्हें श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली गुजरात सरकार को राजधर्म का पाठ पढ़ाने वाला उपदेशक माना जाता हो, परन्तु मैं बहुत स्पष्टता और दृढ़तापूर्वक मानता हूं कि उन्होंने राष्ट्रीय एकता के मानस को बहुत बड़ी क्षति पहुंचाई है।

बाबरी मस्जिद और अटल

सवाल केवल एक विवादित ढांचे को गिराने भर का नहीं है, बल्कि सवाल यह है कि उनके जैसे व्यक्तित्व की अगुवाई में उस ध्वंस जैसा असंवैधानिक और अधार्मिक कृत्य हुआ, जिसे फिर एक बड़े हिन्दू मध्यवर्ग ने अपना जस्टिफाईड पॉलिटीकल स्टैण्ड मान लिया, वरना उन्हें अपनी पार्टी के नेतृत्व वाली प्रदेश–सरकार को राजधर्म के पालन का पाठ पढ़ाने की नौबत क्योंकर आयी?

रूपेश कुमार (सोशल एक्टिविस्ट)

इस घटना के बाद अपनी–अपनी धार्मिक असुरक्षा की भावना फैलाकर दोनों तरफ की कट्टरपंथी ताकतों ने भारत की सांस्कृतिक एकता को एक बार फिर जबर्दस्त क्षति पहुँचाई। समय के साथ उन मुसलमानों, जिनके पुरखे धर्म के आधार पर बने एक देश को अपनाने से इनकार कर अपनी मातृभूमि पर ही पुराने विश्वास के साथ रह गए थे, के खिलाफ घृणा से बढ़कर हिंसा का माहौल बन गया।


मैं मानता हूं कि इसके जिम्मेदार अटल बिहारी वाजपेयी सहित उनकी पीढ़ी के और राजनेता हैं। अंग्रेजों की मुखबिरी जैसी पुरानी बातों को छोड़ भी दें, तो भी मेरी नजर में अटल जी सम्मानीय नेता हो सकते हैं, श्रद्धेय नहीं। जो लोग धर्मनिरपेक्षता या गांधीवादी शब्दावली में सर्वधर्म समभाव को भारत की आजादी की लड़ाई के मूल तत्वों में से एक मानते हैं और भारत के संविधान को उस लड़ाई के आदर्शों से पैदा हुई किताब मानते हैं।

उनके लिए सन् 1924 में पैदा हुए अटल वाजपेयी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सच्चे स्वयंसेवक हो सकते हैं, लेकिन आज़ादी की लड़ाई के सिपाही या उस लड़ाई की वैचारिक विरासत के रखवाले तो कतई नहीं। हलाँकि उनके प्रति हार्दिक सम्मान प्रकट करने के लिए इस शीर्षक को यह भी लिखा जा सकता है कि अटल जी श्रद्धेय हो सकते हैं, आदर्श नहीं।

(लेखक सोशल एक्टिविस्ट हैं, ये उनके निजी विचार हैं)