Home विशेष रिपोर्ट पांच राज्यों में चुनावः 11 दिसम्बर को EVM जीतेगी या जनता?

पांच राज्यों में चुनावः 11 दिसम्बर को EVM जीतेगी या जनता?

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ज़ीशान नैय्यर

पांच राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनाव जिसे लोकसभा चुनाव 2019 का सेमीफाइनल कहा जा रहा है जो हक़ीक़त भी है.क्योंकि इसके बाद किसी राज्य में चुनाव नही है.और अप्रैल मई में 2019 का दंगल होगा. इन पांच राज्यों में 3 बड़े राज्य जिसमें बीजेपी सत्ता में है मध्य प्रदेश,छत्तीशगढ़,राजस्थान लेक़िन तमाम एग्जिट पोल ओपिनियन पोल सर्वे बीजेपी के लिए धड़कन बढ़ाने वाले हैं.और तीनों में राज्यों में काँग्रेस वापसी कर रही है ऐसा सर्वे बता रहे हैं. वैसे इतिहास गवाह है कि बीजेपी एग्जिट पोल या ओपिनियन पोल में कभी नही हारती है कम मुझे तो याद नही है.लेकिन ये सब ऐसे समय आया है जब ज़्यादा तर चैनल सीधे पीएमओ से नियंत्रित किये जार हें हैं.बीजेपी अग़र एग्जिट पोल में हार रही हो तो समझिए मामला बहुत गंभीर है.

लोकसभा चुनाव 2004 हो 2009 या 201पांच दिल्ली और बिहार विधानसभा के चुनाव बीजेपी हर एग्जिट पोल में जीत जाती है.लेक़िन इस विधानसभा चुनाव में बीजेपी का एग्जिट पोल में हार जाना 2019 लोकसभा चुनाव में दिल्ली सल्तनत के लिए कम से कम अच्छे संकेत तो नही है.

मध्य प्रदेश

बात मध्यप्रदेश की करतें हैं तो वहाँ बीजेपी 1पांच साल से सत्ता में है और वहाँ के किसान शिवराज सरकार से नाराज़ हैं. पिछले साल मंदसौर में आंदोलन कर रहे किसान पे पुलिस फ़ायरिंग हुई कई किसान मारे गये.कई मीडिया रिपोर्ट में कहा गया है कि वहाँ बीजेपी के ख़िलाफ़ जम कर वोटिंग हुई है.और वोटिंग प्रतिशत भी बहुत ज़्यादा था 7पांच % यानि जब वोटिंग प्रतिशत ज़्यादा हो तो सत्तापक्ष के लिए चिंताएं पैदा करती है.यहाँ भी चुनाव प्रचार सिर्फ़ शिवराज के इर्दगिर्द ही दिखा वहीं काँग्रेस के पास कमल नाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया  जैसे युवा और अनुभवी नेता है.

छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ यहाँ कांग्रेस और बीजेपी में कांटे की टक्कर है और मौजूदा विधानसभा में भी सीटों में ज़्यादा अंतर नही है. वैसे वहाँ कांग्रेस का सामना डॉ रमन सिंह से है जो ज़मीनी नेता माने जाते हैं वहाँ की जनता में बहुत लोकप्रिय है लेक़िन इस बार उनको भी कड़ीे मशक्क़त करनी पड़ रही है.

इस चुनाव में एक अज़ीब बात हुई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तसवीर बीजेपी के बैनर-पोस्टरों से ग़ायब रही। चुनाव मुख्यमंत्री रमन सिंह के आसपास ही सिमटकर रह गया। विधानसभा चुनाव में पीएम ने इस बार कुल चार सभाओं को संबोधित किया जबकि पिछली बार उन्होंने राज्य में एक दर्ज़न सभाएँ की थीं। वहीं काँग्रेस कि बिडम्बना देखिये अजीत जोगी के अलग पार्टी बना लेने से रमन सिंह के ख़िलाफ़ कोई मज़बूत चेहरा नही है.यहाँ तक की अग़र काँग्रेस वहां सत्ता में आती है तो मुख्यमंत्री कौन होगा पता नही.

राजस्थान

राजस्थान यहाँ पांच साल में सरकार बदलने का इतिहास रहा है जो लगता है इस बार भी ज़ारी रहेगा वहाँ की जनता खुल कर वसुंधरा राजे के ख़िलाफ़ है यहाँ तक कि पार्टी में भी सबकुछ ठीक नही है. सीटों के बंटबारे पर भी मतभेद खुलकर सामने आये थे.कई मंत्रियों और विधायकों का टिकट काट दिया गया.इतिहास ये भी बताता है राज्य में जिसकी सरकार रही है उस पार्टी का लोकसभा में सांसद भी सबसे ज़्यादा जीत कर जाता है.

