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रूसी पहलवान खबीब मामलाः किसी खिलाड़ी की जीत उसके मज़हब की जीत बिलकुल नहीं होती

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सैय्यद आसिफ अली

उस रूसी पहलवान खबीब के साथ जो हुआ है, वो आमतौर पर खेलों और कुश्तियों में होता रहता है, 2006 के विश्व कप फ़ुटबाल में ज़िनेदिन ज़िदान का हेड बट किसे याद नहीं है, इटली के खिलाडी मेटराज़ी ने ज़िदान को आतंकी, शरणार्थी कहा था, और साथ ही में उसकी बहन के लिए अपशब्द भी कहे थे ! जिसे मेटराज़ी दस साल तक नकारता रहा मगर 2016 में उसके ज़मीर ने लानत की तो उसने सच उगल दिया! मगर फ़्रांस उस हेड बट की वजह से फाइनल नहीं जीत पाया था, इटली ने ये ख़िताब अपने नाम किया था!

ठीक ऐसा ही बर्ताव महान बॉक्सर मोहम्मद अली के साथ भी रिंग में होता था, मोहम्मद अली ने 61 फाइट लड़ी, जिनमें से 56 मुकाबले में उन्होंने जीत हासिल की और सिर्फ 5 बार ही वो हारे थे! इस्लाम क़ुबूल करने से पहले वो कलेसियस क्ले के नाम से जाना जाता था, अर्नी टेरेल से मुक़ाबले से पहले मोहम्मद अली को बार-बार उनके पुराने नाम केसियस क्ले से ही बुलाया, ये सुनकर मोहम्मद अली भड़क गए थे, इस्लाम क़ुबूल करते वक़्त उन्होंने ऐलान किया था कि वो अपना पुराना नाम इसलिए छोड़ रहे हैं क्योंकि यह गुलामी की पहचान है, जब उन्हें अर्नी टेरेल ने जान बूझ कर गुलामी के प्रतीक नाम कलेसियस क्ले के नाम से ही पुकारा तो वो आपे से बाहर हो गए थे!

ठीक इसके बाद अली ने टेरेल को ‘अंकल टॉम’ कहकर पुकारा अौर वहीं कैमरे पर दोनों के बीच हाथापाई शुरू हो गई थी, उन्हें बीच बचाव कर छुड़ाया गया, इसके बाद उनका मुक़ाबला 6 फरवरी 1967 को शुरू हुआ जिसमे मोहम्मद अली ने अर्नी टेरेल की बुरी तरह ठुकाई की और हर पंच के बाद उससे पूछते थे कि ” ‘What’s my name? Uncle tom! What’s my name?

टेरेल का चोखटा बिगड़ गया था अौर अांखे सूजकर बन्द हो चुकी थी. चेहरे से लगातार खून रिंग पर गिर रहा था. लेकिन मोहम्मद अली मारते ही जा रहे थे. अली के कोच रिंग के पास से चिल्ला रहे थे, ‘kill him! kill him !

देखनेवाले विश्व चैम्पियन मुक्केबाज़ के इस आततायी रूप को देख सन्न थे, दर्शकों में कई रहम की अपील करते हुए, मुकाबला रोके जाने की मांग करते रहे, लेकिन फाइट पूरे पंद्रह राउंड तक चली ! रेफरी हैरी केसलर ने 13वें और 14वें राउंड में डॉक्टर को बुलाकर टेरेल की दाईं आंख की जांच भी करवाई, मुकाबले के बाद अर्नी को अपनी घायल आंख का ऑपरेशन करवाना पड़ा और हालांकि वो रिंग में वापस लौटे मगर उनका चैम्पियन बनने का सपना वहीं हमेशा के लिए खत्म हो गया था।

खबीब के साथ भी यही कुछ हुआ था, जो कि होता आया है, उकसाने (Provoke) और तैश दिलाने की भी एक टैक्टिस होती है, रिंग में उतरने से पहले ये दौरान ऐसा कई बार कइयों के साथ हुआ है, और ख़ास कर मुस्लिम खिलाडियों के साथ तो होता ही रहता है, हाल ही में जर्मनी के नामी मुस्लिम खिलाडी तुर्की मूल के मेसुत ओजिल के साथ यही हुआ था, तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तायिप एर्डोगन के साथ तस्वीर खिंचवाने को लेकर जर्मनी के दक्षिणपंथियों ने उनके खिलाफ अभियान छेड़ दिया था, नतीजतन उन्हें न सिर्फ जर्मनी विश्व कप फुटबॉल टीम बल्कि अंतर्राष्ट्रीय फुटबॉल से ही विदा लेना पड़ी थी।

विश्व कप फ़ुटबाल विजेता टीम फ़्रांस के मुस्लिम खिलाडियों आदिल रामी , डीजेब्रिल सिडीबे, बेंजामिन मेन्डी, पॉल पोगबा, एनगोलो कोंटे, नाबिल फेकीर और ओसमैन डेम्बेले की भी खूब चर्चा हुई थी, ज़िनेदिन ज़िदान हो या मेसुत ओजिल या हाशिम अमला या मोहम्मद अली या फिर खबीब इनकी जीत को मज़हब की जीत की तरह पेश नहीं करना चाहिए, इस तरह की जीत इस्लाम की जीत बिलकुल नहीं कही जा सकती, खेल है इसमें हार जीत खिलाडी की होती है, ज़्यादा से ज़्यादा मुल्क की कह सकते हैं मगर मज़हब की तो बिलकुल नहीं !

कल को यही खिलाडी अगर हार जाते हैं तो मज़हब कैसे हारा हुआ माना जायेगा ? सोचिये ज़रा !! ये अलग बात है कि दुनिया में इस्लामोफोबिया प्रोपगंडे के बीच ऐसी खुश करने वाली खबरे आती हैं तो ख़ुशी मनाना लाज़मी है, मैं भी एक फुटबॉल खिलाडी रहा हूँ, इस जज़्बे को बेहतर ढंग से समझ सकता हूँ, ये इंसानी फितरत है, मगर इसे महिमा मंडित करना या इस तरह जश्न मनाना जैसे मज़हब की जीत हुई हो, मेरे नज़रिये से ठीक नहीं है!

इस तरह की जीतों और उदाहरणों से एक बात दुनिया की समझ में आ गयी होगी कि मुसलमानों को खेलों में सही मार्ग दर्शन, सहयोग, समर्थन और तकनीक का साथ मिले तो हम किसी भी मुल्क से उठकर अपने दम ख़म और खेल से दुनिया को चौंका सकते हैं। जश्न मनाइये मगर कोशिश कीजिये कि ये अतिरेक तक न पहुंचे, खेलों में ये सब चलता रहता है! आखिर में खबीब को उसके जज़्बे और उसकी शानदार फाइट के लिए दिली मुबारकबाद।