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जब नियंत्रणकारी पदों पर सवर्णों के करीब पूर्ण एकाधिकार तो 10 प्रतिशत आरक्षण की जरूरत क्यों?

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सिद्धार्थ रामू

ग्रुप A के पद-

भारत सरकार के आंकड़ों के अनुसार सरकरी तंत्र पर अभी भी सवर्णों का वर्चस्व और नियंत्रण कायम है।केंद्रीय कार्मिक मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा 1 जनवरी 2016 को जारी आंकड़े बताते हैं कि केंद्र सरकार में ग्रुप की कुल नौकिरयों की संख्या 84 हजार 521 है। इसमें 57 हजार 202 पर सामान्य वर्गो ( सवर्णों ) का कब्जा है। यह कुल नौकरियों का 67.66 प्रतिशत होता है। इसका अर्थ है कि 15-16 प्रतिशत सवर्णों ने करीब 68 प्रतिशत ग्रुप ए के पदों पर कब्जा कर रहा है और देश की आबादी को 85 प्रतिशत ओबीसी, दलित और आदिवासियों के हि्स्से सिर्फ 32 प्रतिशत पद हैं। इसमें 11 हजार 312 पद एससी, 11 हजार 002 पद ओबीसी और 5 हजार 5 पद एसटी के वर्ग के लोगों के पास है। ध्यान देने की बात यह है कि करीब 52 प्रतिशत ओबीसी को हिस्से सिर्फ 13.01 प्रतिशत है। इसका कारण है कि ओबीसी को 1992 में आरक्षण प्राप्त हुआ। ओबीसी संबंधी तथ्य यह भी बताता है कि बिना आरक्षण के इन वंचित तबकों को हि्स्सेदारी मिलना नामुमकिन सा है।

ग्रुप ए के दो तिहाई पदों पर सवर्णों के नियंत्रण का अर्थ है कि देश की नौकरशाही पर सवर्णों का कमोवेश पूर्ण नियंत्रण और वर्चस्व। हम सभी जानते हैं कि केंद्र सरकरा द्वारा निर्णयों के लेने और उसे लागू करने में नौकरशाहों की सबसे निर्णायक भूमिका होती है। यदि इसी पर उनका पूर्ण नियंत्रण है, तो कोई अंदाज लगा सकता है कि इसका नतीजा क्या होगा?

इन तथ्यों को एक और नजरिये से भी देखना जरूरी है। सवर्ण जाति के लोग अक्सर ओबीसी, दलितों और आदिवासियों के आरक्षण के खात्मे की मांग करते हैं, उन्हें यह नहीं दिखाई देता कि आजादी के बाद भी मनु द्वारा उनके लिए किया गाय आरक्षण कमोवेश पूरी तरह कायम है और सदियों से चले आ रहे सवर्णों के आरक्षण को तोड़ने के लिए संविधान ने जो आरक्षण शूद्रों-अतिशू्द्रों को दिया था,वह आरक्षण सवर्णों का आरक्षण तोड़ नहीं पाया है। इसके साथ ही आरक्षित तबकों के कुछ लोग इस खुशफामी में रहते हैं कि उनकी हैसियत काफी बढ गई है, जबकि सच्चाई यह है कि सरकारी तंत्र पर सवर्णों का पूर्ण वर्चस्व और नियंत्रण कायम है।

ग्रुप B के पद

अब गुप बी के पदों को लेते हैं। इस ग्रुप में 2 लाख 90 हजार 598 पद हैं। इसमें से 1 लाख 80 हजार 130 पदों पर अनारक्षित वर्गों का कब्जा है। यह ग्रुप बी की कुल नौकरियों का 61.98 प्रतिशत है। इसका मतलब है कि ग्रुप बी के पदों पर भी सर्वण जातियों का ही कब्जा है। यहां भी 85 प्रतिशत आरक्षित संवर्ग के लोगों को सिर्फ 28 प्रतिशत की ही हिस्सेदारी है।

कुछ ज्यादा बेहतर स्थित ग्रुप सी में भी नहीं है। ग्रुप सी के 28 लाख 33 हजार 696 पदों में से 14 लाख 55 हजार 389 पदों पर अनारक्षित वर्गों ( अधिकांश सवर्ण ) का ही कब्जा है। यानी 51.36 प्रतिशत पदों पर। आधे से अधिक है। हां सफाई कर्मचारियों का एक ऐसा संवर्ग है, जिसमें एससी,एसटी और ओबीसी 50 प्रतिशत से अधिक है। इस प्रकास यदि हम भारत सरकार के इस आंकडे को देखें तो साफ तौर पर दिखेगा कि वर्ण व्यवस्था लागू है। आजादी के 70 सालों वाद भी सवर्ण ही इस देश के मालिक हैं। (स्रोत – केंद्रीय कार्मिक मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा 1 जनवरी 2016 को जारी)

