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मनुवाद की तरफ एक और कदमः दलित लेखक की किताबों को दिल्ली विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम से निकालने का प्रस्ताव

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सिद्धार्थ रामू

नई दिल्ली – दिल्ली विश्वविद्यालय की अकादमिक मामलों से जुड़ी स्टैंडिंग कमेटी के चार सदस्यों ने उस्मानिया विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्रोफेसर और बहुजन लेखक कांचा इलैया शेपर्ड की इन तीन किताबों को दिल्ली विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम से निकाले का प्रस्ताव किया है। कांचा इलैया की तीन किताबों को दिल्ली विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम से निकालने का प्रस्ताव। इन्हें हिंदू धर्म को बदनाम करने वाला बताया गया-ये तीन किताबें है- (1) मैं हिंदू क्यों नहीं हूं ( ह्वाई आई एम नाट हिंदू ) (2) हिंदूत्व मुक्त भारत ( पोस्ट हिंदू इंडिया ) (3) बफैलो नेशनलिज्म।

कमेटी के सदस्य प्रोफेसर गीता भट्ट और प्रोफेसर हंसराज सुमन ने कहा है कि ये किताबें हिंदू धर्म के बारे में अपमानजनक टिप्पणिया करती हैं और हिंदू धर्म को बदनाम करती है। कमेटी के सदस्यों का कहना है कि कांचा इलैया की किताबें विध्वंसक हैं। इन्हें विद्यार्थियों को नहीं पढ़ाया जाना चाहिए। ये किताबें पढ़ाई पाठक्रम में शामिल रहेगीं या नहीं इसके बारे में अंतिम फैसला 15 नवंबर को अकादमिक कौंसिल की बैठक में लिया जायेगा।

प्रतीकात्मक चित्र

याद रहे कांचा इलैया ऐसे समकालीन लेखक हैं, जो फुले-आंबेडकर के विचारों के आलोक में हिंदू धर्म, संस्कृति और जीवन पद्धति की व्याख्या करते हैं और वर्ण-व्यवस्था और जाति व्यवस्था की धज्जियां उड़ाते हैं। रही बात हिंदू धर्म की घिनौने और अमानवीय चेहरे को उजागर करने की तो यह काम तो फुले, पेरियार और डॉ. आंबेडकर ने भी किया है।

फुले की किताब ‘गुलामगिरी’, पेरियार की किताब ‘सच्ची रामायण’ और डॉ. आंबेडकर की किताब ‘हिंदू धर्म की पहेलियां’. ‘प्राचीन भारत में क्रांति और प्रतिक्रांति’ ‘जाति का विनाश’ और अन्य किताबें हिंदू धर्म की धज्जियां उड़ाती हैं। उसके इंसान विरोधी चेहरे को खोल कर रख देती हैं। इन किताबों के बारे में हिंदू धर्म के पैरोकारों की क्या राय है? जाति के विनाश किताब में तो उन्होंने साफ-साफ लिखा है कि वर्ण-जाति व्यवस्था का समर्थन करने वालों हिंदू धर्मग्रंथों को डाइनामईट से उड़ा देना चाहिए। ( जाति का विनाश)

आंबेडकर ने लिखा कि ‘‘इस प्रकार यह पूरी व्यवस्था ही अत्यन्त घृणास्पद है, हिन्दुओं का पुरोहित वर्ग (ब्राह्मण) एक ऐसा परजीवी कीड़ा है, जिसे विधाता ने जनता का मानसिक और चारित्रिक शोषण करने के लिए पैदा किया है… ब्राह्मणवाद के जहर ने हिन्दू-समाज को बर्बाद किया है।”

(सिद्धार्थ रामू फॉरवर्ड प्रेस मैग्ज़ीन के संपादक हैं)