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राजस्थान चुनावः कर्नल मान्वेन्द्र सिंह जसोल के मारवाड़ में उठे सियासी तूफान से बन रहे हैं नए राजनैतिक समीकरण

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शरीफ मोहम्मद खिलजी

कहते है राजनीति में कोई किसी का सगा नहीं होता, कभी वंसुधरा राजे सिंधिया को मुख्यमंत्री की ताजपोशी करने वाले जंसवत सिंह जसोल का परिवार आज बीजेपी छोड़ चुका है। राजस्थान में जनसंघ और बीजेपी का कमल खिलाने में राजपूतों का अहम रोल रहा है। पूर्व केन्द्रीय वित्त, विदेश और रक्षा मंत्री जंसवत सिंह जसोल और भूतपूर्व उपराष्ट्रपति एवं राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री भैरोसिंह शेखावत राजपूतानें में बीजेपी की रीढ़ की हड्डी रहें। जंसवत सिंह जसोल की केन्द्रीय भूमिका रही, वे पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के हमेशा संकटमोचक की भूमिका में रहे। उनकी छवि भी संघ और बीजेपी के नेताओं से विपरीत थी, वे राजपूत समुदाय के साथ छत्तीस कौम में सर्वमान्य रहें।

पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान जसोल ने अपना अंतिम चुनाव गृहनगर बाडमेर – जैसलमेर से लडने की इच्छा जाहिर की लेकिन राजस्थान की मुख्यमंत्री वंसुधरा राजे सिंधिया ने जसोल की टिकट कटवाकर कुछ दिनों पूर्व ही कांग्रेस से बीजेपी में आए सोनाराम चौधरी को टिकट दिलवाई।और इसे मुंछों की लडाई घोषित कर जसोल को हराने में पुरा दम लगा दिया। जसोल चुनाव हार गए और इसके साथ ही राजपूतानें के एक मजबूत राजनेता नेता का बीजेपी से पतन होने लगा।

गौर करने वाली बात ये है मुख्यमंत्री वंसुधरा की ताजपोशी करने में जंसवत सिंह जसोल और भैरासिंह शेखावत की मुख्य भूमिका रही। आज दोनों ही परिवारों को सिंधिया ने हाशिए पर डाल रखा है, शेखावत के सगे भतिजे प्रतापसिंह खाचारियावास सींधिया के इरादे भापंकर कई वर्ष पूर्व बीजेपी से कांग्रेस में आए और आज कांग्रेस के स्थापित नेता है, शेखावत के दामाद नरपत सिंह राजवी बीजेपी के विधायक जरुर है लेकिन सींधिया ने उन्हें बिल्कुल हाशिए पर डाल रखा है।उन्होंने मुख्यमंत्री को चिट्ठी लिखकर अपनी ही सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए है। भैंरोसिंह शैखावत के देहावसान के बाद से ही राजवी हाशिए पर है।कुछ ऐसा ही हाल जंसवत सिंह जसोल के पुत्र शिव विधायक कर्नल मानवेन्द्र् सिंह जसोल का हुआ।

पिछले साढे चार साल में मुख्यमंत्री सिंधिया ने जसोल परिवार को बिल्कुल हाशिए पर डाल रखा था।मानवेंद्र सिंह अपने  पिता जसवंत सिंह बीमार होने की वजह से सक्रिय राजनीति से काफी लंबे वक्त से दूर थे, दूसरी तरफ, विधायक मानवेंद्र सिंह की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के साथ अदावत जारी रही. आलम यह हुआ  कि  कुछ दिनों पूर्व अपनी गौरव यात्रा के दौरान मुख्यमंत्री राजे ने उनके जिले में जाने के बावजूद उनके विधानसभा क्षेत्र का दौरा करना मुनासिब नहीं समझा, यह बात मानवेंद्र सिंह को अखर गई।

जसवंत सिंह की हार के बाद भी शिव से विधायक मानवेंद्र सिंह को पार्टी के भीतर या राजस्थान में सरकार के भीतर कोई पद नहीं दिया गया. अपनी उपेक्षा से परेशान मानवेंद्र सिंह की तरफ से मारवाड़ के रण में स्वाभिमान रैली के रूप में कदम उठाया गया। मारवाड़ के रेतीले धोरों में हजारों समर्थकों की उपस्थिति में उन्होंने बीजेपी से नाता तोडऩे का एलान कर दिया। दरअसल मानवेंद्र को पता था कि राजस्थान में राजपूत समुदाय के भीतर मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के खिलाफ पहले से ही गुस्सा है. अगर इस समुदाय की मुख्यमंत्री के खिलाफ नाराजगी को भुनाना है तो यह सही वक्त होगा। मानवेंद्र सिंह राजपूत समुदाय के उस गुस्से के प्रतीक के तौर पर अपने-आप को स्थापित कर दिया, मानवेंद्र सिंह को पता है कि वसुंधरा के खिलाफ ताल ठोंक कर इस बार वो समाज के नायक बन सकते हैं।