वसुंधरा राजे के ख़िलाफ़ जन माहौल बना हुआ है मोदी तुझसे बैर नही वसुंधरा तेरी ख़ैर नही जैसे नारे पोस्टऱ दिखाई पड़ रहें हैं और उनका सामना काँग्रेस के दो बड़े नेता पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत कई राज्यों के प्रभारी भी है शायद संभावना ये भी है अग़र काँग्रेस वहां जीत जाती तो है तो सचिन पायलट को कमान सौंपी जा सकती है।

फ़िलहाल अशोक गहलोत जो हाल के दिनों में राहुल गाँधी के सबसे क़रीबी रहें हैं.गुजरात और कर्नाटक चुनाव में प्रभारी थे फ़िलहाल तेलेंगाना के भी प्रभारी है और  काँग्रेस चुनाव समिति के मुख्य रणनीतिकारों में शामिल हैं.फ़िलहाल वहाँ 7 दिसम्बर को वोटिंग है और चुनाव प्रचार चरम पर है.

तेलेंगाना

बात तेलेंगाना की करें तो मुख्यमंत्री के चंद्र शेखर राव ने मास्टरस्ट्रोक खेला था.और बहुतमत रहते ही 9 महीने पहले विधानसभा को भंग करके चुनाव में चले गए.क्योंकि आँध्र प्रदेश की तरह यहाँ भी विधानसभा चुनाव लोकसभा चुनाव साथ ही होता है. ख़ासकर संसद के अंदर अविश्वास प्रस्ताव के दौरान आंध्र प्रदेश को स्पेशल स्टेट्स देने के मुद्दे पर. साथ ही उन्होंने केसीआर की तारीफ़ भी की. विधानसभा को भंग करने से पहले केसीआर ने दिल्ली जाकर प्रधानमंत्री से भी मुलाकात की.

ये माना जा रहा था कि केसी राव अब केंद्र की राजनीति में आना चाहते थें.वो केंद्र में एक अहम मंत्रालय चाहते हैं और अपने बेटे के तारक रामा राव को राज्य की कमान सौंपना चाहते थे.लेक़िन ऐसा नही हो पाया.वैसे ओबैसी की पार्टी भी टीआरएस से गठबंधन करके चुनाव लड़ रही है.

लेक़िन जब महागठबंधन नही बना था तबतक केसीआर को बढ़त हाँसिल थी लेक़िन जैसे ही टीडीपी काँग्रेस लेफ़्ट पार्टियां साथ आई फ़िर मुक़ाबला बराबरी का हो गया है.उदहारण के तौर पर आप 201पांच बिहार चुनाव को ही लें तो बीजेपी एक पार्टी के तौर पर 2पांच% वोट लेकर सबसे बड़ी पार्टी बनी लेक़िन पांच3 सीट ही  ला सकी अग़र तेलेंगाना में महागठबंधन क़ामयाब रहा तो इसका सीधा असर 2019 आम चुनाव पर पड़ेगा

क्योंकी महागठबंधन बनाने की पूरी कमान चंद्र बाबु नायडू ने ले रखा है.एक ज़माने में वो अटल अडवाणी के बाद देश मे तीसरेे सबसे ज़्यादा पावरफुल नेता थे.हाल के दिनों में वो ग़ैर बीजेपी पार्टीयों के नेताओं से मिल रहे हैं .और 2019 मे बीजेपी के लिये मुश्किल पैदा कर सकते हैं.

मिज़ोरम

मिज़ोरम जहाँ काँग्रेस 40 में 3पांच सीट जीत कर सत्ता में है और वहाँ बीजेपी का कोई ख़ास असर नही है आज़तक उसका कोई विधायक नही बना है। बीजेपी के मिज़ोरम प्रभारी हेमंत विश्व शर्मा ने कहा है कि हमारा लक्ष्य यहाँ सीट जीतना नही बल्कि हमारा लक्ष्य है पार्टी की छवि को बेहतर करना है. ख़ैर नतीज़ा चाहे कुछ भी लेक़िन काँग्रेस के लिए राज्यों में एक नया लीडर शिप तैयार हो जायेगा जैसे ज्योतिरादित्य सिंधिया, सचिन पायलट, ग़ौरव गोगोई,दीपेंद्र सिंह हूडा है.

वहीं अग़र आप देखें तो बीजेपी के पास मोदी के इलावा कोई नया चेहरा नज़र नही आता है.वही होगा जैसे हरियाणा में मनोहर लाल खट्टर और दिवेंद्र सिंह रावत को सीधे नागपुर से लाया गया था शायद वही आगे भी हो जिसको आधे से ज़्यादा विधायक को नाम भी पता नही होगाजैसा हरियाणा में खट्टर के साथ हुआ था.

वहीं बीजेपी के काँग्रेस मुक्त भारत और पूरे देश में कमल खिलाने के सपने पर एक तगड़ा झटका माना जा सकता है ऐसी सूरत में वो 19 में सिर्फ 16 राज्यों में ही उनकी सत्ता होगी. अब 11 दिसम्बर का इंतेज़ार कीजिये उस दिन हार का ठिकरा विपक्ष ईवीएम पर फोड़ता है या जीत की सूरत में बीजेपी कि छवि ग़रीब मज़दूर और किसान विरोधी के रूप में और मज़बूत होगी या बीजेपी का सबका साथ सबका विकास के मंत्र को एक बार फ़िर दोहराया जायेगा। इसका जवाब 11 दिसम्बर को मिलेगा के 2019 के फाइनल में कौन सी टीम कितनी मज़बूत है.

(लेखक युवा पत्रकार हैं, ये उनके निजी विचार हैं)