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बटला हाउस एनकाउंटर के दस सालः पढ़ें वे पांच सवाल जो बताते हैं कि इस एनकाउंटर के बाद….  

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तारिक़ अनवर चंपारणी

बटला हाउस एनकाउंटर की वर्षी एक सेलिब्रेशन बनकर रह गयी है। इस एनकाउंटर के कारण अनेकों नेता, विधायक एवं सोशल एक्टिविस्टों का जन्म हुआ। आज दस वर्ष बाद भी बटला हाउस में एक मेला लगता है और अनेकों एक्टिविस्ट इंसाफ़ का रोना रोते है। लेकिन, सवाल है कि यह एक्टिविस्ट पूरे एक वर्ष कहाँ ग़ायब रहते है? ऐसे एक्टिविस्टों से कई सवाल है। शायद यह सवाल सिर्फ़ किसी एक के नहीं बल्कि जनता के सवाल है।

  • एनकाउंटर में मारे गये लड़कों के परिवारों की तरफ़ से आज पूरे दस वर्ष बीतने के बाद भी कोई एफआईआर दर्ज क्यों नहीं हुई? जब एफआईआर ही दर्ज नहीं हुई तो फिर इस एनकाउंटर को किस आधार पर कोर्ट में फ़र्ज़ी साबित किया जाएगा? एफआईआर दर्ज भी हुई है तो वह कॉन्स्टेबल मोहनलाल शर्मा के हत्या की हुई है। जाँच होगी भी तो मोहनलाल शर्मा के हत्या की होगी। मग़र, जामिया के जो लड़के मारे गये उसके हत्या की जाँच किस आधार पर होगी?

  • क्या बटला हाउस एनकाउंटर पर राजनीति करने वाले नेता एवं अपनी एक्टिविज्म को आकाश की ऊंचाई पर ले जाने वाले एक्टिविस्टों के पास बटला हाउस प्रकरण के किसी भी लड़कें का कोई लीगल स्टेटस मौजूद है? मेरी सीमित जानकारी में किसी के भी पास नहीं हैं। थोड़ा-बहुत कुछ है भी तो लखनऊ की एक संगठन रिहाई मंच के पास है। क्योंकि, रिहाई मंच में आज़मगढ़ के कई लोग है जिस कारण यह सम्भव हो सका।

 

  • एनकाउंटर के बाद जामिया की प्रोफेसर मनीषा शेट्टी जेटीएस का गठन की थी। बटला हाउस एनकाउंटर पर सबसे अधिक काम करने का दम्भ जेटीएस के लोग करते है। क्या जेटीएस के पास यह लीगल स्टेटस है? अलग-अलग माध्यम से जेटीएस को जो फंडिंग हुई उसका खुलासा क्यों नहीं किया गया? पैसा को मृतकों के परिजनों तक क्यों नहीं पहुँचाया गया? आख़िर, पैसा कहाँ ख़र्च हुआ? जब एफआईआर ही नहीं है और लीगल स्टेटस ही नहीं है तो मुक़दमा में तो पैसा ख़र्च हुआ ही नहीं। फिर पैसा सब गया कहाँ? अलग-अलग माध्यमों से लाखों रुपया एनकाउंटर में मारे गये छात्रों के परिवार वालों के आर्थिक मदद के लिए आये थे। वह पैसा कहाँ और किसके पास है?
जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्विद्यालय के पूर्व कुलपति
  • वाईस चांसलर मुशीरुल हसन साहब ने जामिया लीगल फंड बनाया था। कुछ छात्र संगठनों ने लगभग 96,000 रुपया जमा करके जामिया लीगल फंड को दिया था। जामिया लीगल फंड की डायरेक्टर राधा कुमार थी। आख़िर, वह पैसा लाभार्थी तक क्यों नहीं पहुँचा?
तारिक़ अनवर चंपारणी
  • जामिया ओल्ड बॉयज एसोसिएशन को लगभग 10 लाख रुपया की आर्थिक मदद मिली जिसमें से मात्र 1 लाख रुपया ही मिल सका मग़र बाकी के 9 लाख रुपया जामिया ओल्ड बॉयज क्यों डकार गयी? आर्थिक मदद के ऐसे कई माध्यम थे उस माध्यम का खुलासा क्यों नहीं किया गया?

यह बात सही है कि हम बटला हाउस की लड़ाई जमीन पर उतरकर नहीं लड़ रहे है। मगर, आप तो लड़ रहे है या लड़ने का दम्भ तो भर रहे है। इसलिए, आपको आगे आकर जवाब देना चाहिये। वरना, बटला हाउस वर्षी के नाम पर मेला लगाना बंद कर दीजिए। आतिफ़ एवं साज़िद के परिवार भी सब्र कर चुके है। लेकिन, उनकी लाशों पर आप आज भी मेला लगा रहे है।

(लेखक सोशल एक्टिविस्ट हैं, ये उनके निजी विचार हैं)