हालांकि राजपूत समुदाय के भीतर मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के खिलाफ नाराजगी कई मुद्दों को लेकर है. सबसे ताजा नाराजगी तो कुछ महीनों पूर्व बीजेपी अध्यक्ष पद को लेकर है. बीजेपी आलाकमान केंद्रीय मंत्री और जोधपुर से सांसद गजेंद्र सिंह शेखावत को राजस्थान बीजेपी अध्यक्ष के पद पर बैठाना चाहता था. लेकिन, मुख्यमंत्री के विरोध करने के चलते ही शेखावत का पत्ता कट गया. राजपूत समुदाय इस बात को भुला नहीं पा रहा है. मुख्यमंत्री के खिलाफ इस पूरे इलाके में काफी गुस्सा है.

इसके अलावा जोधपुर के समरऊ की  घटना को लेकर भी राजपूत समुदाय के भीतर गुस्सा है, आनन्दपाल प्रकरण की आग अभी ठंडी नहीं हुई है। हजारों राजपूत युवाओं पर मुकदमें दर्ज है।चतुर सिंह एनकाउंटर का भी मारवाड़ में काफी असर पडने वाला है।

इस कारण है नाराजगी

वर्तमान मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को पहली बार मुख्यमंत्री बनाने में भैरों सिंह शेखावत के साथ-साथ जसवंत सिंह की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही,. लेकिन बाद में वसुंधरा राजे ने भैरों सिंह  के साथ ही जसवंत सिंह को तवज्जो देनी कम कर दी थी। केन्द्र की राजनीति में व्यस्त जसवंत सिंह ने इसे अपना अपमान माना। इसके अलावा दोनों के बीच रिश्ते खराब होने का एक और कारण वर्चस्व की लड़ाई भी थी। दोनों के बीच की कड़ुवाहट यहां तक बढ़ गई थी कि वसुंधरा राजे को देवी के रूप में पूजे जाने पर जसवंत सिंह की पत्नी शीतल कंवर ने धार्मिक भावनाएं आहत करने का केस दर्ज करवा दिया था। इसके कुछ ही दिनों बाद जसवंत सिंह ने अपने पैतृक गांव जसोल में रियाण का आयोजन किया।

रियाण में एक-दूसरे को रस्म के रूप में अफीम की मनुहार की जाती है। वसुंधरा के इशारे पर पुलिस ने उनके खिलाफ अफीम परोसने का मामला दर्ज कर लिया था। दोनों के बीच तल्ख हुए रिश्तों के बीच कहा जाता इसी आपसी कलह के कारण वसुंधरा राजे ने भी उनका टिकट कटवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। वर्ष 2014 के चुनावों में भी उन्हें हराने के लिए वसुंधरा ने खुद को पूरी तरह से बाड़मेर-जैसलमेर में झोंक दिया था और जसवंत को प्रतिष्ठा का सवाल बने चुनाव में हार का सामना करना पड़ा। चुनाव के थोड़े दिन पश्चात जसवंत बीमार पड़ गए और अभी तक उनकी स्थिति में कोई विशेष सुधार नहीं हो पाया है।

मारवाड़ क्षेत्र में गौरव यात्रा के दौरान पचपदरा में मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और जोधपुर के राजा गज सिंह एक साथ दिखे थें माना जा रहा है कि जसोल परिवार की बेरुखी की वजह से नाराज राजपूतों को संदेश देने के लिए राजे ने यह दांव खेला था। क्योंकि जोधपुर के महाराजा भी मारवाड़ की राजनीति में राजपूतों पर काफी असर डालते है।

उल्लेखनीय है कि मारवाड़ में जोधपुर संभाग के 6 जिले-बाड़मेर, जैसलमेर, जालौर, जोधपुर, पाली, सिरोही की कुल 33 सीट और नागौर जिले की 10 सीटों को मिलाकर कुल 43 विधानसभा क्षेत्र हैं. कभी कांग्रेस का गढ़ रहे मारवाड़ में पिछले चुनाव में बीजेपी ने 39 सीट जीत कर इस गढ़ को ढहा दिया. कांग्रेस के खाते में तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की सीट समेत महज तीन सीट आई जबकि एक सीट पर निर्दलीय ने कब्जा जमाया था।

वर्तमान में राजपूत और उनसे जुड़ी अन्य जातियां बीजेपी से नाराज है। मारवाड़ की कई विधानसभा सीटों पर परिणाम को प्रभावित करने में राजपूतों की बड़ी भूमिका है. साथ ही राजपूतों से जुड़े राजपुरोहित, चारण, प्रजापत और अन्य पिछड़ी जातियां भी कांग्रेस की तरफ रुख करेंगी। राजस्थान में बीजेपी के परंपरागत वोट राजपूतों में मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को लेकर नाराजगी, जसोल परिवार का बीजेपी छोडना और जोधपुर से सांसद गजेंद्र सिंह शेखावत को प्रदेश बीजेपी का अध्यक्ष न बनाने को लेकर तल्खी और बढ़ गई है.