प्रोफेसर

7 0 प्रतिशत प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और असिस्टेंट प्रोफेसर के पदों पर 15 प्रतिशत सवर्णों का कब्जा है। जबकि 85 प्रतिशत ओबीसी, एससी और एसटी के हिस्से सिर्फ 29.03 प्रतिशत पद है। इसमें भी प्रोफेसर के 93 प्रतिशत पदों सवर्णों का कब्जा है, सिर्फ 6.9 प्रतिशत प्रोफेसर ही एससी, एसटी और ओबीसी समुदाय के हैं। एसोसिएट प्रोफेसर के 87 प्रतिशत पदों पर सवर्णों का कब्जा है, सिर्फ 13.06 प्रतिशत पद ही एससी,एसटी और ओबीसी के लोगों के पास हैं।

यह आंकड़ा विश्विद्यालय अनुदाय आयोग( यूजीसी ) ने प्रस्तुत किया है। यूजीसी की 2016-17 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार कॉलेज और विश्विद्यालयों में कुल 14.7 लाख अध्यापक हैं। 13.08 लाख ( 89 प्रतिशत) कॉलेज में और 1.6 लाख( 9.1 ) प्रतिशत विश्विद्यालयों में। यह रिपोर्ट 30 केंद्रीय विश्विद्यालयों और 82 राज्यों के सरकारी विश्विद्यालयों में श्रेणी आधारित एसी,एसटी और ओबीसी के शिक्षकों की स्थिति भी प्रस्तुत करती है। यह रिपोर्ट बताती है कि प्रोफेसरों के कुल 31 हजार 446 पद हैं, इसमें एसोसिएट और असिस्टेंट प्रोफेसर शामिल हैं। 31,446 में से 9,130 पदों पर एसी, एसटी और ओबीसी हैं। यह कुल पदों का 29.03 प्रतिशत है। जबकि इन सभी वंचित समुदायों का आरक्षण 49.5 प्रतिशत है। आरक्षित वर्ग के कुल 9,130 शैक्षिक पदों में 7,308 (80 प्रतिशत) अस्टिटेंट प्रोफेसर, 1,193(13.06 प्रतिशत) एसोसिऐट प्रोफेसर और मात्र 629(6.9 प्रतिशत) प्रोफेसर हैं। यह रिपोर्ट कॉलेजों में शैक्षिक पदों की आरक्षित वर्गों की क्या स्थिति है, इसके बारे में कुछ नहीं कहती, लेकिन कोई भी इस बात का अंदाज लगा सकता है कि हालात कुछ ज्यादा बेहतर नहीं होगी।

कुलपति-

यूजीसी द्वारा दी गई सूचना के अनुसार देश के कुल 496 कुलपतियों में448 ‘उच्च जातियों’ के। 6 कुलपति अनुसूचित जाति, 6 अनुसूचित के और 36 ओबीसी के हैं। सूचना अधिकार के तहत माँगी सूचना के तहत यह सूचना 5 जनवरी 2018 को यूजीसी ( विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ) ने दी है। प्राप्त सूचना की मूल प्रति नीचे संलग्न है। सूचना के तहत प्राप्त यह तथ्य यह चीख़-चीख़ कर बताते हैं कि उच्च शिक्षा पर करीब पूर्णतया द्विजों का वर्चस्व काम है। उच्च जातियों का अनुपात कुल जनसंख्या में 15-16 प्रतिशत से अधिक नहीं है, लेकिन इन्हीं जातियों से 90 प्रतिशत से अधिक कुलपति है। इसके उलट एससी, एसटी और ओबीसी जनसंख्या में अनुपात 80 प्रतिशत के करीब है।इन सब से मिलाकर करीब 10 प्रतिशत (9.68) ही कुलपति हैं। हम सभी जानते हैं, उच्च शिक्षा संस्थानों में कुलपति सबसे अधिकार संम्पन्न और निर्णायक पद होता है। शिक्षकों नियुक्ति, पदोन्नति, प्रवेश प्रक्रिया, आरक्षण के नियमों का अनुपालन, विश्वविद्यालयो में चुनाव, शिक्षणेत्तर कर्मचारियों की नियुक्ति, पाठ्यक्रम निर्धारण आदि सभी महत्वपूर्ण विषय कमोबेश उसके अधीन होते हैं। उच्च शिक्षा पर द्विजों या सवर्णों के पूर्ण वर्चस्व का मतलब सोचने-समझने के तरीकों पर भी उनका पूर्ण वर्चस्व कायम रहना है। इस पर भी सवर्णों को 10 प्रतिशत आरक्षण!

(लेखक फॉरवर्ड प्रेस मैग्ज़ीन के संपादक हैं)