मारवाड़ क्षेत्र में राजपुरोहित अच्छी संख्या है जो एससी-एसटी एक्ट को लेकर स्थानीय बीजेपी के रुख से नाराज बताए जा रहें हैं. वहीं आनंदपाल के एनकाउंटर की वजह से रावणा राजपूत भी खासा नाराज हैं. इन समुदायों के मानवेंद्र सिंह की रैली में मौजूदगी ने बीजेपी के लिए चिंताजनक है।

जसोल परिवार की मुसलमानों में अच्छी पकड़

मानवेंद्र सिंह के बीजेपी छोडने से कांग्रेस के परंपरागत मुस्लिम वोट भी उसकी तरफ रुख करेंगे. जासोल परिवार का बाड़मेर-जैसलमेर क्षेत्र के मुसलमानों में अच्छी पकड़ है. इसी वजह से 2014 लोकसभा चुनाव में बाड़मेर सीट पर बीजेपी और जसवंत सिंह में सीधी लड़ाई होने के चलते कांग्रेस तीसरे स्थान पर चली गई थी. बाड़मेर लोकसभा सीट पर 20 प्रतिशत मुस्लिम वोट हैं जो जसोल परिवार के समर्थक हैं. इसकी वजह यह है कि सीमावर्ती जिले में रहने वाले ज्यादातर मुस्लिम परिवारों के पाकिस्तान के सिंध प्रांत में रिश्ते हैं.

इसलिए इन्हें सिंधी मुस्लिम भी कहते हैं. पूर्व केंद्रीय मंत्री जसवंत सिंह हिंगलाज यात्रा के माध्यम से सिंधी मुसलमानों का दर्द समझा था. और उन्हें भारत की तरफ रहने वाले रिश्तेदारों से जोड़ने के लिए थार एक्सप्रेस भी चलवाई. जिसकी वजह से इस क्षेत्र के मुस्लिमों पर जसोल परिवार का खासा प्रभाव है। राजस्थान के राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मानवेंद्र के इस कदम से कभी कांग्रेस का गढ़ रहे मारवाड़ में उसको फायदा होगा. क्योंकि राजपूत, मुस्लिम और उनसे जुड़े अन्य समुदाय कांग्रेस के साथ आएंगे।

मानवेंद्र सिंह की स्वाभिमान रैली में साफ हो गया कि बाड़मेर की राजनीति का ऊंट कांग्रेस की तरफ बैठने वाले है. मानवेंद्र के समर्थन में बाड़मेर, जैसलमेर, जालोर, सिरोही, पाली और जोधपुर के राजपूत नेताओं  के साथ जसवंत सिंह और मानवेंद्र सिंह का बरसों से साथ निभा रही जातियों के नेता एक जाजम पर इकट्ठा हुए।  मानवेंद्र ने स्वाभिमान रैली के जरिये अपनी नई राजनीतिक पारी का आगाज कर खुद के साथ हुई नाइंसाफी का बदला लेने की तैयारी शुरू कर दी। आज बाडमेर सियासत का रणक्षेत्र  बन चुका है। मानवेंद्र की हुंकार से राज्य में राजनैतिक समीकरण बदल रहे है।

पश्चिमी राजस्थान के रेतीले धोरों की धरती पर सियासी तूफान की आहट साफ सुनाई पड़ रही है. वहां राजनीति का मिजाज गर्म है और नेताओं के तेवर तीखे हो चुके है। विधानसभा चुनाव से पहले ही बाड़मेर राजनीति का चर्चित युद्ध क्षेत्र बनकर उभरा है. यहां धर्म के साथ जाति चुनाव में एक बार फिर बड़ा मुद्दा होगा. क्षेत्रीय अस्मिता के साथ नेताओं से जनता के रिश्ते भी कसौटी पर होंगे. एक दल से दूसरे दल में नेताओं की आवाजाही से रेगिस्तान में जबरदस्त सियासी घमासान की संभावनाएं हैं।

(लेखक युवा राजनैतिक विश्लेषक है)